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1987 का ‘ट्रंप ऐड’ आज बना अमेरिका की रणनीति? ईरान पर वही पुरानी जिद फिर दिखी, दुनिया के लिए खतरे की घंटी!

आज अमेरिका और ईरान के बीच जो तनाव दिख रहा है, उसकी जड़ें काफी पुरानी हैं। यह सिर्फ आज की रणनीति नहीं है, बल्कि लगभग 40 साल पहले की सोच का नतीजा है। 1980 के दशक के आखिर में जब डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) सिर्फ रियल एस्टेट की दुनिया का बड़ा नाम थे, तब उन्होंने राजनीति में एंट्री का एक अलग ही तरीका चुना। 1987 में उन्होंने अमेरिका के नामी अखबारों में मोटी रकम खर्च कर फुल-पेज विज्ञापन छपवाए। इन विज्ञापनों का मकसद साफ था, सरकार की विदेश नीति को सीधे चुनौती देना।

उस वक्त ईरान-इराक जंग अपने आखिरी दौर में था और खाड़ी क्षेत्र में हालात बेहद तनावपूर्ण थे। दुनिया की नजर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) पर टिकी थी, जहां से तेल की सप्लाई गुजरती है। अमेरिका इन जहाजों की सुरक्षा कर रहा था, लेकिन ट्रंप को यही बात खटक रही थी।

Donald Trump Iran war
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क्या था 1987 का विज्ञापन? (What Was the 1987 Advertisement?)

1987 में ट्रंप ने करीब 1 लाख डॉलर खर्च करके अमेरिका के बड़े अखबारों में फुल पेज विज्ञापन छपवाया। इसमें उन्होंने लिखा कि दुनिया अमेरिका पर हंस रही है, क्योंकि वह खाड़ी संकट को ठीक से संभाल नहीं पा रहा।

उस समय Iran-Iraq War चल रहा था और अमेरिका अपने जहाजों से तेल के टैंकरों की सुरक्षा कर रहा था, खासकर Strait of Hormuz में।

Donald Trump 1987 AD us strategy iran war
Photo Credit: Credit: @StalwartSt on X

'दूसरों के लिए क्यों लड़े अमेरिका?'

ट्रंप ने अपने विज्ञापन में बेहद सीधा सवाल उठाया, अमेरिका उन जहाजों की रक्षा क्यों करे, जिनका उससे सीधा कोई लेना-देना नहीं? उनका तर्क था कि जिन देशों को फायदा मिल रहा है, वे बदले में अमेरिका को क्या दे रहे हैं?

उनकी सोच यहां भी अलग थी। वह मानते थे कि अगर ताकत का इस्तेमाल हो रहा है, तो उसका रिटर्न भी दिखना चाहिए। नहीं तो या तो पूरी ताकत से उतरें या बिल्कुल न उतरें। आधे-अधूरे कदम, उनके हिसाब से, सिर्फ कमजोरी दिखाते हैं।

एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ट्रंप ने यहां तक कह दिया था कि जब अमेरिका वहां मौजूद है, तो क्यों न सीधे तेल के संसाधनों पर ही नियंत्रण कर लिया जाए। यह बयान सिर्फ एक टिप्पणी नहीं था, बल्कि उनकी रणनीतिक सोच का संकेत था, सुरक्षा नहीं, सीधा नियंत्रण।

ट्रंप का मानना था कि आधे-अधूरे तरीके से किसी संघर्ष में शामिल होना कमजोरी की निशानी है। उन्होंने न्यू हैम्पशायर के एक क्लब में तंज कसते हुए कहा था कि अगर हम वहां हैं, तो क्यों न तेल के कुओं पर ही कब्जा कर लें। यह बयान उनकी सोच को साफ दिखाता है-सीधी और आक्रामक नीति।

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खार्ग आइलैंड: दबाव की रणनीति

अगले ही साल ट्रंप ने अपनी बात को और आगे बढ़ाया। उन्होंने इंटरव्यू में कहा कि अगर अमेरिकी हितों को खतरा हुआ, तो वह खार्ग आइलैंड (Kharg Island) को निशाना बनाएंगे। यह वही जगह है, जहां से ईरान का बड़ा हिस्सा तेल निर्यात होता है। उनकी नजर में यह सिर्फ हमला नहीं, बल्कि एक 'डील मेकिंग टूल' था। उनका मानना था कि अगर इस तरह का दबाव बनाया जाए, तो ईरान को बातचीत के लिए मजबूर किया जा सकता है।

सद्दाम हुसैन का जिक्र

1989 में दिए एक भाषण में ट्रंप ने सद्दाम हुसैन (Saddam Hussein) का उदाहरण देते हुए कहा कि उसने दिखा दिया कि ईरान से कैसे सख्ती से निपटा जा सकता है। उनका संदेश साफ था-अगर सेना है, तो उसका इस्तेमाल भी दिखना चाहिए।

यह बयान उस दौर में भी विवादित रहा और आज भी ट्रंप की सोच को समझने के लिए अहम माना जाता है। उनकी रणनीति साफ थी-ताकत का प्रदर्शन ही असली समाधान है।

करीब चार दशक बाद, जब ईरान और अमेरिका एक बार फिर आमने-सामने हैं, तो ट्रंप की वही पुरानी सोच आज की रणनीति में नजर आती है। तेहरान कोस्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने की चेतावनी देना, तय समय सीमा तय करना और फिर संभावित सैन्य कार्रवाई की बात करना-ये सब उसी 1987 वाले 'ट्रंप प्लान' की झलक दिखाते हैं।

क्या यह रणनीति काम करेगी?

ट्रंप का मानना रहा है कि किसी भी संघर्ष को कम समय में आक्रामक रणनीति से सुलझाया जा सकता है। लेकिन पश्चिम एशिया का इतिहास कुछ और कहता है। यहां के संघर्ष अक्सर लंबे और जटिल होते हैं।

करीब 9 करोड़ की आबादी वाले ईरान जैसे देश पर दबाव बनाना आसान नहीं है। अगर स्थिति नियंत्रण से बाहर जाती है, तो इसका असर सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। तेल की कीमतों से लेकर व्यापार तक, हर स्तर पर इसका असर साफ दिखाई देने लगता है।

कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप अब यूरोप और दूसरे सहयोगी देशों से भी कह सकते हैं कि अगर अमेरिका उनकी सुरक्षा करता है, तो उन्हें इसकी कीमत चुकानी होगी। यानी यह सिर्फ ईरान की बात नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए अमेरिका की नई नीति हो सकती है।

आखिरकार सवाल यही है क्या 1987 में एक कारोबारी की जिद आज एक सुपरपावर की नीति बन चुकी है? और अगर हां, तो इसके नतीजे दुनिया को कितने महंगे पड़ सकते हैं?

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