भारत में तीसरे एयरक्राफ्ट पर ही माथापच्ची, उधर दुश्मन बनाने जा रहा है चौथा परमाणु एयरक्राफ्ट कैरियर
विश्लेषकों का मानना है कि चीन ने इस साल फुजियान एयरक्राफ्ट कैरियर को अपनी नेवी में शामिल कर लिया है और ऐसे में चीन का अगला एयरक्राफ्ट कैरियर परमाणु ऊर्जा से संचालिक हो सकता है।
China Nuclear Aircraft Career: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले महीने भारतीय नौसेना को दूसरा एयरक्राफ्ट कैरियर सौंपा है और पिछले एक दशक से ज्यादा वक्त से भारत में दूसरे एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण कार्य चल रहा था, जो पिछले महीने नौसेना में शामिल हो गया है। लेकिन, भारत का प्रचंड दुश्मन चीन अब चौथे एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण करने जा रहा है और पूरी आशंका है, कि चीन का ये एयरक्राफ्ट कैरियर परमाणु ऊर्जा से चलने वाला है। चीन अगर परमाणु पनडुब्बी का निर्माण कर लेता है, तो चायनीज नेवी की क्षमता में अभूतपूर्व उछाल आ जाएगा और जाहिर सी बात है, कि चीन की शक्ति में इजाफा होना भारत के लिए बहुत बड़ा खतरा होगा।

परमाणु एयरक्राफ्ट कैरियर बनाएगा चीन!
इसी महीने चीनी अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने बताया है कि, विश्लेषकों का मानना है कि चीन ने इस साल फुजियान एयरक्राफ्ट कैरियर को अपनी नेवी में शामिल कर लिया है और ऐसे में चीन का अगला एयरक्राफ्ट कैरियर परमाणु ऊर्जा से संचालिक हो सकता है। वहीं, चाइना स्टेट शिपबिल्डिंग कॉरपोरेशन (CSSC) ने कहा है कि, परमाणु ऊर्जा से संचालित एयरक्राफ्ट कैरियर का 2027 तक निर्माण करना चीन की परमाणु-टेक्नोलॉजी के लिए एक बड़ी सफलता होगी। हालांकि, चीनी सैन्य मामलों के सोशल मीडिया अकाउंट वेव ऑफ साउथ चाइना सी के एक लेख में कहा गया है, कि चीन के एयरक्राफ्ट कैरियर को बनाने वाली कंपनी CSSC को अभी तक सरकार की तरफ से इजाजत नहीं मिली है, लिहाजा यह सुनिश्चित नहीं है, कि चीन परमाणु-संचालित एयरक्राफ्ट बनाने के लिए तकनीक हासिल कर सकता है या नहीं। हालांकि, सैन्य विशेषज्ञ ने ये भी कहा कि, डीजल से चलने वाला विमानवाहक पोत चीन की जरूरतों के लिए ज्यादा अनुकूल होगा।

एयरक्राफ्ट कैरियर का हो रहा निर्माण
यह पहली बार नहीं है, जब चीन ने परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत बनाने की अपनी महत्वाकांक्षाओं को आवाज दी है। इससे पहले मई महीने में एशिया टाइम्स की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था, कि चीन ने फरवरी 2018 में एक परमाणु-संचालित वाहक विकसित करना शुरू किया था, जो 2025 तक PLA नौसेना की मदद करेगा। इस रिपोर्ट में पॉपुलर साइंस के एक लेख का भी हवाला दिया गया था, जिसमें CSSC लीक का उल्लेख किया गया था, जो चीन के नियोजित परमाणु-संचालित वाहक का नकली-बिल्ड अप दिखाता है। इस विमानवाहक पोत को अस्थायी रूप से "टाइप 003" नाम दिया गया है। लीक हुए CSSC के दस्तावेजों से पता चला था, कि एयरक्राफ्ट कैरियर का ये नया क्लास "नब्बे हजार से एक लाख टन के बीच हो सकता है और इसके डेक पर विमान को उतारने के लिए इलेक्ट्रोमैग्नेटिकली असिस्टेड लॉन्च सिस्टम (EMALS) कैटापोल्ट्स लगा होगा। यह संभवतः J-15 फाइटर्स, J-31 स्टील्थ फाइटर्स, KJ-600 एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल एयरक्राफ्ट, एंटी-सबमरीन वारफेयर हेलीकॉप्टर और स्टील्थ अटैक ड्रोन का एक बड़ा एयर विंग ले जाने में सक्षम होगा।"

चीन का मकसद क्या है?
चीन का जब ये परमाणु संचालित एयरक्राफ्ट कैरियर बनकर तैयार हो जाएगा, उसके बाद चीन टाइप 055 क्रूजर और अगली पीढ़ी की पनडुब्बियों के साथ भागीदारी करते हुए पूरी दुनिया के समंदर में अफने मिशन को लॉन्च कर सकता है और इसके बाद चीन की नेवी की क्षमता दुर्जेय हो जाएगी। वहीं, रिपोर्ट में इस एयरक्राफ्ट में जिन विशेषताओं को क्षमताओं के बारे में बताया गया है, अगर वो सही है, तो इसका मतलब ये हुआ, कि चीनी एयरक्राफ्ट कैरियर क्षमता के मामले में अमेरिका के बराबर आ खड़ा होगा। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट में बताया गया है कि, चीन ने अपने चौथे एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए डिजाइन का काम पूरा कर लिया है, जिसके 2025 से 2027 के बीच बनने की संभावना है। हालांकि, सैन्य सूत्रों का कहना है कि, चीन का नया एयरक्राफ्ट कैरियर पारंपरिक ऊर्जा से ही संचालित हो सकता है।

परमाणु कैरियर का संचालन काफी महंगा
रिपोर्ट में कहा गया है कि, पारंपरिक एयरक्राफ्ट कैरियर को कम रखरखाव की आवश्यकता होती है और परमाणु एयरक्राफ्ट कैरियर बनाने की तुलना में उनके निर्माण में आने वाली लागत काफी कम होती है। हालांकि, चीन का फुजियान एयरक्राफ्ट कैरियर जितनी क्षमताओं से लैस है, उसके लिए परमाणु ऊर्जा से संचालित एयरक्राफ्ट कैरियर होना ज्यादा सही है। क्योंकि, परमाणु ऊर्जा से संचालित रिएक्टर पोत को व्यावहारिक रूप से उसकी क्षमता को असीमित सीमा तक बढ़ा देते हैं और बिजली विमान गुलेल के लिए भाप उत्पन्न करते हैं। फ़ुज़ियान चीन का पहला वाहक है, जिसमें इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च सिस्टम (ईएमएएलएस) है, जो विमानों को लॉन्च करने के लिए स्टीम कैटापोल्ट्स के बजाय शक्तिशाली इलेक्ट्रोमैग्नेट का उपयोग करता है। EMALS को एयरफ्रेम पर जेंटलर कहा जाता है, जो इसके रखरखाव डाउनटाइम को कम करता है और उसकी लाइफ को भी बढ़ाता है।

किन देशों के पास परमाणु एयरक्राफ्ट कैरियर
अब तक, सिर्फ अमेरिका और फ्रांस ही परमाणु-संचालित एयरक्राफ्ट कैरियर का संचालन करते हैं। परमाणु ऊर्जा से संचालित अमेरिकी पोत का वान निमिच्ज है, जो फोर्ड कक्षाओं का उपयोग करता है। वगहीं, फ्रांसीसी पोत का नाम चार्ल्स डी गॉल है। और अब साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट में इस बात के पूरे संकेत दिए गये हैं, कि चीन जिस पोत का निर्माण करने लाला होगा, वो परमाणु ऊर्जा से संपन्न होगा और चीन परमाणु विमानवाहक पोर्ट की लिस्ट में शामिल हो जाएगा। कैनबरा स्थित ऑस्ट्रेलियन स्ट्रेटेजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट के एक वरिष्ठ सुरक्षा विश्लेषक मैल्कम डेविस का मानना है कि, चीन का अगला वाहक परमाणु-संचालित होगा और इसके लिए उन्होंने कुछ वजहें बताई हैं।

चीन क्यों बना रहा परमाणु पोत?
डेविस ने एशिया टाइम्स को बताया क, परमाणुल ऊर्जा से संचालित पोत का निर्माण अगर चीन कर लेता है, तो फिर उसकी नौसेना के पास काफी लंबी दूरी तक यात्रा करने की क्षमता बढ़ जाएगी, वहीं परमाणु पोत का निर्माण कर शी जिनपिंग अपने उस महात्वाकांक्षी लक्ष्य के एक और कदम पास आ जाएंगे, जिसमें उन्होंने चीन की नेवी को दुनिया की नंबर-1 नेवी बनाने का वादा किया था। वहीं, अगर चीन की वैश्विक महात्वाकांक्षाओं को देखें तो उसका मकसद चीन की वैश्विक महत्वाकांक्षाएं उसके मैरीटाइम सिल्क रोड, यूरोप से एशिया तक फैले चीनी-पट्टे या वित्त पोषित बंदरगाहों का एक नेटवर्क तैयार करने की होगी। यह नेटवर्क चीन-केंद्रित समुद्री व्यापार मार्ग के रूप में कार्य करता है, जिसे सुरक्षित करने के लिए लंबी दूरी की बिजली प्रक्षेपण क्षमताओं की आवश्यकता हो सकती है, जिसमें परमाणु-संचालित वाहक क्षमता की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। इसके अलावा, लड़ाकू अभियानों के लीए भी चीन अपनी महान शक्ति की स्थिति दिखाने के लिए राजनीतिक संपत्ति दावा करने की कोशिश कर सकता है।द्वितीय विश्व युद्ध के अंत के बाद से, अमेरिका ने केवल उन विरोधियों के खिलाफ अनुमेय वातावरण में वाहक संचालित किए हैं जिनके पास समुद्री नियंत्रण से लड़ने का कोई साधन नहीं है।

भारत में तीसरे एयरक्राफ्ट पर माथापच्ची
कुछ महीने पहले नौसेना के सूत्रों ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया था कि, सरकार को IAC-2 की आवश्यकता के बारे में आश्वस्त होने के लिए, "मानसिकता में बदलाव" की आवश्यकता है। पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ने एक अन्य विमानवाहक पोत में निवेश के खिलाफ बात की थी, और सरकार को सुझाव दिया था, कि लक्षद्वीप और अंडमान और निकोबार द्वीपों को एयरक्राफ्ट कैरियर देने के बजाय "अकल्पनीय" नौसैनिक संपत्ति के रूप में विकसित किया जा सकता है। लेकिन, नौसेना के अधिकारियों ने कहा है कि, विशाल हिंद महासागर क्षेत्र की रक्षा के लिए दिन-रात लगातार वायु शक्ति की आवश्यकता होती है। लिहाजा, एक तीसरा वाहक नौसेना की क्षमता में वृद्धि प्रदान करेगा, जो भविष्य में आवश्यक होगा। इसके साथ ही, यह भी तर्क दिया जाता है कि, अब जबकि भारत ने ऐसे जहाजों (आईएनएस विक्रांत) को बनाने की क्षमता विकसित कर ली है, तो फिर इसका निर्माण किया जाना चाहिए, ताकि भारत के पास इसे बनाने की क्षमता बनी रही और "समुद्री उड्डयन की कला" जिसे पिछले 60 वर्षों में विकसित की गई है, उसकी विशेषज्ञता को भी बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए।

किस देश के पास कितने युद्धपोत?
यूनाइटेड स्टेट्स नेवी के पास फिलहाल 11 एयरक्राफ्ट कैरियर हैं और दूसरे नंबर पर चीन है, जो काफी आक्रामक तरीके से एयरक्राफ्ट कैरियर प्रोग्राम पर बढ़ रहा है। कुछ महीने पहले तक चीन के पास सिर्फ 2 ही एयरक्राफ्ट कैरियर थे, लेकिन अगस्त महीने चीन की नौसेना में तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर तैनात किया गया और रिपोर्ट के मुताबिक, चीन काफी तेजी के साथ तीन और एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण कर रहा है, जिनमें से दो एयरक्राफ्ट कैरियर अगले पांच सालों के अंदर चीन की नौसेना में शामिल हो जाएंगे। जिनमें एक परमाणु ऊर्जा से संचालित हो सकता है। वहीं, भारतीय नौसेना के अधिकारी बताते हैं कि, भले ही भारत IAC-2 परियोजना को आगे बढ़ा रहा है, लेकिन ये सोचने की बात है, कि भारत में एक युद्धपोत के ऑपरेशनल होने में 10 साल से ज्यादा का समय लगेगा। (सभी तस्वीर फाइल)












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