Diplomacy: Putin से हथियार, Trump से व्यापार, भारत की डुअल कूटनीति से टेंशन में पाकिस्तान और चीन!
Diplomacy: गुरुवार को जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन नई दिल्ली पहुंचे, तो उनका स्वागत उसी भव्यता से किया गया जैसा भारत अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगियों के लिए करता है। लेकिन इसी समय, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका जैसे रूस के बड़े प्रतिद्वंद्वी के साथ भी मजबूत रणनीतिक रिश्ते कायम रखने की कोशिश कर रहे हैं। यही भारत की खास कूटनीतिक बैलेंसिंग है। जिसे वह एक दशक से अपनाए हुए है।
रूस से फाइटर जेट और तेल और अमेरिका से व्यापार
एक ओर रूस से उन्नत लड़ाकू विमान, सस्ता तेल और शीत युद्ध से चली आ रही दोस्ती है। दूसरी ओर, अमेरिका से हाई-टेक, व्यापार, निवेश। इनसे अलग भारत को ट्रंप द्वारा लगाए गए बड़े टैरिफ हटने की उम्मीदें भी हैं। भारत दोनों को साथ लेकर चल रहा है।

यूक्रेन युद्ध के बाद भारत की बढ़ी अहमियत
यूक्रेन पर पुतिन के हमले के बाद, भारत ने अपनी विशाल मार्केट और हिंद-प्रशांत में रणनीतिक स्थिति का भरपूर फायदा उठाया। इससे व्हाइट हाउस हो या क्रेमलिन-दोनों की निगाह भारत में होने वाली इस मुलाकात पर टिकी हैं। दिल्ली की सड़कों पर रूस-भारत के झंडे लगे हैं और पुतिन के स्वागत के बड़े-बड़े पोस्टर भी, जो स्वागत की भव्यता का अंश मात्र हैं।
तनावपूर्ण समय में पुतिन की यात्रा
युद्ध शुरू होने के बाद पुतिन की यह भारत यात्रा पहली है। उधर, नई दिल्ली पर अमेरिका द्वारा 50% शुल्क लगाया गया है-जिसमें आधा हिस्सा रूस से सस्ते तेल खरीदने की सजा जैसा था। इसी बीच दोनों देश व्यापारिक समझौते पर भी बातचीत कर रहे हैं।
अमेरिका को बैलेंस करने के लिए भारत ने बदली रणनीति
अमेरिका को बैलेंस करने के लिए भारत ने हाल ही में रूसी तेल खरीदी कम की और अमेरिका से 2.2 मिलियन मीट्रिक टन LPG खरीदी। लेकिन पुतिन के दौरे का मुख्य फोकस फिर भी रक्षा सौदे हैं-क्योंकि भारत को पाकिस्तान और चीन से सुरक्षा की तैयारी करनी है। जिसमें रूस हमेशा से भारत का एक मजबूत और भरोसेमंद साझेदार रहा है।
रूस-चीन साझेदारी और भारत की चुनौतियां
भारत के सामने सबसे बड़ा चैलेंज यही है कि रूस चीन का करीबी है, और चीन पाकिस्तान का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता। ऐसे में भारत पुतिन का स्वागत करके दिखा रहा है कि उसके पास "विकल्प" हैं-वह सिर्फ अमेरिका या चीन पर निर्भर नहीं। यह एक पश्चिम के लिए पीएम मोदी का एक संदेश भी है।
रूस-भारत की दोस्ती की जड़ें सिर्फ युद्ध सीमित नहीं
शीत युद्ध के दौरान भारत गुटनिरपेक्ष (non-aligned) ज़रूर था, लेकिन सोवियत संघ उसकी औद्योगिक और आर्थिक मदद करता था। वहीं जब 1970 के दशक में अमेरिका ने पाकिस्तान को सैन्य सहायता देना शुरू किया, तो रूस ने भी भारत की खुलकर मदद की जिससे दोनों के रिश्ते और मजबूत होते गए। तब से रूस एक भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार बना हुआ है।
भारत की सैन्य खरीद में रूस का दबदबा कायम
SIPRI(Stockholm International Peace Research Institute) के मुताबिक, भारत ने पिछले चार साल में रूसी हथियारों की खरीद घटाई है, लेकिन रूस अभी भी भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता है। भारत का अधिकतर रूसी सैन्य हार्डवेयर चीन को ध्यान में रखकर खरीदा जाता है-क्योंकि चीन के साथ सीमा विवाद जूनून की तरह जारी हैं। जिसकी तैयारी में रूस की मदद काफी अहम है।
चीन-पाकिस्तान की साझेदारी और भारत की रणनीति
चीन पाकिस्तान को हथियारों का बड़ा सप्लायर है। इस साल सीमा संघर्ष में पाकिस्तान ने जिन जेट्स से भारतीय विमानों को निशाना बनाया-वह चीनी सप्लाई का हिस्सा थे। भले ही पाकिस्तान के हमले सफल न रहे हों लेकिन यह बताता है कि पाकिस्तान भी अकेला नहीं है। ऐसे में भारत के पास एक बेजोड़ समर्थन होना बेहद जरूरी है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के 29 फाइटर स्क्वाड्रनों में SU-30 जेट्स का बड़ा हिस्सा शामिल है, जिसके दम पर भारत पाकिस्तान को मात दे पाता है।
भारत-रूस की डील में अब Su-57 पर भी चर्चा
क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने पुष्टि की कि इस बार भारत और रूस के बीच रूस के सबसे उन्नत फाइटर जेट SU-57 पर भी बातचीत होगी। अगर यह डील पक्की होती है तो यह पश्चिमी देशों, चीन और पाकिस्तान तीनों के लिए बड़ा झटका होगा। साथ ही फिफ्थ जनरेशन जेट भारत में बनाने पर यदि रूस तैयार हो जाता है तो यह पुतिन और मोदी की यह मुलाकात इतिहास में एक सफल मीटिंग के तौर पर दर्ज होगी।
रूस-भारत की तेल साझेदारी और विवाद
हाल के महीनों में दोनों देशों के बीच तेल व्यापार सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों से रूसी तेल सस्ता हुआ, तो भारत ने बड़ी मात्रा में खरीद बढ़ा दी। इससे भारत रूस का टॉप तेल खरीदार बन गया। भारत ने साफ कहा कि उसकी प्राथमिकता 1.4 अरब की आबादी और उसकी अर्थव्यवस्था है।
ट्रंप का भारत पर 50% टैरिफ
अगस्त में ट्रंप ने भारत पर 50% टैरिफ लगा दिया जो दो वजहों से लिया गया फैसला बताया गया। पहला, भारत का अमेरिका के साथ व्यापार घाटा और दूसरा, रूस से सस्ते तेल की भारी खरीद। इसने भारत-अमेरिका रिश्तों में तनाव बढ़ा दिया और जवाब में ट्रंप ने भारत पर दबाव डालने के लिए टैरिफ लगा दिया।
रूस पर नए अमेरिकी प्रतिबंध और भारत पर असर
अक्टूबर में ट्रंप ने रूस की दो बड़ी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए। इससे भारत के तेल आयातकों में हलचल मच गई और अनुमान है कि दिसंबर का तेल आयात पिछले तीन साल में सबसे निचले स्तर पर पहुंच सकता है। इसका तोड़ निकालने के लिए भारत अभी भी प्रयासरत है।
भारत-चीन रिश्तों में अचानक गर्माहट?
अमेरिकी दबाव इतना बढ़ा कि भारत-चीन संबंधों में भी हल्की नरमी दिखी। ट्रंप के टैरिफ लागू होने के कुछ दिनों बाद ही मोदी सात साल बाद चीन गए। ये भी भारत का अमेरिका को एक धीमा संदेश था कि भारत किसी के सामने नहीं झुकेगा। यह वही शिखर सम्मेलन था जिसका नेतृत्व शी जिनपिंग कर रहे थे और यही मोदी-पुतिन की आखिरी मुलाकात भी थी। जहां दोनों ने तकरीबन एक घंटे तक पुतिन की निजी कार में बात भी की थी। विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम दुनिया को दिखा रहा था कि भारत पश्चिम पर निर्भर नहीं है।
अमेरिका भी मानता है भारत की जरूरत
ट्रंप और बाइडेन-दोनों प्रशासन भारत को चीन के खिलाफ महत्वपूर्ण संतुलनकारी शक्ति मानते हैं।
इसलिए वे भारत को तकनीक ट्रांसफर, सैन्य अभ्यास और रणनीतिक सहयोग देते रहे हैं। मोदी और ट्रंप ने अपने राजनीतिक रिश्तों को शानदार तरीके से पेश किया, जैसे ह्यूस्टन का "Howdy Modi!" कार्यक्रम।
भारत-अमेरिका का नया 10-साल का वादा
हाल ही में भारत-अमेरिका ने टेक्नोलॉजी, खुफिया जानकारी और औद्योगिक सहयोग बढ़ाने के लिए एक नई 10-साल की साझेदारी पर सहमति दी है। सूत्रों की मानें तो यह व्यापार समझौता इस साल के अंत तक तैयार हो सकता है।
भारत का स्पष्ट संदेश: अमेरिकी डील और रूस रिश्ते-दोनों साथ
भारत मानता है कि अमेरिका के साथ बड़ा व्यापार समझौता करना और रूस से मजबूत संबंध रखना-दोनों में कोई विरोधाभास नहीं है। विश्लेषकों के अनुसार, रूस भी इस नए संतुलन को समझता है। साथ ही, रूस को इस बात का भी एहसास है कि भारत हमेशा उससे रिश्ते बाकियों की तुलना में हमेशा मजबूत रखेगा।
अमेरिका की नजरें पुतिन के दौरे पर
इस यात्रा की घोषणा के बाद से ही वाशिंगटन बेहद सतर्क है, क्योंकि पुतिन की यात्रा में नई डिफेंस डील हो सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को इस समय बेहद सावधान रहना होगा, क्योंकि व्यापार समझौता अभी पक्का नहीं हुआ है। मौजूदा स्थिति में भारत और अमेरिका के बीच नए विवाद खड़े करना सही कदम नहीं होगा।
इस एनालिसिस को सिद्धार्थ पुरोहित (वनइंडिया के चीफ-सब-एडिटर, इंटरनेशनल डेस्क) ने लिखा है। यह एनालिसिस पूरी तरह से उनकी निजी समझ का हिस्सा है।












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