क्या ताजमहल भारतीय संस्कृति का हिस्सा है? चीन के नामी अखबार के संपादक ने उठाया सवाल

नई दिल्ली। दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल भारतीय संस्कृति का हिस्सा है या नहीं इसको लेकर चीनी अखबार पीपुल्स डेली के एडिटर लीउ रुई ने विश्लेषण किया है। हाल ही में दिल्ली में अक्षरधाम मंदिर और फिर आगरा में स्थित ताजमहल को देखने के बाद चीन के ग्लोबल टाइम्स अखबार में रुई लिखते हैं कि वे उनके दिमाग में धर्म की वजह से दरार पैदा होते हुए देखते हैं। रुई ने कहा कि अक्षरधाम के बाद जब ताजमहल स्मारक पहुंचते हैं तो आपका सामना कचरों के ढेर और सड़कों के गड्ढों से होता है, जो भारत की सांस्कृति में ताजमहल की महत्वता पर सवाल खड़े करता है।

यह दिखावा से ज्यादा कुछ नहीं है

यह दिखावा से ज्यादा कुछ नहीं है

ताजमहल का दीदार करने के बाद रुई ने लिखा कि वहां की आकर्षक दीवारों पर रंगीन पैटर्न दुनिया के विभिन्न हिस्सों से एकत्रित कर जवाहरात से भरा है। टूर गाइड ने उन्हें बताया कि इस संगमरमर पत्थर की टेक्नोलॉजी की उत्पत्ति इटली में हुई थी, लेकिन इसके निर्माण के बाद एक अद्वितीय हस्तकला का प्रयोग किया गया था। ताजमहल का ज्यादातर दीदार करने वाले इसे प्यार का एक घोषणापत्र के रूप में जानते हैं, जो उस समय में सम्राट ने अपने साम्राज्य का बड़ा धन लगाकर इसे खड़ा किया था। संक्षेप में यह सम्राट का एक मात्र दिखावा और महत्वकाक्षां से ज्यादा कुछ नहीं है।

भारतीय इसे अलग निगाह से देखते हैं

भारतीय इसे अलग निगाह से देखते हैं

1654 में ताजमहल के पूरा होने के कई सालों बाद, शाहजहां के बेटों ने सिंहासन के लिए लड़ाई लड़ीं। आखिरकार, उनके तीसरे बेटे, औरंगजेब ने अपने भाई को हराया और शाहजहां को आगरा के किले में गिरफ्तार कर बंदी बना दिया। उसके बाद समृद्ध सम्राट केवल टावर की बालकनी से इस मकबरा को देख सकता था, जहां वो कैद था। रुई लिखते हैं कि मुगल सम्राज्य भले ही इतिहास की धूल में गायब हो चुका है, लेकिन इस्लाम ने अभी जमीन नहीं छोड़ी है और भारतीय इस मकबरे आज भी एक अलग निगाह से देखते हैं।

विभिन्न स्थापत्य शैली का मिश्रण ताजमहल

विभिन्न स्थापत्य शैली का मिश्रण ताजमहल

रुई ने ताजमहल को फारसी, मध्य एशिया, हिंदू और राजपूतों की स्थापत्य शैली का एक मिश्रण है, जिसने संयुक्त रूप से इस्लामिक वास्तुकला को बनाए रखा है। इस मकबरे के पैटर्न और ऐतिहासिक तथ्यों से पता चलता है कि इसका आध्यात्मिक इस्लामिक दुनिया से तालुक है। इसी वजह से कुछ हिंदू कट्टरपंथी मानते हैं कि ताजमहल को भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं माना जाना चाहिए। कुछ लोगों ने तो ताजमहल को 'भारतीय संस्कृति पर दाग' भी कहा और कहा कि इसका 'भारतीय इतिहास में कोई स्थान नहीं होना चाहिए।'

अलग-अलग धर्मों का भारत में रहना मुश्किल

अलग-अलग धर्मों का भारत में रहना मुश्किल

रुई ने कहा कि ताजमहल भारतीय संस्कृति का हिस्सा कितना है, इसका उत्तर प्रदेश टूरिज्म की 32 पेज वाली बुक से पता लगाया जा सकता है, जिसमें राज्य के हिंदू और बौद्ध धर्म से जुड़े स्थानों का जिक्र तो हैं, लेकिन विश्व प्रसिद्ध ताजमहल को गायब कर दिया गया है। रुई अंत में लिखते हैं कि भारत को 'विश्व धर्म संग्रहालय' के रूप में जाना जाता है, लेकिन यहां अलग-अलग धर्म एक ही कमरे में शांतिपूर्वक नहीं रह सकते।

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