रूस से प्रतिबंध हटाया, UNSC में साथ निभाया, यूक्रेन युद्ध में कैसे मौका तलाश रहा है चीन?

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि, यूक्रेन युद्ध को चीन ताइवान पर हमला करने के लिए एक प्रमुख अवसर और प्रमुख घटना के तौर पर देख रहा है।

बीजिंग/मॉस्को, फरवरी 25: यूक्रेन में रूस ताबड़तोड़ हमले कर रहा है और ऐसी आशंका है कि, आज रात होते होते पूरे यूक्रेन की राजधानी कीव पर रूस का कब्जा हो जाएगा। इस बीच रूस को घेरने के लिए विश्वस्तर पर फैसले लिए जा रहे हैं और अमेरिका समेत यूरोपीय देशों ने रूस और रूसी राष्ट्रपति के खिलाफ कई अत्यंत सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं, लेकिन इन सबके बीच चीन का रवैया हर कार्रवाई से परे है। चीन क्या चाह रहा है और शी जिनपिंग के दिमाग में क्या चल रहा है, ये कोई समझ नहीं पा रहा है।

चीन के दिमाग में क्या है?

चीन के दिमाग में क्या है?

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि, यूक्रेन युद्ध को चीन ताइवान पर हमला करने के लिए एक प्रमुख अवसर और प्रमुख घटना के तौर पर देख रहा है। इस बीच चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने शुक्रवार को वरिष्ठ यूरोपीय अधिकारियों से कहा कि, चीन यूक्रेन सहित तमाम देशों की संप्रभुता का सम्मान करता है, लेकिन नाटो के पूर्व की ओर विस्तार के बारे में रूस की चिंताओं को ठीक से संबोधित किया जाना चाहिए। पश्चिमी नेताओं की हफ्तों की चेतावनियों के बाद भी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने गुरुवार को उत्तर, पूर्व और दक्षिण से यूक्रेन पर आक्रमण कर दिया है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से किसी यूरोपीय राज्य पर सबसे बड़ा हमला है।

युद्ध से पहले चीन के साथ समझौता

युद्ध से पहले चीन के साथ समझौता

सबसे दिलचस्प बात ये है कि, युद्ध से पहले फरवरी महीने में ही चीन और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी को लेकर समझौता हुआ है और 4 फरवरी की बीजिंग दौरे पर गये रूसी राष्ट्रपति और शी जिनपिंग के बीच काफी अहम मुलाकात हुई थी और एक्सपर्ट्स का मानना है कि, उसी बैठक के दौरान रूस ने चीन से यूक्रेन युद्ध के दौरान 'चुप' रहने का आश्वासन ले लिया और अब चीन यूक्रेन युद्ध पर दुनिया को बहका रहा है। एक तरफ वो कूटनीतिक बातचीत की बात करता है, तो दूसरी तरफ चीन का हर दूसरा वाक्य रूस की चिंताओं से जुड़ा हुआ है। लिहाजा, सवाल उठता है कि, क्या चीन इस यूक्रेन पर आए इस विपत्ति के मौके पर अपने लिए कोई अवसर तो नहीं खोज रहा है।

चीन क्या दिखा रहा है…ये देखिए

चीन क्या दिखा रहा है…ये देखिए

दुनिया के सामने चीन खुद को 'शांति का मसीहा' के तौर पर प्रोजेक्ट करने की कोशिश कर रहा है, ताकि उसके व्यापारिक संबंध ना तो यूरोपीय देश से खराब हों, ना यूक्रेन से खराब हों और ना ही रूस से। और उसी का नमूना पेश करते हुए चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि, यूक्रेन में मौजूदा स्थिति ऐसी नहीं है, जिसे बीजिंग देखना चाहता है और वह जल्द से जल्द रूस और यूक्रेन के बीच सीधी बातचीत का स्वागत करेगा। चीन के विदेश मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, वांग यी ने कहा कि, "चीन सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने और उसकी रक्षा करने की दृढ़ता से वकालत करता है।" विदेश मंत्रालय ने आगे कहा, कि "यह समान रूप से यूक्रेन मुद्दे पर लागू होता है।" इसके साथ ही चीन के विदेश मंत्री ने ब्रिटिश विदेश सचिव लिज ट्रस, यूरोपीय संघ के विदेश मामलों के प्रमुख जोसेप बोरेल और फ्रांसीसी राष्ट्रपति के सलाहकार के साथ अलग-अलग फोन कॉल पर बात भी किए हैं और चीन दिखाने की कोशिश कर रहा है, कि वो युद्ध के खिलाफ है।

रूस की चिंता पर चीन को ध्यान

रूस की चिंता पर चीन को ध्यान

रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के विदेश मंत्री ने टेलीफोन पर बातचीत के दौरान रूस की सुरक्षा चिंताओं का मुद्दा इन देशों के प्रतिनिधियों के सामने उठाया। उन्होंने कहा कि, "नाटो के पूर्वी विस्तार (रूस की तरफ) को लेकर लगातार हुई पांच बैठकों को देखते हुए, रूस की वैध सुरक्षा मांगों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और रूस की चिंताओं को ठीक से संबोधित किया जाना चाहिए।" वहीं, जब यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल में अमेरिका ने यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पेश किया और उसपर वोटिंग की गई, तो चीन वोटिंग से गैर-हाजिर हो गया और ये भी चीन की रूस के साथ एकजुटता दिखाने की एक चाल ही है।

यूक्रेन युद्ध में मौका तलाशता चीन

यूक्रेन युद्ध में मौका तलाशता चीन

युद्ध में यूक्रेन जिस तरह से अकेला पड़ा है और रूस जिस तरह से बेखौफ होकर यूक्रेन पर हमले कर रहा है, उसने चीन के हाथों में बहुत बड़ा मौका दे दिया है। विदेश नीति एक्सपर्ट्स का मानना है कि, जिस तरह से यूक्रेन को बचाने में अमेरिका बेबस नजर आ रहा है, उसे चीन देख रहा है और चीन आगे जाकर उस फॉर्मूले का इस्तेमाल ताइवान के खिलाफ कर सकता है। वहीं, एक्सपर्ट्स का मानना है कि, भारत के खिलाफ भी चीन इस नीति से आगे बढ़ सकता है, लेकिन ताइवान के ऊपर अब सबसे बड़ा खतरा मंडराने लगा है। इसके साथ ही इंडो-पैसिफिक में भी चीन का विस्तारवाद काफी तेजी से बढ़ेगा और चीन अब पूरी तरह से जान गया है कि, अमेरिका अब छोटे देशों को बचाने की स्थिति में नहीं रहा है।

यूक्रेन युद्ध पर बंट गई दुनिया

यूक्रेन युद्ध पर बंट गई दुनिया

यूक्रेन संकट के बीच दुनिया कई हिस्सों में बंटी नजर आ रही है। एक तरफ यूक्रेन के राष्ट्रपति ने साफ कर दिया है कि, वो यूक्रेन से अकेले जंग लड़ रहे हैं, वहीं, रूस के साथ चीन, पाकिस्तान, सऊदी अरब जैसे कई मुस्लिम देश खड़े नजर आ रहे हैं। भारत ने भी खुले तौर पर रूस का विरोध नहीं किया है और भारत का रूख कहीं ना कहीं, रूस के पक्ष का ही नजर आ रहा है। जबकि, यक्रेन के साथ अमेरिका, यूरोपीय देश और नाटो है, जिसने सैन्य मदद करने से मना कर दिया है। वहीं, दुनिया की नजर लगातार चीन पर बनी हुई थी, कि आखिर यूक्रेन विवाद पर चीन क्या फैसला करता है।

रूस पर लगाए प्रतिबंधों को हटाया

रूस पर लगाए प्रतिबंधों को हटाया

चीन ने यूक्रेन संकट के बीच रूस के खिलाफ अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा लगाए जा रहे प्रतिबंधों के प्रभाव को कम करने के लिए रूस के खिलाफ पूर्व में लगाए गये कई प्रतिबंधों को हटा लिया है। चीन की तरफ से पहले कहा गया था कि, चीन प्रतिबंध लगाने में विश्वास नही करता है और फिर चीन ने रूस के खिलाफ कई बड़े प्रतिबंध हटा लिए हैं। माना जा रहा है कि, रूस को अमेरिका के प्रेशर से बचाने के लिए चीन ने ये कदम उठाए हैं और जिस बात की आशंका जताई जा रही थी, कि अमेरिका प्रतिबंधों की रस्सी को जितना कसेगा, रूस और चीन उतने करीब आएंगे, उसकी पुष्टि चीन के उठाए गये इस कदम से हो गई है।

पुतिन के साथ खुलकर आए शी जिनपिंग

पुतिन के साथ खुलकर आए शी जिनपिंग

चीनी अखबार साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, चीन की सरकार ने रूस के खिलाफ लगाए गये गेहू निर्यात प्रतिबंध को हटा लिया है। ये रूस के लिए बहुत बड़ी राहत है, क्योंकि दुनिया में सबसे ज्यादा गेहूं निर्यात रूस ही करता है और पश्चिमी देशों के प्रतिबंध के बाद रूस के गेहूं निर्यात पूरी तरह से ठप पड़ने वाली थी। लेकिन चीन के प्रतिबंध हटाने के बाद साफ हो गया है कि, अब रूस अपना गेहूं चीन को बेचेगा। अखबार के मुताबिक, चीन के जनरल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ कस्टम ने यूक्रेन युद्ध के बीच रूस पर लगाए गये गेहूं प्रतिबंध को हटाने की घोषणा की है। अखबार ने कहा है कि, इस महीने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बैठक के बाद ये फैसला लिया गया था।

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