चीन और रूस की नई यारी, भारत पर पड़ेगी भारी? क्या है अमेरिका और मोदी सरकार की तैयारी?
बीजिंग ओलंपिक सही से हो जाए, लिहाजा चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने ताइवान के वायु रक्षा पहचान क्षेत्र में आक्रामक उड़ानों को फिलहाल रोक रखा है और चीन ये भी नहीं चाहता, कि रूस अभी यूक्रेन पर हमला करे।
हांगकांग, फरवरी 08: विश्व में बदलते हालात के बीच चीन और रूस एक दूसरे के साथ का आनंद ले रहे हैं, क्योंकि रूस का सपना यूक्रेन को जीतने की है तो चीन की मंशा ताइवान पर नियंत्रण स्थापित करने की है। लेकिन, चीन और रूस, दोनों के रास्ते में अमेरिका खड़ा है और इसका सीधा असर भारत पर पड़ता है। मॉस्को और बीजिंग के बीच मजबूत संबंधों को 5 फरवरी को उस वक्त और विस्तारित किया गया, जब रूसी राष्ट्रपति चीन के दौरे पर पहुंचे और बीजिंग ओलंपिक के उद्घाटन समारोह में शी जिनपिंग के साथ नजर आए। तो फिर सवाल ये उठता है कि, चीन और रूस की नई यारी से निपटने के लिए मोदी सरकार ने किस तरह की तैयारी की है या फिर सरकार की प्लानिंग क्या है?

चीन और रूस की नई यारी
2 साल से ज्यादा समय के शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन के बीच मुलाकात हुई है और इसस पहले एक नए युग में समन्वय बढ़ाने के लिए चीन-रूस व्यापक साझेदारी पर 5 जून 2019 को सहमति हुई थी, जब शी जिनपिंन ने पुतिन से मुलाकात की थी। साल 2013 के बाद से दोनों राष्ट्रपतियों के बीच ये आठवीं मुलाकात थी, जो दोनों देशों के बीच बनते मजबूत संबंध को रेखांकित करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि, इस वक्त जब बीजिंग में ओलंपिक गेम्स चल रहे हैं, तो चीन नहीं चाहेगा कि रूस यूक्रेन पर आक्रमण करे, क्योंकि ये ओलंपिक चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए 2022 में होने वाले दो बड़े इवेंट्स का प्रतिनिधित्व करता है। पहला इवेंट है, चीन में इसी साल राष्ट्रपति पद का चुनाव है, जो घरेलू राजनीति पर बढ़त बनाने की होगी और दूसरा इवेंट चीन की कोशिश शी जिनपिंग की छवि को अंतर्राष्ट्रीय तौर पर और भी ज्यादा मजबूत बनाने की होगी।

ताइवान के खिलाफ 'ऑपरेशन' पर रोक
बीजिंग ओलंपिक सही से हो जाए, लिहाजा चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने ताइवान के वायु रक्षा पहचान क्षेत्र में आक्रामक उड़ानों को फिलहाल रोक रखा है। इससे पहलवे 23 जनवरी को चीन के 39 विमानों ने एक साथ ताइवान के रक्षा क्षेत्र में उड़ान भरा था और इस बात की पूरी संभावना है कि, ओलंपिक खेलों के खत्म होने के बाद एक बार फिर से ताइवान को धमकाने की कोशिशें शुरू हो जाएं। ऐसे में एक्सपर्ट्स का मानना है कि, ओलंपिक खेलों के आयोजन वक्त यूक्रेन पर आक्रमण कर रूस नहीं चाहेगा की चीन परेशान हो। हालांकि, रूस ने 2008 में बीजिंग ओलंपिक से ठीक एक हफ्ते पहले जॉर्जिया पर आक्रमण किया था, लेकिन यूक्रेन के संबंध में इस तरह से फिर से कार्रवाई करने की संभावना नहीं है। कुछ टिप्पणीकारों का मानना है कि यूक्रेन में संघर्ष से चीन को फायदा होगा। हालांकि, वाशिंगटन डीसी में ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट के एक वरिष्ठ साथी रयान हैस कुछ अलग राय रखते हैं।

चीन से हटेगा अमेरिका का ध्यान
ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट के एक वरिष्ठ साथी रयान हैस का कहना है कि, 'यूक्रेन संघर्ष अस्थाई तौर पर अमेरिका का ध्यान चीन से हटा सकता है और चीन पर प्रेशर कम कर सकता है।' उन्होंने कहा कि, 'इससे रूस को चीन पर और भी ज्यादा निर्भर होना पड़ेगा और इस तरह से दोनों ही देश अपने संबंधों को परस्पर लाभ के लिए मजबूत ही रखना चाहेंगे।' उन्होंने कहा कि, 'उदाहरण के लिए चीन के वरिष्ठ नेता लगातार अमेरिका पर अपने बयानों के जरिए प्रेशर बना रहे हैं, कि अमेरिका को अपनी शीत युद्ध की मानसिकता से बाहर आने की जरूरत है और अमेरिका को रूस के पीछे नहीं पड़ना चाहिए।' हास ने कहा कि "चीन का ध्यान इस साल ओलंपिक और पार्टी कांग्रेस की होने वाली मीटिंग पर है। बीजिंग स्थिरता चाहता है। वे विदेशी अशांति का स्वागत नहीं करेंगे। अप्रत्याशित रूप से, चीनी अधिकारी तनाव कम करने और मिन्स्क समझौते को लागू करने के लिए कदम उठा रहे हैं।"

यूक्रेन संकट पर चीन का पक्ष
यूक्रेन संकट पर चीन ने हालांकि रूस का खुले तौर पर साथ दिया है, लेकिन चीनी राजदूत झांग जून ने 31 जनवरी को यूक्रेन पर एक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की खुली बैठक को संबोधित करते हुए सभी पक्षों से शांत रहने और तनाव घटाने की तरफ पहले करने का आह्वान किया है। उन्होने कहा कि, आपसी सम्मान के आधार पर समान स्तर पर परामर्श के माध्यम से और एक दूसरे की वैध सुरक्षा चिंताओं को पूरी तरह से ध्यान में रखते हुए मतभेदों को सुलझाने की जरूरत है। चीनी राजदूत ने हालांकि, सीधे तौर पर नाटो को निशाने पर लिया और कहा कि, नाटो शीत युद्ध का उत्पाद है और नाटो का विस्तार राजनीति से प्रेरित है। उन्होंने कहा कि, चीन का मानना है कि, एक देश की सुरक्षा को दूसरे देशों की सुरक्षा की कीमत पर हासिल नहीं की जानी चाहिए।

चीन के हित में नहीं है यूक्रेन युद्ध
चीनी विदेश मंत्रालय ने यूक्रेन में युद्ध के खतरे पर टिप्पणी जारी करते हुए रूस के साथ सहानुभूति जताई और अमेरिका और नाटो को घेरने की कोशिश की है। वहीं, एक्सपर्ट हास ने आगे तर्क दिया कि, आखिर यूक्रेन युद्ध बीजिंग के हित में क्यों नहीं है। उन्होंने कहा कि, "चीनी अधिकारी मानते हैं कि अगर रूस पुतिन की शी के साथ बैठक के बाद, यूक्रेन पर हमला करता है तो बीजिंग को एसोसिएशन द्वारा दोषी पाया जाएगा। चीन को खास तौर पर यूरोप और अमेरिका में खासा नुकसान होगा और उसे युद्ध भड़काने वाले के तौर पर देखा जाएगा, लिहाजा बीजिंग अमेरिका के खिलाफ रहते हुए भी यूक्रेन युद्ध रोकने की नीति पर काम कर रहा है।'

यूक्रेन को लेकर अमेरिका सतर्क
विश्लेषकों का कहना है कि, अमेरिका इस बात से वाकिफ है और अमेरिका की तरफ से रूस को लगातार चेतावनी भी दी जा रही है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि, अमेरिका जानता है कि, अगर रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, तो ये एक मॉडल बन जाएगा, जिसका अनुसरण आगे जाकर चीन, ईरान और उत्तर कोरिया जैसी दुष्ट सरकारें भी करेंगी। ताइवान के रिटायर्ड एडमिरल ली हिज-मिन, जो प्रोजेक्ट 2049 संस्थान के एक वरिष्ठ साथी हैं, वो इस थ्योरी से सहमति जताते हैं। उन्होंने कहा कि, "चीन बहुत, बहुत ही करीब से यूक्रेन संकट को देख रहा है और इसमें कोई संदेह नहीं है।' लेकिन, उन्होंने कहा कि, 'यूक्रेन टकराव के परिणामों से फिलहाल कोई फर्क नहीं पड़ता है और मुझे नहीं लगता ताइवान पर तत्काल पूर्ण पैमाने पर आक्रमण होगा, लेकिन अगर उन्हें पता चल गया, कि इस तरीके से रूस ने कामयाबी हासिल की है, तो फिर चीन को नया रास्ता मिल जाएगा और वो आगे जाकर यूक्रेन पर हमला करने से पीछे नहीं हटेगा।"

क्या तैयार है भारत सरकार?
वहीं, रूस और चीन की करीबी पर भारत सरकार की भी पैनी नजर है और भारत सरकार जानती है कि, रूस के लिए अब चीन को छोड़कर उसके पक्ष में मुड़ना संभव नहीं है। लिहाजा भारत सरकार रूस के साथ अपने रिश्ते को बचाने के साथ साथ कई और विकल्पों की तरफ देख रही होगी। भारत की दूसरी बड़ी चिंता पाकिस्तान का रूस के खेमे में जाना है। चूंकी भारत अपने सैन्य सामानों का 60 फीसदी हिस्सा अभी भी रूस से ही खरीदता है, लिहाजा चीन-रूस-पाकिस्तान का गठबंधन भारत के लिए परेशानी बढ़ाने वाला होगा।












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