Donald Trump Pakistan: डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका के पाकिस्तान से कैसे रहेंगे रिश्ते?
Donald Trump Pakistan: करीब पांच सालों का वक्त बीत चुका है, जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने पाकिस्तान के किसी प्रधानमंत्री से मुलाकात की हो या फिर कम से कम फोन पर भी बात की है। पिछली बार डोनाल्ड ट्रंप ही थे, जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान से मुलाकात की थी। जो बाइडेन ने अपने चार सालों के कार्यकाल में ना तो इमरान खान को ही फोन किया और ना ही मौजूदा प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को।
पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्ते अब सामान्य नहीं है और पाकिस्तान को अब चीनी खेमे में मौजूद एक देश के रूप में देखा जाता है, जिसको लेकर अमेरिका अब अपनी नाराजगी को सख्त ककर सकता है।

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पिछले कार्यकाल में ही कहा था, कि "पाकिस्तान ने अमेरिकी डॉलर्स का अमेरिका के खिलाफ इस्तेमाल किया" और उन्होंने ही पाकिस्तान को मिलने वाली सैन्य सहायता के साथ अन्य तरह के मदद पर रोक लगा दी, जो अभी तक जारी है। लेकिन, अब पूछे जा रहे हैं, कि क्या डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका, पाकिस्तान के साथ किस तरह के रिश्ते रखने वाला है?
हालांकि, इस सवाल के साथ सबसे पहले इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है, कि भारत हो या पाकिस्तान, या फिर दुनिया के ज्यादातर देश, उनमें इस बात को लेकर अनिश्चितताएं और आशंकाएं हैं कि डोनाल्ड ट्रंप का दूसरा कार्यकाल अमेरिका के वैश्विक आचरण और नीतियों के लिए क्या मायने रखेगा?
डोनाल्ड ट्रंप से पाकिस्तान को क्या डर है? (What does Pakistan fear from Donald Trump?)
पाकिस्तान के ज्यादातर नेताओं में, खासकर सत्ताधारी गठबंधन के नेताओं में इस बात को लेकर डर है, कि डोनाल्ड ट्रंप देश की अंदरूनी राजनीति में हस्तक्षेप कर सकते हैं और इमरान खान की रिहाई को लेकर दबाव बना सकते हैं और यही डर है, कि ट्रंप के शपथ ग्रहण से दो दिन पहले पाकिस्तान की एक अदालत ने आनन-फानन में एक केस में इमरान खान को 14 सालों की सजा सुना दी।
जाहिर है, शहबाज शरीफ की सरकार इमरान खान के मामले को और जटिल बनाना चाहती है, ताकि ट्रंप के दबाव का प्रभाव कम से कम हो।
लेकिन, वक्त के साथ पाकिस्तान के अंदर एंटी-अमेरिका मानसिकता और ज्यादा मजबूत हो गई है।
पाकिस्तान की एक बड़ी आबादी अमेरिका के खिलाफ है और डोनाल्ड ट्रंप उन नेताओं में से रहे हैं, जिन्होंने पाकिस्तान को जिम्मदार ठहराने की कोशिश की है। लेकिन, पाकिस्तान का राजनीतिक नेतृत्व अभी भी 'अमेरिका प्रथम' सोच रखता है, खासकर अमेरिका में बसने को लेकर।
पाकिस्तान की मीडिया एक तरफ देश की अवाम को अमेरिका के खिलाफ भड़काती भी है, तो दूसरी तरफ अतीत में अमेरिका के साथ रहे बेहतरीन रिश्तों को याद कर मुंह से पानी भी टपकाती है।
पाकिस्तान की विदेश नीति की परीक्षा!
एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि पाकिस्तान के लिए 2025 का साल मुश्किल भरा रहेगा, क्योंकि उसे दुनिया भर में अपने निकटतम पड़ोसियों, सहयोगियों और विरोधियों के साथ-साथ संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ संबंधों को संभालना है, जहां डोनाल्ड ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी हो चुकी है।
2021 में अफगान तालिबान ने जब काबुल पर कब्जा किया, उसके बाद पूरे पाकिस्तान में सशस्त्र समूहों और विद्रोहियों की तरफ से होने वाली हिंसा तेज हो गई। 2024 में, सशस्त्र हमलों ने लगभग 700 कानून प्रवर्तन कर्मियों की जान ले ली, जिससे यह 240 मिलियन लोगों के देश में सबसे घातक वर्षों में से एक बन गया।
ये हमले मुख्य रूप से पाकिस्तान तालिबान (TTP) की तरफ से किए जा रहे हैं, जो एक सशस्त्र समूह है जो अफगान तालिबान को अपना वैचारिक जुड़वां मानता है। अलग-अलग विद्रोही हमलों ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) से संबंधित स्थलों को निशाना बनाया, जो 62 बिलियन डॉलर की एक मेगाप्रोजेक्ट है जिसने इस्लामाबाद और बीजिंग को राजनीतिक और आर्थिक सहयोगियों के रूप में पहले से कहीं अधिक करीब ला दिया है।
क्रिस्टोफर क्लेरी, जो अमेरिका स्थित गैर-लाभकारी संस्था स्टिमसन सेंटर में एक गैर-निवासी फेलो हैं, और अल्बानी विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर हैं, उन्होंने अल जजीरा की एक रिपोर्ट में कहा है, कि "पाकिस्तान के पास अपनी आर्थिक स्थिति को व्यवस्थित करने और अन्य महान शक्तियों और क्षेत्रीय पड़ोसियों के साथ अपने संबंधों को सुधारने के अलावा कोई बड़ा रणनीतिक विकल्प नहीं है। इसके लिए संभवतः वर्षों की मेहनत की आवश्यकता है, और यह स्पष्ट नहीं है, कि घर गिरने से पहले पाकिस्तान के पास यह काम करने के लिए उतना वक्त है या नहीं?"
चीन, पाकिस्तान के लिए स्थिति बना सकता है मुश्किल
विशेषज्ञों को यह भी डर है, कि चीन, डोनाल्ड ट्रंप के प्रतिकूल रुख के कारण बीजिंग पाकिस्तान से सार्वजनिक समर्थन की मांग कर सकता है, जिसके बाद पाकिस्तान को अपने पुराने सहयोगी वाशिंगटन को नाराज करने से बचने के लिए कूटनीतिक रूप से कठोर रुख अपनाना पड़ेगा और ये काफी मुश्किल होगा।
ट्रंप ने चीन के प्रति लगातार सख्त रुख अपनाया है, उनके पहले कार्यकाल में दोनों आर्थिक शक्तियों के बीच व्यापार युद्ध देखने को मिला था। अपने दूसरे कार्यकाल में, अमेरिकी नेता ने चीनी आयात पर 60 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का वादा किया है। फैसल ने कहा, "लेकिन चूंकि पाकिस्तान ट्रंप प्रशासन के अंतरराष्ट्रीय एजेंडे में शीर्ष पर नहीं है, इसलिए एक उम्मीद की किरण भी है। फिर भी, अनिश्चितता चीन के साथ पाकिस्तान की दोनों चुनौतियों का सामान्य कारक है।"
अमेरिका स्थित न्यू लाइन्स इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजी एंड पॉलिसी के वरिष्ठ निदेशक कामरान बोखारी ने अलजजीरा से कहा, कि पाकिस्तान के साथ चीन की हताशा सीपीईसी में उसके व्यापक निवेश से उपजी है, जिससे उसे बहुत कम लाभ हुआ है। उन्होंने कहा कि चीन की यह दुर्दशा अमेरिका के लिए फायदेमंद हो सकती है।
बोखारी ने अल जजीरा से कहा, "चीन पहले से ही पाकिस्तान से काफी निराश है और पिछले कुछ समय से दोनों देशों के बीच संबंध तनावपूर्ण हैं। लेकिन बीजिंग मुश्किल में है, क्योंकि वह पाकिस्तान में घुटने तक डूबा हुआ है, अरबों डॉलर के CPEC निवेश की बदौलत, उसे इससे कोई लाभ नहीं मिल रहा है। इसलिए, पाकिस्तान में चीन का उलझना अमेरिका के लिए अच्छा है।"
लिहाजा, पाकिस्तान के लिए स्थिति और मुश्किल होने की आशंका जताई गई है। और शहबाज सरकार के लिए व्हाइट हाउस से शुभ समाचार मिलना काफी ज्यादा मुश्किल माना जा रहा है।
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