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आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से लैश चीनी सेना बढ़ाएगी भारत का सिरदर्द? जानिए क्या है PLA का प्लान

चीन की सेना के सेन्ट्रल थियेटर कमांड ने बड़े स्तर पर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, ताकि भविष्य में चीनी पायलट जरूरत पड़ने पर तीव्र फैसले ले सकें।

हांगकांग, जून 29: चीन की सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने अपनी क्षमता में विस्तार के लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में भारी निवेश किया है। चीन की सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन की सेना ने अपने विरोधियों के खिलाफ आक्रामक रवैया अख्तियार करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को शामिल करने पर काफी ज्यादा निवेश करना शुरू कर दिया है। जिसके लिए चीन की पीएलए ने उन कंप्यूटर का इस्तेमाल करना शुरू किया है, जो काफी तेज निर्देश देने में सक्षम है और जिसके जरिए युद्ध से जुड़े फैसले लेने में पीएलए को काफी आसानी हो। चीन की सेना ने इसके लिए शुरूआती ट्रेनिंग भी शुरू कर दी है, जिसके बारे में रिपोर्ट है आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की टेस्टिंग के दौरान पीएलए वायुसेना ने अपने ही ग्रुप लीडर को कई बार नकली गोली मार दी थी।

आर्टिफिशियल टेक्नोलॉजी से लड़ाई

आर्टिफिशियल टेक्नोलॉजी से लड़ाई

चीनी सेना पीएलए के लीडर फेंक ने कहा कि ''आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के खिलाफ लड़ाई जीतना मुश्किल नहीं था, लेकिन इसके लिए हमें पूरी तरह से इसके आंकड़ों का विश्लेषण करना और हर तार को एक साथ जोड़ना बेहद जरूरी है। पीएलए के लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस तकनीक की टेस्टिंक के दौरान पीएलए ग्रुप लीडर फेंक ने कहा कि ''आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस दुश्मनों के खिलाफ काफी कारगार साबित हो सकता है''। ग्लोबल टाइम्स ने अपने लेख में कहा है कि ''चीन की सेना के सेन्ट्रल थियेटर कमांड ने बड़े स्तर पर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है''। पीएलए एयरफोर्स ब्रिगेड के कमांडर डू जियानफेंग ने कहा कि, "एआई ने फ्लाइट को कंट्रोल करना और सामरिक फैसलों को लेकना सीखना शुरू कर दिया है। जिससे यह हमारी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए एक मूल्यवान प्रतिद्वंद्वी बन गया है।" उन्होंने कहा कि एयरफोर्स ब्रिगेड "हाल के वर्षों" में दैनिक प्रशिक्षण में नकली और एआई-सहायता प्राप्त प्रशिक्षण को जुटाने का काम कर रही है।

पायलट को आर्टिफिशियल मदद

पायलट को आर्टिफिशियल मदद

ग्लोबल टाइम्स ने बिना नाम दिए एक पर्यवेक्षक के हवाले से लिखा है कि ''आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के द्वारा पायलटों को अलग तरह की ट्रेनिंग की जा रही है, जिसमें उन्हें बताया जा रहा है कि भविष्य में अगर युद्ध होता है तो फिर कैसे फौरन फैसले ले सकें। रिपोर्ट के मुताबिक आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के जरिए भविष्य में पायलटों को जे-20 स्टील्थ विमानों के जरिए भी स्पेशल ट्रेनिंग की जाएगी। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस टेक्नोलॉजी के जरिए पायलट को सामरिक कैलकुलेशन करने की ट्रेनिंग दी जा रही है, जिसमें मानव मस्तिष्क किसी मुश्किल घड़ी में कैसे फौरन फैसला कर ले, उसे सिखाया जा रहा है। इस तरह की तकनीक की खोज करने वाला चीन अकेला देश नहीं है। पिछले साल अगस्त में, यूएस डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी ने अपने अल्फा डॉग फाइट ट्रायल्स के परिणाम जारी किए। जहां आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से लैश "पायलट" के साथ एक नकली F-16V फाइटर मॉक वन-ऑन-वन ​​एयर ने लड़ाई लड़ी थी, जिसमें पांच राउंड के बाद भी असली अमेरिकी पायलट के खिलाफ आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से लैश पायलट अपराजित रहा था। अमेरिका ने उसके बाद से अपने एयर कॉम्बैट इवोल्यूशन जैसे और भी उन्नत टेक्नोलॉजी को शामिल किया है।

ड्रोन में भी आर्टिफिशयल इंटेलीजेंस

ड्रोन में भी आर्टिफिशयल इंटेलीजेंस

चीन मानव रहित हवाई वाहनों यानि यूएवी ड्रोन्स का भी काफी ज्यादा इस्तेमाल करता है। जिसे आमतौर पर ड्रोन के रूप में जाना जाता है, जिसमें सशस्त्र और निहत्थे दोनों प्रकार के ड्रोन शामिल हैं। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ऐसे ऑटोनॉमस प्लेटफार्मों के लिए आदर्श है, हालांकि इस वक्त आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से ड्रोन चलाते वक्त हर वक्त विशेषज्ञ की निगरानी को जरूरी माना गया है। ऑस्ट्रेलिया, जापान और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे कई देश यूएवी की एक विशेष श्रेणी विकसित कर रहे हैं, जिसे "लॉयल विंगमैन" कहा जाता है। ये एक सिंगल ड्रोन या कई यूएवी का एक ग्रुप है, जो एक मानवयुक्त लड़ाके के साथ होता है और उसके द्वारा नियंत्रित होता है। अपने सेंसर के साथ डेटा एकत्र करता है, हथियार लॉन्च करता है या डिकॉय ऑपरेशन को भी अंजाम देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन निश्चित तौर पर "लॉयल विंगमैन" पर भी रिसर्च कर रहा है, हालांकि, पीएलए अभी तक ड्रोन में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के इस्तेमाल को लेकर खामोश है।

आर्टिफिशयल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल

आर्टिफिशयल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस कोई हार्डवेयर या कोई सॉफ्टवेयर नहीं होता है, बल्कि ये अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी को एक साथ ग्रुप बनाकर तैयार किया जाता है। आज के दौर में आर्टिफिशयल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल प्लानिंग, कंप्यूटर ऑप्टिमाइजेशन, मॉडलिंग एंड सिमुलेशन, नेचुरल लेंग्वेज को समझने के साथ रोबोटिक प्रोसेस और भविष्य की योजनाएं बनाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। एआई स्वाभाविक रूप से हथियार प्रणालियों के लिए प्रदर्शन और स्वायत्तता के नए स्तरों की पेशकश करेगा। साथ ही सामरिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर फैसला लेने में मदद करेगा। हालाँकि, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस कई बार काफी ज्यादा घातक भी साबित हो सकता है, लिहाजा इसको लेकर कई कानूनी, नैतिक और राजनीतिक सवाल भी उठ रहे हैं। हांलांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि चीन जैसे देशों को इस तरह के मानवीय मूल्यों से कोई फर्क नहीं पड़ता है और वो मानवीय चिंताओं से बंधे हुए भी नहीं हैं। लिहाजा, चीन अपने एयरफोर्स में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल करेगा ही करेगा। लिहाजा भारत को भी सतर्क होने और उसी के मुताबिक आगे की तैयारी करना जरूरी है।

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