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गंदे पानी से माइक्रोप्लास्टिक निकालने में सब्जियां आएंगी काम

Provided by Deutsche Welle

नई दिल्ली, 25 मार्च। वैज्ञानिकों ने ओकरा और उसी के जैसी कुछ और लिसलिसे पदार्थ वाली सब्जियों का इस्तेमाल कर गंदे पानी से माइक्रोप्लास्टिक को साफ करने का विचार पेश किया है. यह नई रिसर्च अमेरिकन केमिकल सोसायटी की बैठक में प्रस्तुत की गई. फिलहाल काम में लाए जाने वाले केमिकल तरीकों की बजाय एक प्राकृतिक विकल्प का स्वागत हुआ है. फिलहाल जिन रसायनों से माइक्रोप्लास्टिक को साफ किया जाता है, उसके खुद भी सेहत पर कई बुरे असर होते हैं.

इस रिसर्च की लीड इन्वेस्टीगेटर रजनी श्रीनिवासन ने बताया, "माइक्रोप्लास्टिक या किसी भी और तरह के मैटीरियल को साफ करने से पहले, इसके लिए कोई प्राकृतिक पदार्थ खोजने की कोशिश करनी चाहिए जो खुद भी जहरीला ना हो." श्रीनिवासन अमेरिका के टार्लटन स्टेट यूनिवर्सिटी से जुड़ी रिसर्चर हैं.

भिंडी के गुण

ओकरा का इस्तेमाल विश्व के कई हिस्सों में कई तरह के व्यंजनों में एक गाढ़ा बनाने वाले एजेंट के रूप में होता है. जैसे कि लुइजियाना की स्टू डिश गंबो में. वहीं, भारत समेत कुछ दक्षिण एशियाई देशों में यह भिंडी के नाम से घर घर में कई तरह से पका कर खाई जाती है.

इसके पहले श्रीनिवासन ने रिसर्च कर पता लगाया था कि ओकरा और कुछ अन्य पौधों के ऐसे गोंद जैसे लिसलिसे पदार्थ से कपड़ा उत्पादन की प्रक्रिया से निकली गंदगी और कई सूक्ष्मजीवों को कैसे साफ किया जा सकता है. इसमें मिली सफलता के बाद उन्होंने यह पता लगाने का फैसला किया कि क्या वह इसे माइक्रोप्लास्टिक के प्रदूषण पर आजमा कर ऐसे ही नतीजे पा कर सकती हैं.

पानी में घुले माइक्रोप्लास्टिक

1950 के दशक से जो आठ अरब टन से भी ज्यादा प्लास्टिक बनाया गया है उसका 10 फीसदी से भी कम हिस्सा रिसाइकिल हो पाया है. आज माइक्रोप्लास्टिक की समस्या का स्रोत भी यही प्लास्टिक है जो समय के साथ टूटते टूटते छोटा होकर धरती के लगभग सारे कोनों तक पहुंच चुका है.

सागरों से लेकर पानी के हर स्रोत तक, मिट्टी और हवा तक और हमारे खाने की चीजों में भी आज माइक्रोप्लास्टिक मिला हुआ है. प्लास्टिक के पांच मिलीमीटर से भी छोटे टुकड़े अगर शरीर में चले जाएं तो वे 'इनजेस्टेड माइक्रोप्लास्टिक' कहलाते हैं.

शरीर में गया तो क्या होगा

रिसर्चरों ने पाया है कि इनके मछलियों के शरीर में जाने से कई तरह का नुकसान पहुंचता है. मछलियों में इसके कारण प्रजनन तंत्र बिगड़ता है, उनके बढ़ने की दर कम हो जाती है और लीवर को भी नुकसान पहुंचता है.

वैज्ञानिकों ने बताया है कि इंसान के शरीर में जाकर यह कई बुरे असर दिखा सकते हैं हालांकि पक्के तौर पर बताने के लिए इस बारे में अभी और रिसर्च की जरूरत है. अब तक यह पता चला है कि माइक्रोप्लास्टिक में कैंसर पैदा करने और म्यूटेशन करवाने की ताकत होती है. जिससे कई तरह के कैंसर और डीएनए म्यूटेशन की संभावना बढ़ सकती है.

अभी कैसे होती है सफाई

एक वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट प्लांट में आमतौर पर माइक्रोप्लास्टिक अलग करने के दो चरण होते हैं. पहले चरण में, सतह पर तैरने वाले कणों को छान कर निकाल लिया जाता है. हालांकि इनका बहुत छोटा हिस्सा होता है.

बाकी को फ्लॉकूलेंट की मदद से निकाला जाता है. यह चिपकाने वाले केमिकल होते हैं जो माइक्रोप्लास्टिक को चिपका कर बड़ी बड़ी गुठलियां सी बना देती हैं. यह बड़े टुकड़े पानी के नीचे तली में जम जाते हैं जिन्हें पानी से अलग कर दिया जाता है.

इसमें समस्या यह है कि फ्लॉकूलेंट कहलाने वाले यह पॉलीएक्रीलामाइड रसायन टूट कर खुद भी जहरीले रसायन बनाते हैं.

अपनी नई खोज के जरिए श्रीनिवासन और उनके साथी रिसर्चरों ने जो तरीका निकाला है उससे ओकरा, एलोए, कैक्टस, मेथी और इमली जैसी प्राकृतिक चीजें वही काम कर सकती हैं. उन्होंने इन पौधों से कार्बोहाइड्रेट्स की श्रृंखला पॉलीसैकेराइ़ड्स निकाल कर माइक्रोप्लास्टिक घुले गंदे पानी पर टेस्ट किया.

हुआ यह कि ओकरा के पॉलीसैकेराइड्स और मेथी के कॉम्बीनेशन ने सागर के गंदे पानी को सबसे अच्छी तरह से साफ किया. वहीं, कुछ दूसरे परीक्षणों में ओकरा के पॉलीसैकेराइड्स और इमली के कॉम्बीनेशन ने ताजे पानी के सैंपल को सबसे अच्छी तरह से साफ किया.

आगे का रास्ता

कुल मिलाकार इस रिसर्च में पाया गया कि पौधों से मिलने वाले पॉलीसैकेराइड्स या तो रसायनों के बराबर या उससे भी बेहतर सफाई कर पाते हैं. इसके अलावा, पौधों से मिलने वाले यह रसायन जहरीले नहीं हैं और इन्हें मौजूदा ट्रीटमेंट प्लांटों में इस्तेमाल किया जा सकता है.

श्रीनिवासन ने उम्मीद जताई है कि आगे इस तरीके को बड़े स्तर पर लागू करने और प्रक्रिया को व्यावहारिक स्तर पर लाने की दिशा में काम हो. इससे और ज्यादा पीने का साफ पानी मिलने का रास्ता खुल सकेगा.

आरपी/एए (एएफपी)

Source: DW

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