China: कौन हैं द्वारकानाथ कोटणीस? वो भारतीय जिसे भगवान मानते हैं चीनी लोग, जिनपिंग भी करते हैं झुककर प्रणाम
China: भारत-चीन के संबंध 1962 के युद्ध के बाद ज्यादातर मौकों पर तल्ख ही रहे हैं। बावजूद इसके एक भारतीय शख्स ऐसा भी हुआ जिसके आगे हर चीनी शख्स न सिर्फ सिर झुकाता है बल्कि उन्हें पूरे चीन में भगवान की तरह पूजा जाता है। उनका नाम है डॉ. द्वारकानाथ कोटणीस। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान महज 32 साल की उम्र में वे चीन में जवानों की जान बचाते-बचाते खुद शहीद हो गए लेकिन अपने चीन में कार्यकाल के दौरान उन्होंने इलाज के जरिए सैंकड़ों चीनी सैनिकों की जान बचाई थी। उनके बारे में बहुत कम भारतीय ही जानते हैं।
चीनी राजदूत ने दी जानकारी
भारत में चीन के राजदूत शू फेइहोंग ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर इस मेमोरियल हॉल के उद्घाटन की जानकारी साझा की। उन्होंने लिखा कि डॉ. कोटणीस की हिम्मत और इंसानियत आज भी लोगों को प्रेरणा देती है। उन्होंने कहा कि डॉ. कोटणीस को भारत और चीन-दोनों देशों में एक नायक की तरह याद किया जाता है।

भारत और चीन दोनों में अमर हैं कोटणीस
चीन ने डॉ. कोटणीस के सम्मान में डाक टिकट, स्मारक और मेडिकल संस्थान बनाए हैं। वहीं भारत में भी उनके नाम पर सड़कें और संस्थान हैं। उनकी ज़िंदगी पर बनी 1946 की फिल्म 'डॉ. कोटणीस की अमर कहानी' ने उन्हें आम लोगों के बीच अमर बना दिया। लेकिन इस बात को भी अब दशक हो गए हैं। हाल ही में इसी महीने पश्चिम बंगाल में उनकी 83वीं पुण्यतिथि भी मनाई गई, जिसमें चीनी कॉन्सुलेट के राजनायिक शू वेई मौजूद रहे।
कैसे चीन पहुंचे डॉ. कोटणीस?
डॉ. द्वारकानाथ कोटणीस एक भारतीय डॉक्टर थे, जिन्होंने 1937 से 1945 के बीच चले द्वितीय चीन-जापान युद्ध के दौरान चीन में अपनी मर्जी से सेवाएं दी थीं। उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने चीनी नेताओं के अनुरोध पर पांच भारतीय डॉक्टरों का एक मेडिकल मिशन चीन भेजा था, जिसमें डॉ. कोटणीस भी शामिल थे।
बाकी लौटे, लेकिन डॉक्टर कोटणीस ने अदा किया फर्ज
यह मेडिकल टीम समुद्र और ज़मीन के रास्ते चीन के युद्धग्रस्त इलाकों तक पहुंची। मिशन पूरा होने के बाद बाकी डॉक्टर भारत लौट आए, लेकिन डॉ. कोटणीस ने चीन में ही रहने का फैसला किया। उन्होंने उत्तरी चीन के यानान क्षेत्र और बाद में जिन-चा-जी सीमा क्षेत्र में मोर्चे पर काम किया।
गोलियों के बीच भी नहीं रुका इलाज
डॉ. कोटणीस ने लगातार गोलाबारी के खतरे के बीच मोबाइल अस्पतालों और गुफाओं में भी इलाज किया। वे रोज़ करीब 18 घंटे काम करते थे और कई बार बिना बिजली के सर्जरी करनी पड़ती थी। एनेस्थीसिया का इस्तेमाल कर उन्होंने गोली लगने, मलेरिया और पेचिश (जो उस वक्त जानलेवा बीमारी थी) जैसी बीमारियों से पीड़ित करीब 650 से 1000 लोगों की जान बचाई।
भाषा सीखी, डॉक्टर तैयार किए
इलाज के साथ-साथ डॉ. कोटणीस ने चीनी (Mandarin) भाषा भी सीखी। उन्होंने स्थानीय डॉक्टरों को ट्रेनिंग दी और साफ-सफाई व स्वास्थ्य पर ट्रेनिंग दी। साल 1941 में उन्होंने चीनी नर्स गुओ क़िंगलान से शादी की, जो उनके मानवीय कामों में हमेशा उनके साथ रहीं।
बीमारी ने ली जान
लगातार युद्ध के तनाव के कारण डॉ. कोटणीस की बचपन की मिर्गी की बीमारी गंभीर हो गई। 9 दिसंबर 1942 को हीबेई प्रांत के गुओलियांगलियांग गांव में इलाज के दौरान वे अचानक गिर पड़े और उनका निधन हो गया। कहा जाता है कि उनके आखिरी शब्द भी अपने साथियों को संघर्ष जारी रखने की प्रेरणा देने वाले थे।
चीन में बन गए 'नेक कोटणीस'
डॉ. कोटणीस चीन में एक किंवदंती बन गए और उन्हें 'कोटणीस द गुड' यानी 'नेक कोटणीस' कहा जाने लगा। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता माओ त्से-तुंग उनके काम से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनके लिए एक शोक संदेश लिखा और उन्हें "चीन का सच्चा मित्र" बताया।
सम्मान की लंबी परंपरा
1949 के बाद चीन ने कोटणीस मेडिकल कॉलेज बनाया, डाक टिकट जारी किए और शिनजियांग के एक कस्बे का नाम उनके नाम पर रखा। भारत में जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें महान देशभक्त कहा। वी. शांताराम की फिल्म 'डॉ. कोटणीस की अमर कहानी' ने उनकी विरासत को हमेशा के लिए जीवित कर दिया।
तनाव के दौर में भी दोस्ती की मिसाल
1962 के युद्ध और 2020 की सीमा झड़पों के बाद भारत-चीन रिश्तों में भले ही तनाव रहा हो, लेकिन डॉ. कोटणीस आज भी दोनों देशों के बीच इंसानियत का पुल बने हुए हैं। उनके नाम पर होने वाले सालाना कार्यक्रम लोगों के बीच रिश्तों को मजबूत करते हैं।
डायरी में दर्ज इंसानियत
उनकी पत्नी द्वारा संकलित किताब 'डॉ. कोटणीस इन चाइना' में उनकी डायरी के अंश शामिल हैं। उसमें उन्होंने लिखा था-"मुझे कोई पछतावा नहीं है, मानवता की सेवा करना ही मेरा धर्म है।" यही पंक्ति उनके पूरे जीवन और बलिदान को बयान करती है।
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