चीन ने भारत के साथ खेला बहुत बड़ा 'माइंड गेम', जानिए क्या है ड्रैगन का साइकोलॉजिकिल ऑपरेशन?
चीन ने ये माइंडगेम कोई पहली बार नहीं खेला है, बल्कि इससे पहले पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चीन ताइवान गणराज्य के साथ साथ अमेरिका और ताइवान के समर्थक यूरोपीय देशों के साथ भी खेल चुका है।
बीजिंग/जनवरी 03: विस्तारवादी नीति के सहारे दुनिया पर अपना 'कब्जा' चाहने वाले चीन ने अरूणाचल प्रदेश में 15 जगहों के नाम बदल दिए हैं और उन जगहों के नाम या तो चीनी अक्षरों से रखे गये हैं या फिर रोमन अक्षरों से। हालांकि, ये सभी क्षेत्र भारत के अभिन्न अंग हैं, लेकिन चीन ने ऐसा क्यों किया है? ध्यान से देखने पर बता चलता है कि, चीन ने भारत के खिलाफ बहुत बड़ा साइकोलॉजिकर युद्ध की शुरूआत की है, जो उसके शस्त्रागार में दुश्मनों को धोखा और विश्वासघात करने वाले हथियार हैं। आखिर अरूणाचल में 15 जगहों का नाम बदलने के पीछे ड्रैगन का क्या मकसद है, आईये समझने की कोशिश करते हैं।

चीन की साइकोलॉजिक लड़ाई
विरोधी के साथ 'दिमागी युद्ध' करना सन त्जू के दिनों से ही कम्युनिस्ट पार्टी के शस्त्रागार के धोखे, विश्वासघात और प्रोपेगेंडा साधनों के साथ एक पुरानी चीनी रणनीति है। अरूणाचल प्रदेश के 15 जगहों का चीनी नामकरण मंदारिन भाषा में करना उसी मनोवैज्ञानिक युद्ध का एक हिस्सा है जिसे नरेंद्र मोदी सरकार को परेशार रखने और सीमा समाधान पर बीजिंग की एक सामान्य रणनीति घोषित करने के लिए डिजाइन किया गया है और अरूणाचल प्रदेश में जगहों के नाम बदलने के पीछे चीन का बहुत बड़ा माइंडगेम है और ये माइंडगेम चीन के 'तियानक्सिया' सिद्धांत का ही एक रूप है, जिसके तहत पूरी दुनिया में चीन सिर्फ एक बादशाह को मानता है, जो चीन का है।

भारत के खिलाफ माइंडगेम
चीन ने ये माइंडगेम कोई पहली बार नहीं खेला है, बल्कि इससे पहले पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चीन ताइवान गणराज्य के साथ साथ अमेरिका और ताइवान के समर्थक यूरोपीय देशों के साथ भी खेल चुका है और अभी भी खेल रहा है। जिसके तहत ताइवान के क्षेत्र में बार बार चीन की एयरफोर्स अपने युद्धक विमान से ले जाती है और वायु सीमा क्षेत्र का उल्लंघन करती है। चीन ने साल 2021 में 900 से ज्यादा युद्धक विमानों को ताइवान के हवाई क्षेत्र में भेजा है और चीन के माइंड गेम को समझिए, कि अब दुनिया के लिए ताइवान में चीनी युद्धक विमानों का जाना एक नया नॉर्मल हो चुका है। ये नया नॉर्मल उसी तरह से है, जैसे पिछले कई महीनों से हमें मास्क की आदत हो चुकी है और मास्क हमारे जीवन का एक हिस्सा बन गया है, बिल्कुल नये नॉर्मल की तरफ। चीन ने ताइवान के साथ भी ऐसा ही किया है और ठीक इसी तरह से चीन ताइवान को लेकर अगला कदम उठाएगा।

वैश्विक शक्तियों को धमकाया
चीनी ड्रैगन के युद्धक विमान ताइवान के दक्षिण-पश्चिमी वायु क्षेत्र या एडीआईजेड का लगातार साल भर उल्लंघन करते रहे और 28 नवंबर को तो चीन ने एक साथ 27 युद्धक विमानों को ताइवान के क्षेत्र में भेज दिया था। लड़ाकू विमानों, बमवर्षकों और हवाई टोही विमानों ने ताइवान को धमकाया और संदेश अमेरिका समेत तमाम वैश्विक शक्तियों को दिया गया। 2022 की सुबह से ही चीनी टोही विमान ने एक जनवरी और दो जनवरी को ताइवान के वायुक्षेत्र का फिर से उल्लंघन किया है और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अपने सर्वशक्तिमान नेता शी जिनपिंग के आदेश के तहत ताइवान के साथ खतरनाक माइंड गेम खेल रही है।

बीजिंग के खेल को समझता भारत
भारत ने अरुणाचल प्रदेश में 15 जगहों के चीनी नामकरण को खारिज कर दिया है और विश्लेषकों का मानना है कि, भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा योजनाकार बीजिंग के इस 'माइंड गेम' को समझते हैं और कहते हैं कि, सही जगह और सही समय पर इसका जवाब दिया जाएगा। नरेंद्र मोदी सरकार चीनी साईकोलॉजिकल ऑपरेशन के प्रति प्रतिक्रिया देने के मूड में नहीं है, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि, चीन को फ्री लंच की इजाजत नहीं दी जाएगी।

दलाई लामा को बुलाने से भड़का चीन?
कुछ विश्लेषकों का कहना है कि, चीन का अरूणाचल प्रदेश में 15 जगहों का नाम बदलने का फैसला आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के उस कदम की प्रतिक्रिया हो, जिसके तहत मोहन भागलत ने तिब्बत के धर्म गुरु दलाई लामा को 21 दिसंबर को मैक्लॉडगंज में मुलाकात की थी और कार्यक्रम में आमंत्रित किया था। आरएसएस प्रमुख ने न केवल 14वें दलाई लामा के साथ विचारों का आदान-प्रदान किया था, बल्कि धर्मशाला में निर्वासित तिब्बत सरकार के नेताओं से भी मुलाकात की थी। निर्वासित तिब्बती सरकार के सांसदों के साथ मुलाकात की थी, जिसके बाद बौखलाए चीन ने भारतीय सांसदों को सीधे तौर पर चिट्ठी लिखकर धमकी थी और कहा था कि, चीन के ताइवान जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण तिब्बत भी है।

भारतीय सांसदों को धमकी
चीनी दूतावास ने दिसंबर 2021 में दलाई लामा के स्वागत समारोह में भाग लेने वाले छह सांसदों को चिट्ठी लिखकर सीधे तौर पर धमकी दी और उन्हें तिब्बत का समर्थन करने से परहेज करने के लिए कहा था। इससे पहले भी जब यूपीएम की सरकार थी तो चीनी दूतावास और चीनी वाणिज्य दूतावास के बेहद जूनियर लेवल के अधिकारियों के ने प्रोटोकॉल की सारी सीमाओं को तोड़ते हुए भारत के कैबिनेट मंत्रियों से सवाल पूछ लिया था, जिनमें प्रणब मुखर्जी भी शामिल थे, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने थे। इसके अलावा भी, बीजिंग को हर बार भारतीय वीवीआईपी के अरुणाचल प्रदेश का दौरा करने पर बयानबाजी करने की आदत है।

चीन के माइंडगेम में फंस जाता है भारत?
एक तरफ चीन जहां तिब्बत, सिंकियांग और ताइवान से संबंधित किसी भी मुद्दे को काफी गंभीरता से लेता है, वहीं, भारत ने अतीत में तिब्बत और सिंकियांग में कस्बों और शहरों के नाम बदलने की बीजिंग का एक तरह से साथ ही दिया है। बीजिंग में भारतीय दूतावास ने चीनी प्रोपेगेंडा मीडिया को कभी भी सीधे तौर पर नोट नहीं लिखा है और अपनी शिष्टाचार का पालन किया है, जो नियमित रूप से भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा लड़ाई जारी रखता है और भारत के खिलाफ दुष्प्रचार करता रहता है। ऐसे में सवाल ये है, कि आखिर भारत के महासर्वेक्षक आखिर कब नया नक्शा जारी करेंगे, जिसमें चीन ने जिन तिब्बती क्षेत्रों का नाम बदला है, उन्हें पुराने नाम से ही संबोधित करेगा, ना कि उस नाम से, जो चीन ने बदला है।












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