चीन में हद से ज्यादा घट रहे सामानों के दाम, आर्थिक मंदी में फंसेगा ड्रैगन, लोग क्यों नहीं कर रहे खरीददारी?
China Deflation: होता ये है, कि अगर किसी देश में सामानों की कीमत बढ़ने लगती है, तो उस देश की सरकार टेंशन में आ जाती है और देश की जनता आसमान छूती महंगाई से परेशान हो जाती है, जैसे इस वक्त भारत में टमाटर के दामों में आग लगी है। लेकिन, चीन में इसका ठीक उल्टा हो रहा है।
चीन में सामानों की कीमत लगातारक गिर रही हैं और राजधानी बीजिंग में सामानों की कीमत सात साल पुराने कीमत पर पहुंच गई हैं। चीन में उपभोक्ता कीमतें अपस्फीति के कगार पर पहुंच गईं। चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो (एनबीएस) ने सोमवार को कहा, कि उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) जून में लगातार नौवें महीने गिर गया, जो एक साल पहले की तुलना में 5.4 प्रतिशत कम है, और ये दिसंबर 2015 के बाद से सबसे बड़ी गिरावट है।

चीन में सामानों के दाम में गिरावट
चीन में जून महीने में सामानों की कीमत 4.6 प्रतिशत की गिरावट आई है, जबकि रॉयटर्स की पोल सर्वे में कहा गया है, कि ये गिरावट 5 प्रतिशत तक की है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) साल-दर-साल अपरिवर्तित रहा, जबकि पोर्क की कीमतों में तेजी से गिरावट के कारण मई में 0.2 प्रतिशत की बढ़त देखी गई थी।
लेकिन, ये वृद्धि फरवरी 2021 के बाद से यह सबसे धीमी गति से बढ़ोतरी थी।
लेकिन अपस्फीति क्या है? और दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए इसका क्या मतलब है? आइये समझते हैं।
अपस्फीति क्या है?
फोर्ब्स के अनुसार, अपस्फीति मुद्रास्फीति के बिल्कुल विपरीत है। यह तब होता है, जब संपूर्ण अर्थव्यवस्था में परिसंपत्तियों और वस्तुओं की कीमतें कम हो जाती हैं। इसकी निगरानी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) जैसे आर्थिक संकेतकों के माध्यम से की जाती है।
इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक, मुद्रा की आपूर्ति कम होने या ऋण उपलब्धता कम होने के कारण भी अपस्फीति हो सकती है।
अपस्फीति तब होती है, जब वस्तुओं और संपत्तियों की कीमतें कम हो जाती हैं, जिससे उपभोक्ताओं की खरीदने की क्षमता बढ़ जाती है।
यह एक अच्छी बात लगती है, है ना? लेकिन ऐसा नहीं है।
फोर्ब्स के अनुसार, अपस्फीति होने का मतलब है, कि देश में मंदी आ सकती है।
वस्तुओं की कीमतें कम होते देख लोग खर्च करने में देरी करने लगते हैं, क्योंकि उन्हें कीमतों में और कमी होने की संभावना दिखने लगती है।
वहीं, सामानों की कम कीमत होने की वजह से कंपनयों का इनकम कम होने लगता है, जिसके परिणामस्वरूप बेरोजगारी बढ़ सकती है और ब्याज दरें बढ़ सकती हैं। इस घटना को विशेषज्ञ 'डूम लूप' के रूप में संदर्भित करते हैं।
इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, केंद्रीय बैंक आमतौर पर अर्थव्यवस्था में धन का प्रवाह बढ़ाकर अपस्फीति का मुकाबला करते हैं। इस स्थिति में, केंद्रीय बैंक भी उधार लेना आसान बनाते हैं, खर्च बढ़ाते हैं और अपस्फीति से लड़ने के लिए टैक्स में कटौती करते हैं।
चीन पर अपस्फीति का क्या पड़ सकता है प्रभाव?
औद्योगिक और उपभोक्ता उत्पादों की मांग कमजोर होने से चीन में महामारी के बाद सुधार की गति पहली तिमाही में देखी गई तेजी से धीमी हो गई है, जिससे दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के बारे में चिंताएं बढ़ गई हैं।
मैक्वेरी ग्रुप के मुख्य चीन अर्थशास्त्री लैरी हू ने साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट को बताया, कि 'चीन का डेटा उम्मीद से कमजोर है और इस बात के सबूत हैं, कि घरेलू मांग कमजोर है।'
इसे इस तरह से समझिए, कि दुकानों के सामान बिक नहीं रहे हैं, जिससे उन्होंने सामानों के दाम घटाने शुरू कर दिए हैं, ताकि कम कीमत देखकर लोग सामान खरीदें।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह चीन के लिए बुरा संकेत है।
पिनपॉइंट एसेट मैनेजमेंट के मुख्य अर्थशास्त्री झांग झीवेई ने द स्ट्रेट्स टाइम्स को बताया, कि "अपस्फीति का जोखिम बहुत वास्तविक है।"
बार्कलेज के अर्थशास्त्रियों ने एक शोध नोट में कहा, कि "हमें लगता है कि अधिक चुनौतीपूर्ण अपस्फीति का माहौल और विकास की गति में तेज मंदी, चीन को लेकर हमारे विचार का समर्थन करती है कि पीबीओसी ने बैंक दर-कटौती चक्र में प्रवेश किया है।"
उम्मीद से कम मुद्रास्फीति की रीडिंग ने चीन की करेंसी युआन में गिरावट के साथ वित्तीय बाजारों में दस्तक दी और एशियाई शेयर भी लाल निशान में आ गए हैं।
बीजिंग ने 2023 में औसत उपभोक्ता मुद्रास्फीति का लक्ष्य लगभग तीन प्रतिशत निर्धारित किया है। 2022 में कीमतें साल-दर-साल दो प्रतिशत बढ़ीं।
सोसाइटी जेनरल एसए में ग्रेटर चाइना के अर्थशास्त्री मिशेल लैम ने ब्लूमबर्ग को बताया, कि "आज का डेटा निश्चित रूप से अधिक नीतिगत ढील के लिए तर्क देता है, जो नीति निर्माता पहले से ही कर रहे हैं, लेकिन काफी ज्यादा तोल-मोल के तरीके से।"
तमाम एक्सपर्ट्स इस नतीजे पर पहुंचकर एकमत हैं, कि चीन गंभीर आर्थिक मंदी में फंस सकता है।
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