America Iran Ceasefire: पाकिस्तान नहीं चीन ने कराया सीजफायर! क्यों नहीं आया सामने? क्या दिया बयान?
America Iran Ceasefire: अमेरिका और ईरान के बीच 40 दिनों की जंग के बाद हुए दो हफ्ते के सीजफायर में एक बड़ा ट्विस्ट सामने आया है। इस पूरे गेम में चीन (China) एक ऐसे प्लेयर की तरह सामने आया जो पर्दे के पीछे से गेम खेल रहा था। इस खबर को जानने के बाद ऐसा लग रहा है कि अमेरिका, इजरायल, ईरान और पाकिस्तान के हाथ में भले ही कुछ न हो लेकिन चीन का इस युद्ध पर पूरी तरह से कंट्रोल था। खबर ये भी आई है कि ईरान को बातचीत के लिए राजी करने वाला पाकिस्तान या आसिम मुनीर नहीं बल्कि चीन था। खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस मामले पर अपना बयान दे दिया है।
ट्रंप ने क्या कहा?
ट्रंप से जब AFP ने सवाल किया कि चीन की इस पूरे मामले में भूमिक थी? इसका जवाब देते हुए ट्रंप ने कहा- 'हां'। यानी साफ है कि चीन बैकग्राउंड में एक्टिव था। दिलचस्प बात ये है कि डेडलाइन खत्म होने से सिर्फ एक घंटा पहले मंगलवार शाम ट्रंप ने सीजफायर की घोषणा कर दी। लेकिन पर्दे के पीछे ये खेल हुआ कैसे वो भी समझ लेते हैं।

चीन के लिए क्यों जरूरी था सीजफायर?
अब बड़ा सवाल, चीन को इससे क्या फायदा? दरअसल, मई 2026 में चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping से मिलने के लिए ट्रंप की चीन यात्रा तय थी। लेकिन युद्ध के कारण यह मार्च से टल गई थी। ऐसे में, शांति स्थापित करना चीन के लिए रणनीतिक जीत भी थी और आर्थिक स्थिरता के लिए भी जरूरी था।
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Associated Press की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने सीधे सामने आए बिना पाकिस्तान, तुर्किए और मिस्र जैसे देशों के जरिए ईरान पर दबाव बनाया। यानी, फ्रंट पर कोई और था, लेकिन सारे पासे चीन चल रहा था। यहां तक कि पाकिस्तान को क्या करना है, ये भी चीन ही बता रहा था। ये खबर भी कुछ देर बाद सामने आई है।
तो फिर ऑफीशियल स्टेटमेंट क्यों बचता रहा चीन?
हालांकि चीन ने खुलकर अपनी भूमिका स्वीकार नहीं की। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता Mao Ning (माओ निंग) ने सिर्फ इतना कहा कि- "यह युद्ध होना ही नहीं चाहिए था, इसे तुरंत खत्म होना चाहिए।" साथ ही उन्होंने ग्लोबल इकोनॉमी और एनर्जी सिक्योरिटी को ज्यादा तव्ज्जो देते हुए बात की।
पाकिस्तान कैसे बना मीडिएटर?
वहीं जब हमने इस मामले पर एक्सपर्ट से पूछा तो उन्होंने बताया कि इस बीच चीन ने पाकिस्तान को आगे कर पूरा खेल खेला। जिसमें पाकिस्तान की टॉप लीडरशिप को आगे कर उन्हें बताया कब, कैसे और क्या करना है। जिसके बाद दोनों देशों के लिए अलग-अलग प्रपोजल बनवाने में भी मदद की। चूंकि चीन खुद को सामने नहीं करना चाहता था इसलिए उसे ऐसा देश साथ में चाहिए था, कि अगर मामला बिगड़े तो चेहरा उसका खराब हो। लेकिन चीन की ये मेहनत काम आई।
UN प्रपोजल पर चीन-रूस का Veto
एक और बड़ा कदम, चीन ने रूसे के साथ मिलकर UN के एक प्रस्ताव को वीटो कर दिया। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाया जाए। लेकिन चीन के UN दूत Fu Cong ने कहा कि "जब अमेरिका खुद हालात को इतना बिगाड़ रहा है, तो ऐसा प्रस्ताव गलत मैसेज देगा।" इसके बाद दोनों देशों ने Veto लगाकर अमेरिका पर दबाव बना लिया।
साइलेंट प्लेयर या रियल पावर
पूरी कहानी में एक बात साफ है कि अमेरिका और ईरान फ्रंट पर दिख रहे हैं लेकिन पीछे से गेम कोई और चला रहा है। चीन ने बिना ज्यादा शोर मचाए डिप्लोमेसी में अपनी ताकत दिखाई है। इसीलिय इस सीजफायर का बड़ा क्रेडिट बीजिंग को दिया जाना गलत नहीं होगा।
Iran कैसे माना?
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने कन्फर्म किया कि ईरान दो हफ्ते तक अपने सैन्य ऑपरेशन को रोक देगा। साथ ही, उसने यह भी कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों को सुरक्षित गुजरने दिया जाएगा। यह कदम ग्लोबल ट्रेड और ऑयल सप्लाई के लिए बेहद जरूरी था। लेकिन ये देखना अभी भी बाकी है कि ये 15 दिन का सीजफायर क्या लॉन्ग टर्म की शांति होगी या ये ट्रंप की एक और चाल है जिसके बाद कभी भी दोबारा हमले शुरू हो सकते हैं।
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