हमास को इजराइल से लड़वाकर क्या हासिल करना चाहता है ईरान, जानिए मासूमों की मौत पर क्यों खुश है शैतान?
Iran role in Israel-Hamas War: संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन आज इजराइल की यात्रा कर रहे हैं, लेकिन मंगलवार को गाजा सिटी में बैपटिस्ट अरब नेशनल हॉस्पिटल पर हुए भीषण हमले के बाद बाइडेन का जॉर्डन दौरा रद्द कर दिया है। ये हमला उस वक्त हुआ, जब अमेरिकी राष्ट्रपति वॉशिंगटन डीसी से इजराइल के लिए उड़ान भर चुके थे और जॉर्डन में अरब देशों के साथ गाजा में शांति के लिए शिखर सम्मेलन होने वाला था।
लेकिन, अस्पताल पर हुए हमले के बाद जॉर्डन ने इस शिखर सम्मेलन को रद्द कर दिया है। लिहाजा, अस्पताल पर हुए इस हमले की टाइमिंग को समझना जरूरी है। हॉस्पिटल पर हुए हमले के लिए इजराइल को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, जबकि इजराइल सबूतों को पेश करते हुए दावे कर रहा है, कि गाजा स्थिति इस्लामिक जिहाद के रॉकेट हमले से अस्पताल में तबाही फैली है।

जबकि, इजराइल-हमास युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने इज़राइल, बहरीन, जॉर्डन, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और मिस्र की यात्रा की है और इन यात्राओं के दौरान उन्होंने ओम्मान में फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास से मुलाकात की थी। इसके अलावा, तुर्की के विदेश मंत्री से भी उन्होंने बात की थी।
इन यात्राओं का मकसद इस युद्ध को रोकना था, लेकिन बाइडेन के इजराइल पहुंचने से ठीक पहले गाजा पट्टी में अस्पताल को उड़ा दिया जाता है, जिसमें 500 से ज्यादा लोगों के मारे जाने की बात कही जा रही है। लिहाजा, सवाल ये उठ रहे हैं, कि कोई तो है, जो चाहता है, जो ये युद्ध खत्म ना हो। आखिर वो कौन है?
ईरान से नहीं किया गया संपर्क
अमेरिकी विदेश मंत्री ने कई अरब देशों को इस शिखर सम्मेलन में शामिल किया, लेकिन ईरान से कोई संपर्क नहीं किया गया। क्योंकि, 7 अक्टूबर को दक्षिणी इजराइल पर हुए सबसे बड़े हमास हमले के पीछे ईरान को ही मास्टरमाइंड माना जा रहा है।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पश्चिम-एशिया स्टडी के प्रोफेसर ए के रामकृष्णन कहते हैं, कि "पश्चिम के देश हमास के हमले के पीछे ईरान का हाथ मानते हैं, लिहाजा ईरान से कोई संपर्क नहीं किया गया है।"
इस्लामिक जिहाद, जिसपर इजराइल ने अस्पताल को उड़ाने का आरोप लगाया है, उसे सीधे तौर पर ईरान का समर्थन प्राप्त है और ईरान ही उसे हथियारों की सप्लाई करता है।

इजराइल पर हमास के हमले के बाद से ईरान क्या कर रहा है?
हमास ने 7 अक्टूबर को सुबह साढ़े 6 बजे इजराइल पर 20 मिनट के अंदर 5 हजार से ज्यादा रॉकेट्स दागने का दावा करता है और हमास के आतंकी पहली बार इजराइली सीमा के अंदर दाखिल होकर भारी रक्तपात मचाते हैं। इस हमले में एक हजार से ज्यादा इजराइली नागरिक मारे जाते हैं।
जिसके बाद इजराइल की तरफ से हमास के खिलाफ गाजा पट्टी में ऑपरेशन शुरू किया जाता है और भारी बमबारी की शुरूआत होती है।
और इसके बाद से ईरान, गाजा पट्टी पर इजरायली बमबारी को लेकर गाजा पट्टी के लोगों को विस्थापन और गाजा एन्क्लेव में चिंताजनक मानवीय स्थिति के मुद्दे उठा रहा है। ईरान ने इन आरोपों को खारिज कर दिया है, कि यह हमास के हमले की योजना और संचालन के पीछे उसका हाथ है।
ईरान के राजदूत ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को पत्र लिखकर अपने देश की हमास के हमले के पीछे किसी भी प्रत्यक्ष भागीदारी से इनकार किया है। हालांकि, हमास को वास्तव में वर्षों से ईरान का ही समर्थन प्राप्त है, और ईरानी अधिकारियों ने कई अवसरों पर इसे स्वीकार किया है। हमास के इस हमले के बाद ईरान के सुप्रीम लीडल बयान जारी कर कहते हैं, कि वो उन लोगों के हाथ चूमते हैं, जिन्होंने इजराइल पर हमले की योजना बनाई है।
अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन की तरह, ईरानी विदेश मंत्री होसैन अमीराब्दुल्लाहियन भी क्षेत्र के दौरे पर हैं, और ईरान के सहयोगियों से मुलाकात कर रहे हैं। बेरूत में, उन्होंने हिज़्बुल्लाह नेता हसन नसरल्लाह से मुलाकात की, और "बड़े पैमाने पर भूकंप" की चेतावनी दी। उन्होंने हमास और इस्लामिक जिहाद के नेताओं से भी मुलाकात की है।
कतर में, ईरानी विदेश मंत्री अमीरबदोल्लाहियन ने कथित तौर पर हमास के नेता, दोहा स्थित इस्माइल हानियेह से मुलाकात की। उन्होंने गाजा की स्थिति पर कतरी नेतृत्व के साथ भी बैठकें कीं। यह बैठक अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौते के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जिसके तहत तेहरान, अमेरिकी कैदियों को रिहा करेगा, जिसके बदले में अमेरिकी 6 अरब डॉलर की ईरानी संपत्ति जारी करेगा, जिसे उसने जब्त कर लिया है।
लेकिन इजराइल पर हमास के हमले के बाद, अमेरिका इस समझौते से पीछे हट गया है। हालांकि ईरान ने सितंबर में कैदियों को रिहा कर दिया था। अमेरिका और कतर, जिनके माध्यम से धन जारी किया जाना था , ऐसा नहीं करने पर सहमत हो गये हैं, क्योंकि अमेरिकी सरकार को हमास के हमले के बाद घरेलू आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका को कहा जा रहा है, कि इसका एक हिस्सा हमास के हाथों में चला जाएगा।
ईरान ने इराक और ओमान के साथ भी चर्चा की है। इसने इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) से गाजा में संकट पर चर्चा करने और प्रतिक्रिया देने के लिए एक आपातकालीन बैठक बुलाने का आग्रह किया है, और ऐसी बैठक की मेजबानी करने की पेशकश की है।

संकट में ईरान और सऊदी अरब के संबंधों की क्या भूमिका है?
गाजा में चल रही तबाही पर ईरानी राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के बीच टेलीफोन पर बातचीत एक महत्वपूर्ण राजनयिक घटना माना जा रहा है। मार्च 2023 में चीन की मध्यस्थता से हुए समझौते के माध्यम से दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों की बहाली की गई और इसके परिणामस्वरूप रियाद और तेहरान में उनके दूतावासों को फिर से खोलने के बाद नेताओं के बीच यह पहली बातचीत थी।
दूसरी तरफ, सऊदी अरब, अमेरिका के प्रोत्साहन से, संबंधों को सामान्य बनाने के लिए इजराइल के साथ बातचीत कर रहा है।
इज़राइल और गाजा की घटनाओं ने सऊदी अरब को संबंधों को सामान्य करने की प्रक्रिया पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है और सऊदी अरब ने इजराइल के साथ बातचीत रोक दी है। जाहिर है, सऊदी अरब और इजराइल के बीच की बातचीत बंद होने से ईरना से ज्यादा और कौन खुश होगा?
वहीं, सऊदी अरब इराक, यमन, सीरिया, लेबनान और फिलिस्तीन में बढ़ते ईरानी प्रभाव से चिंतित है। मार्च 2023 का मेल-मिलाप एक बड़ा कदम था, लेकिन इसने अपनी सुरक्षा के लिए ईरानी खतरे की सऊदी धारणा को पूरी तरह से नहीं बदला है।
इजराइल के लिए, ईरानी खतरे का सामना करने के लिए सऊदी के साथ समझौता महत्वपूर्ण है।
फिलहाल, गाजा और इजराइल के बीच चल रही इस लड़ाई का सबसे ज्यादा फायदा ईरान को है, क्योंकि सउदी ने इज़राइल के साथ अपनी बातचीत रोक दी है।

फिलिस्तीन के साथ कैसे हैं ईरान के संबंध?
1979 की ईरानी क्रांति फिलिस्तीन और इज़राइल के प्रति ईरान की नीति की प्रकृति को परिभाषित करने में एक प्रमुख मील का पत्थर थी। ईरानी क्रांति ने मुस्तज़फ़िन, उत्पीड़ितों, मुस्तकबीरिन, उत्पीड़कों के ख़िलाफ़ दावे को पेश किया, एक ऐसा ढांचा, जिसमें यहूदीवाद-विरोध का दावा और फ़िलिस्तीनियों के संघर्ष के लिए समर्थन शामिल था।
मुहम्मद रजा शाह पहलवी की राजशाही को उखाड़ फेंकने के बाद नए ईरानी शासन ने तेहरान में इजरायली दूतावास को फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (पीएलओ) को सौंपना दिया था। जब दूतावास भवन की चाबियाँ पीएलओ को सौंपी गईं, उस वक्त ईरान की क्रांतिकारी सरकार के प्रधान मंत्री मेहदी बज़ारगन और पीएलओ के यासिर अराफात वहां मौजूद थे।
ईरानी क्रांति और नये इस्लामिक गणराज्य के नेता अयातुल्ला खुमैनी ने रमज़ान के आखिरी शुक्रवार को अल-कुद्स दिवस (यरूशलेम दिवस) के रूप में घोषित किया, जिसे 'फिलिस्तीनी कारण' के समर्थन के दिन के रूप में मनाया जाता है।
पीएलओ के माध्यम से फिलिस्तीनी मुद्दे को ईरान के समर्थन को तब झटका लगा, जब अराफात ने आठ साल लंबे ईरान-इराक युद्ध (1980-88) में सद्दाम हुसैन के शासन का समर्थन कर दिया। बाद में, ईरान ने इज़राइल के साथ पीएलओ की बातचीत की आलोचना भी की।
इसके बाद ईरान ने फिलिस्तीन और लेबनान में 'नई ताकतों' के साथ इजरायल के खिलाफ "प्रतिरोध की धुरी" बनाने के लिए काम किया और यहीं से हमास का उदय हुआ, जो एक आतंकवादी संगठन कहा जाता है।
1987 में हमास का उदय हुआ और 1992 में 'इस्लामिक जिहाद' का, जिसे ईरान ने पाला-पोसा और इजराइल के खिलाफ सशस्त्र युद्ध के लिए तैयार किया। ये दोनों संगठन उसके बाद से ही लगातार इजराइल के खिलाफ आतंकी हमलों को अंजाम दे रहे हैं।
इसके अलावा, हिजबुल्लाह की भी स्थापना की गई।
हिजबुल्लाह, एक शिया संगठन है, जिसकी स्थापना 1982 में लेबनान में हुई थी और जिसने ईरानी क्रांति से प्रेरणा ली थी। यानि, अब तीन संगठन बन गये, जो ईरान के साथ थे।
गाजा में चल रहे युद्ध ने इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच झड़पें शुरू कर दी हैं और यह आशंका पैदा हो गई है, कि ये संघर्ष इजराइल और गाजा से फैलकर लेबनान तक फैल जाएगा। जाहिर है, ये युद्ध जितना लंबा खिंचेगा, ईरान को उतने फायदे होंगे, क्यों इस संघर्ष में नुकसान इजराइल और गाजा की है, जबकि तमाशा ईरान देख रहा है।
इज़रायल, ईरान को अपना नंबर एक क्षेत्रीय दुश्मन मानता है। इसने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष हमलों के जरिए ईरानी परमाणु कार्यक्रम पर अंकुश लगाने की कोशिश की है। ईरान की इस्लामिक गणराज्य के शुरुआती दिनों से ही इजरायली राज्य को कूटनीतिक और रणनीतिक रूप से चुनौती देने की नीति रही है।ॉ
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