पुतिन-जिनपिंग के ज्वाइंट स्टेटमेंट से भारत को 2 बड़े झटके, रूस के साथ हो गई खराब संबंधों की शुरूआत?

भारत और रूस के बीच हमेशा से अच्छे संबंध रहे हैं, लेकिन अब रूस की चीन के ऊपर इतनी निर्भरता बढ़ गई है, कि पुतिन के लिए भारत के साथ अच्छे संबंध को बनाए रखना आसान नहीं होगा।

China Russia Joint Statement

China Russia Joint Statement against India: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का रूस दौरा खत्म हो गया है और शी जिनपिंग रूस से रवाना हो चुके हैं। लेकिन, इस दौरे के अंत में रूस और चीन की तरफ से जो ज्वाइंट स्टेटमेंट जारी किया गया है, उसमें सीधे तौर पर भारत को दो बड़े झटके दिए गये हैं और इसके साथ ही, जिस बात की आशंका जताई जा रही थी, कि चीन के दबाव में भारत-रूस के बीच के अच्छे संबंध कब तक टिक पाएंगे, वो दिखने लगा है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उनके चीनी समकक्ष शी जिनपिंग की बैठक के बाद जारी एक संयुक्त बयान से संकेत मिलता है, कि दोनों देश संयुक्त रूप से G20 में यूक्रेन संकट को उठाने का विरोध करेंगे, जो भारत के लिए बहुत बड़ा झटका होगा।

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चीन और रूस का ज्वाइंट स्टेटमेंट क्या है?

हालांकि, चीन और रूस ने दिल्ली में आयोजित जी20 विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान भी यूक्रेन संकट को उठाने का विरोध किया था, लेकिन भारत इस उम्मीद में था, कि वो कोई बीच का रास्ता निकाल लेगा, जिसकी संभावना अब खत्म हो गई है। भारत इस साल जी20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है और भारत की कोशिश इस सम्मेलन को सफल बनाने की है, लेकिन चीन और रूस के बीच में यूक्रेन को लेकर जो समझौता किया गया है, उसके बाद माना जा रहा है, कि जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान भारत को सभी देशों को मैनेज करने में काफी परेशानी होगी। इसके साथ ही, ज्वाइंट स्टेटमेंट में भारत को दूसरा झटका इंडो-पैसिफिक को लेकर दिया गया है। मास्को में क्रेमलिन में दोनों नेताओं के बीच बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में इंडो-पैसिफिक रणनीति का कड़ा विरोध किया गया है। जिसमें कहा गया है, कि इसका शांति और स्थिरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके साथ ही रूस और चीन ने "ओपन एंड इन्क्लूसिव एशिया पैसिफिक सिक्योरिटी सिस्टम" के निर्माण के लिए अपनी प्रतिबद्धता जताई है।

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इंडो-पैसिफिक के खिलाफ पहली बार उतरा रूस

यह शायद पहली बार है, जब चीन और रूस ने मिलकर इंडो-पैसिफिक कंसेप्ट का विरोध किया है और इसके विरोध में दोनों देश एक साथ आकर 'एशिया पैसिफिक' रणनीति बनाने की बात कर रहे हैं। इससे पहले, रूस की रणनीति ये होती थी, कि रूसी अधिकारी आरोप लगाते थे, कि इंडो-पैसिफिक रणनीति मास्को और नई दिल्ली के बीच विभाजन पैदा करने के लिए पश्चिम की एक रणनीति है, लेकिन एशिया पैसिफिक नीति की घोषणा करना, सीधे तौर पर इंडो-पैसिफिक के खिलाफ एक बड़ी रणनीति है। इसके साथ ही, चीन और रूस के बीच ये ज्वाइंट स्टेटमेंट उस वक्त जारी किया गया है, जब जी7 देश लगातार इस दिशा में काम कर रहे हैं, कि जी20 वित्तमंत्रियों और जी20 विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान यूक्रेन में रूसी आक्रामकता की निंदा की जाए। हालांकि, खुद भारत ने भी अभी तक यूक्रेन में रूस के हमले की निंदा नहीं की है, लेकिन जी7 देशों और चीन और रूस के बीच जो नई किस्म की प्रतियोगिता शुरू हुई है, इसका गंभीर असर जी20 शिखर सम्मेलन पर पड़ने की आशंका है।

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जी20 का नाम लिए बगैर विरोध

चीन और रूस के ज्वाइंट स्टेटमेंट में जी20 का नाम तो नहीं लिया गया, लेकिन ये जरूर कहा गया है, कि दोनों पक्ष "अप्रासंगिक मुद्दों" को उठाने के लिए बहुपक्षीय मंचों के उपयोग का विरोध करेंगे। जी20 भी एक बहुपक्षीय मंच है, जिसमें दुनिया के 20 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश शामिल होते हैं। रूस और चीन, दोनों ने कहा है कि G20 को यूक्रेन युद्ध को उठाने का मंच नहीं होना चाहिए, क्योंकि इसे आर्थिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए बनाया गया था। चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से मंदारिन भाषा में पोस्ट किए गए संयुक्त बयान के मुताबिक, "दोनों पक्ष बहुपक्षीय मंचों के राजनीतिकरण और कुछ देशों द्वारा बहुपक्षीय मंचों के एजेंडे में अप्रासंगिक मुद्दों को शामिल करने की निंदा करता है, क्योंकि कुछ देश ऐसे बहुपक्षीय मंचों पर अप्रासंगिक मुद्दों को शामिल कर उस मंच के प्राथमिक कार्यों को कमजोर करने की कोशिश करते हैं।" वहीं, भारतीय पक्ष ने चीन और रूस को ऐसे देशों की लिस्ट में शामिल किया है, जिन्होंने यूक्रेन युद्ध की निंदा को लिखित तौर पर जी20 के एजेंडे में शामिल करने का विरोध किया है। पिछले साल बाली में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन में भी यूक्रेन युद्ध की लिखित निंदा को शामिल नहीं किया गया था। वहीं, इस साल फरवरी में बेंगलुरु में G20 वित्त मंत्रियों की बैठक में मसौदा विज्ञप्ति में और इस महीने की शुरुआत में नई दिल्ली में आयोजित जी20 के विदेश मंत्रियों की बैठक में भी यूक्रेन युद्ध की निंदा को एजेंडे में शामिल नहीं किया गया था।\

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इंडो-पैसिफिक में पहली बार कूदा रूस

रूस अभी तक इंडो-पैसिफिक के हलचल से दूर रहने की कोशिश करता आया है, जबकि वो खुद भी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में आता है। लेकिन, ज्वाइंट स्टेटमेंट में इंडो-पैसिफिक के शामिल होने का मतलब ये है, कि रूस भी अब इस संघर्ष में शामिल हो गया है। इंडो-पैसिफिक रणनीति में भारत सीधे तौर पर शामिल है और भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका इसे समर्थित करता है। इन चारों देशों ने इंडो-पैसिफिक के लिए क्वाड का भी गठन किया हुआ है, जिसे चीन अपने खिलाफ बनने वाला सैन्य गठबंधन मानता है, जबकि भारत सैन्य गठबंधन होने की बात से इनकार करता है। वहीं, चीन और रूस के ताजा संयुक्त बयान में कहा गया है, कि "नाटो एशिया-प्रशांत देशों के साथ "सैन्य सुरक्षा संबंधों" को मजबूत कर रहा है और क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को कम कर रहा है"। बयान में आगे कहा गया है, कि "दोनों पक्ष एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बनने वाले ग्रुप का विरोध करते हैं, क्योंकि इससे टकराव की स्थिति पैदा होती है, जिसका क्षेत्र में शांति और स्थिरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।"

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    रूस ने पहली बार इंडो-पैसिफिक का खुला विरोध किया है, लिहाजा इसका असर भारत और रूस के संबंधों पर पड़ना निश्चित है। इसके साथ ही चीन और रूस ने एशिया पैसिफिर नीति बनाने की बात कही। ज्वाइंट स्टेटमेंट में कहा गया, कि दोनों देश "एक समान, खुली और समावेशी एशिया-प्रशांत सुरक्षा प्रणाली के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध हैं, जो किसी तीसरे देश को लक्षित नहीं करता है"। यह पहली बार है, जब दोनों देशों ने सार्वजनिक रूप से हिंद-प्रशांत कंसेप्ट का विकल्प तैयार करने की बात कही है। वहीं, भारत, जिसके पिछले कुछ सालों में चीन के साथ संबंध पिछले 7 दशकों में सबसे नीचले स्तर पर पहुंच गये हैं, उसके लिए इंडो-पैसिफिक का विकल्प बनाने की चीन और रूस की घोषणा, सही नहीं है, लिहाजा मास्को और बीजिंग के बीच बढ़ते रणनीतिक और सुरक्षा संबंधों को भारत जरूर सतर्कता से देख रहा होगा, खासकर यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद जो हालात बने हैं, उसमें पहले ही भारत को रूस और अमेरिका के बीच बैलेंस बनाने में काफी मुश्किलें आ रही हैं।

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