China Dagu Glacier को बचाने की जद्दोजहद में जुटा! वैज्ञानिकों ने सफेद शीट से ढकी आइस, मकसद क्या है?
China Dagu Glacier को बचाने की जद्दोजहद में जुटा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, चीनी वैज्ञानिकों ने सफेद शीट से आइस की पूरी परत ढक दी है। इसका मकसद पिघल चुकी 70 फीसद से अधिक बर्फ के बाद बचे ग्लेशियर को सहेजना है।
डागु ग्लेशियर के बारे में एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, वैज्ञानिकों का एक समूह दक्षिण-पश्चिमी चीन में डागु ग्लेशियर की चोटी के पास देखा गया था। कुली सफेद कपड़े के मोटे रोल लेकर उनके साथ-साथ चल रहे थे।

रिसर्च करने गई शोधकर्ताओं ने सफेद चादरों को ग्लेशियर के 4,300 वर्ग फुट (400 वर्ग मीटर) से अधिक क्षेत्र में फैलाने की योजना बनाई। कवर के तौर पर इस्तेमाल हो रही सफेद शीट, ग्लेशियर को गर्मी से प्रभावी ढंग से बचाने और इसकी कुछ बर्फ को संरक्षित करने के लिए डिज़ाइन की गई है।
लगभग 4300 स्क्वायर फीट ग्लेशियर का जितना एरिया कवर किया गया है। इतने हिस्से में दो बेडरूम, किचन और हॉल (2 BHK) वाले एवरेज साइज के दो फ्लैट आसानी से बनाए जा सकते हैं।
पर्यावरण से जुड़ी रिपोर्ट्स के अनुसार, दशकों से, डागु ग्लेशियर के आस-पास रहने वाले हजारों लोगों का जीवन इस पिघलते बर्फ पर निर्भर है। ग्लेशियर का पिघला हुए पानी दक्षिण-पश्चिमी चीन में रहने वाले लोगों के पीने के पानी की जरूरतों को पूरा करता है।
इससे जलविद्युत भी तैयार करने में मदद मिलती है। तिब्बती पठार पर डागु ग्लेशियर का शानदार नजारा देखने हर साल लगभग दो लाख से अधिक पर्यटक आते हैं। इससे करीब 2000 स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलता है, लेकिन ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण सबकुछ खतरे में है।
चीनी वैज्ञानिकों ने जिस सफेद शीट से डागु ग्लेशियर को कवर किया है इससे पिघलने की गति पर अंकुश लगने की पूरी उम्मीद है। पिछली आधी सदी में ग्लेशियर की 70 फीसद से अधिक बर्फ पिघल चुकी है।
हालांकि, डागु ग्लेशियर से जुड़े एक शोधकर्ता का मानना है कि सफेद शीट से ग्लेशियर बचाना वैसा ही है, जैसे किसी मरीज की तय मौत को टालने का प्रयास हो रहा है। उन्होंने कहा कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में भारी कटौती ही एकमात्र समाधान है।
रिसर्चर के अनुसार, चीन कार्बन उत्सर्जन में दुनिया का सबसे बड़ा स्रोत है। नानजिंग विश्वविद्यालय में 32 वर्षीय एसोसिएट प्रोफेसर झू बिन ने कहा, जिन तरीकों पर हम काम कर रहे हैं, भले ही वे प्रभावी साबित हों, इससे पिघलने की गति सिर्फ धीमी ही होगी।
उन्होंने आगाह किया कि अगर पृथ्वी इसी गति और दर से गर्म होती रही, तो ग्लेशियर को हमेशा के लिए सुरक्षित रखने का कोई रास्ता नहीं बचेगा। उनका परिवार उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित था।
प्रोफेसर झू के अनुसार, उन्होंने परिवार की चिंता और सहकर्मियों की खिल्ली को दरकिनार करते हुए. ग्लेशियरों को संरक्षित करने के लिए "कुछ ऐसा जो कठिन लेकिन सही है" करने का फैसला लिया।
डागु ग्लेशियर को कवर करने के बारे में एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, ग्लेशियरों को परावर्तक सामग्री की चादरों से ढंकना कोई नया विचार नहीं है। यूरोपीय स्की रिसॉर्ट लगभग दो दशकों से अपनी बर्फ की सुरक्षा के लिए सफेद कंबल का उपयोग कर रहे हैं।
हालांकि, चीन ने इस फॉर्मूले का प्रयोग हाल ही में शुरू किया है। 2020 की शुरुआत में झिंजियांग और डागु में एक ग्लेशियर पर छोटे स्तर पर परीक्षण किया गया। इससे ग्लेशियर के पिघलने की दर धीमी हुई है।
प्रोफेसर झू के अनुसार, शोध से पता चलता है कि सफेद शीट लगाने के बाद 93% से अधिक सूरज की रोशनी को रोकने में सफलता मिली। सफेस शीट को बनाने में सेलूलोज़ एसीटेट, पौधों से बने प्राकृतिक फाइबर का इस्तेमाल किया गया है।
इस पदार्थ का उपयोग दुर्गम ग्लेशियरों पर ड्रोन की मदद से जमा छोटे कणों के रूप में भी किया जा सकता है। अध्ययनों से पता चला है कि ग्लेशियरों के कुछ हिस्सों को विशेष सामग्रियों से ढकने से असुरक्षित सतहों की तुलना में बर्फ के पिघलने को 50% से 70% तक कम किया जा सकता है।
हालांकि, स्विटजरलैंड की रिसर्च इंस्टीट्यूट- ईटीएच ज्यूरिख में ग्लेशियोलॉजी के प्रोफेसर मैथियास हस के अनुसार, ग्लेशियर को ढकने वाली शीट से निकलने वाले रसायन या प्लास्टिक के कण स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र और झरने में बहने वाले पानी की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।
प्रोफेसर हस के अनुसार, स्थानीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से निपटने के लिए शीट से कवर करना बहुत अच्छा समाधान है। खासकर जब विशिष्ट आर्थिक लाभ हों। हालांकि, वास्तविक उत्तर "बहुत स्पष्ट" यानी जलवायु को बचाना है।
नीदरलैंड के यूट्रेक्ट विश्वविद्यालय में जलवायु विज्ञानी जोहान्स ओर्लेमैन्स के अनुसार, झू और उनकी टीम ने जिस सफेद शीट से डागू ग्लेशियर को ढका है, उनसे बड़े ग्लेशियरों पर प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि वे लगातार घूम रही हैं।
उन्होंने कहा, "छोटे ग्लेशियर खत्म हो रहे हैं और हिलते नहीं हैं। आप उन्हें आसानी से ढक सकते हैं। जैसे ही ग्लेशियर हिलता है, कवर नष्ट हो जाता है।ओर्लेमैन्स के मुताबिक बड़े ग्लेशियर को शीट से कवर रखने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा अव्यावहारिक है।
समय के साथ गंदगी जमा होने का भी खतरा है। इससे सतह काली पड़ जाएगी। समय बीतने के साथ शीट सूर्य के प्रकाश को रोकने में उतना प्रभावी नहीं बचेगा। उन्होंने ग्लेशियर को बचाने के लिए कृत्रिम बर्फ जमा करने की वकालत भी की।
Dagu expedition के बारे में प्रोफेसर झू बताते हैं कि मौसम में सुधार के बाद चौथे दिन ग्लेशियर पर सफेद शीट बिछाने में कामयाबी मिली। सितंबर में कवर हटाने वापस आएंगे। इसके बाद मूल्यांकन होगा कि शीट कितनी अच्छी तरह काम कर रही है।
प्रयोग तीन से पांच साल तक जारी रहेगा, जिसके बाद वैज्ञानिक तय करेंगे कि चीन के अन्य ग्लेशियरों पर अपनी सामग्री का उपयोग करने की कोशिश की जाए या शीट का प्रयोग दूसरे देशों में भी ले जाया जाए।
रिपोर्ट्स के अनुसार, तिब्बती पठार आज जितना ऊंचा है, ऐसा आकार बनने में लाखों साल लगे हैं। भारत और एशिया की टेक्टोनिक प्लेटें आपस में टकराईं, जिससे यहां ग्लेशियर और बर्फ जमा हो गई। इससे चीन के अलावा गंगा, मेकांग और यांग्त्ज़ी सहित क्षेत्र की लगभग सभी प्रमुख नदियों को पानी मिलता है।
पूरे एशिया में अरबों लोगों की जीवन रेखा डागु ग्लेशियर पर निर्भर है, ऐसा कहने में कोई गुरेज नहीं। केवल 50 वर्षों में इस पठार के 15% से अधिक ग्लेशियर पिछल चुके हैं, जो काफी चिंताजनक है। तेजी से पिघलते ग्लेशियर के कारण समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। आए दिन बाढ़ की खबरें आ रही हैं।
चिंताजनक हालात के बीच ग्लेशियर के कुछ हिस्सों को ढंकना एक गहरे घाव पर पट्टी बांधने जैसा है। डागु ग्लेशियर प्रबंधन ब्यूरो के उप प्रमुख हुआंग शिहाई के अनुसार ग्लेशियर के निचले भाग में हेइशुई काउंटी में जलवायु परिवर्तन का बड़ा असर दिखा है। 2006 के बाद से गर्मियां पहले आ रही हैं।
शिहाई बताते हैं कि इस क्षेत्र में सर्दियों का औसत तापमान बढ़ा है। नदियां गंदी हो गईं और चरम मौसम की घटनाएं अधिक बार हुईं। बर्फीले पहाड़ के पास रहने के बावजूद हुआंग ने कभी भी छोटी बाजू की शर्ट का ज्यादा उपयोग नहीं किया। अब वह साल की शुरुआत में मई से ही हाफ शर्ट पहनना शुरू कर देते हैं।
उन्होंने कहा, तेजी से पिघलता डागू हमेशा के लिए गायब हो सकता है। उस पर निर्भर लोगों पर इसका क्या असर पड़ेगा? इस सवाल पर शिहाई कहते हैं कि दक्षिण-पश्चिमी चीन में ग्लेशियर पर निर्भर लोगों के बीच ''संकट की भावना है।''
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