Infertility: हवा में उड़े 'जहर' के कण! बढ़ी बांझपन की समस्या, एक्सपर्ट्स का बड़ा दावा, जानिए वजह
कोरोना काल के दौरान बड़े स्तर पर दुनिया के सभी देशों में सैनिटाइजर को उपयोग किया। महामारी पर नियंत्रण में इसका बड़ा महत्व है। लेकिन इसके प्रयोग के कुछ दुष्परिणाम भी सामने आए हैं।

कोरोना महामारी के दौरान सैनिटाइजर का कीटाणुनाशक के तौर पर बड़े स्तर पर उत्पादन और उपयोग किया गया। जिससे पर्यावण में प्राकृतिक रूप से मौजूद रोगाणुरोधी क्षमता प्रभावित हुई है। ऐसी स्थित में पर्यावरण वैज्ञानिकों ने वातवरण में जहरीले रसायनों को फैलने की आशंका व्यक्त की। हाल में यूएस की मिशिगन यूनिवर्सिटी के साइंटिस्ट्स ने इसको लेकर एक शोध किया।
दुनिया से कोरोना को खत्म करने लिए सैनिटाइजर के प्रयोग से वातावरण दूषित हुआ। सैनिटाइज के वातवरण में फैलने से पिछले दिनों क्यूएसी और अस्थमा जैसी बीमारियां बढ़ीं। मनुष्यों के अलावा पशुओं पर भी इसका प्रभाव हुआ। एक्सपर्ट्स ने कहा कि कि जानवरों मं जन्म दोष, बांझपन की समस्या देखी गई।
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यूएस की मिशिगन यूनिवर्सिटी के अध्ययन के मुताबिक कोरोना के बाद बांझपन और सांस संबंधी समस्याएं देखी गईं। कुछ ऐसे बैक्टीरिया पर्यावरण में पाए गए जो कुछ अहम एंटीबायोटिक दवाओं से भी नियंत्रित होने वाले नहीं हैं। इससे पहले वर्ष 1950 में ऐसी स्थिति देखी गई थी।
एक्सपर्ट्स के शोध लेख के मुताबिक वातवरण में अमोनिया की मात्रा बढ़ना इस खतरनाक स्थिति की वजह है। मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के एक सह-लेखक और सहायक प्रोफेसर कर्टनी कैरिग्नन ने कहा, "क्यूएसी युक्त वाइप्स का उपयोग अक्सर बच्चों के स्कूल डेस्क, अस्पताल और घरों में सफाई के लिए किया जाता है। लेकिन इसमें मौजूद सैनिटाइजर कुछ क्षण में उड़कर हवा में चला जाता है, जो बात में स्वांस के जरिए फिर हमारे शरीर में प्रवेश करता है। ऐसे में सैनिटाइजर यानी काटाणुनाशक में मौजूद रसायनों का प्रयोग घातक हो सकता है।
नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी में सह-लेखक और प्रोफेसर एरिका हार्टमैन ने कहा, "यह चिंता की बात है कि हम जिन रसायनों का प्रयोग महामारी के खात्मे के लिए कर रहे थे वही अब फिर हवा में उड़कर स्वास्थ्य के लिए खतरा बन गए हैं।" कोरोना महामारी के दौरान सैनिटाइजर्स के अत्यधिक प्रयोग से अब स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ गई हैं।
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