Chagos Island: 60 द्वीपों का खजाना! क्यों चागोस पर फिदा हुए डोनाल्ड ट्रंप? भारत के लिए कितना बढ़ेगा खतरा?

Chagos Island: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय कदम को लेकर चर्चा में हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप हिंद महासागर में स्थित ब्रिटिश क्षेत्र चागोस द्वीप समूह (Chagos Islands) को खरीदने की पर विचार कर रहे हैं। ब्रिटिश अखबार The Telegraph की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप का मुख्य लक्ष्य इस क्षेत्र में मौजूद डिएगो गार्सिया (Diego Garcia) सैन्य अड्डे पर परमानेंट कंट्रोल हासिल करना है। ट्रंप के इस रुख ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। क्योंकि चागोस द्वीप सिर्फ एक द्वीप समूह नहीं, बल्कि हिंद महासागर के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक इलाकों में से एक माना जाता है।

आखिर कहां है चागोस द्वीप समूह?

चागोस द्वीप समूह हिंद महासागर के बीचों-बीच स्थित है। इसमें करीब 60 छोटे-छोटे द्वीप शामिल हैं। भले ही इन द्वीपों पर आबादी बहुत कम है, लेकिन इनकी रणनीतिक अहमियत बेहद बड़ी है। इसी द्वीप समूह में स्थित डिएगो गार्सिया सैन्य अड्डा अमेरिका और ब्रिटेन के लिए दशकों से बेहद महत्वपूर्ण रहा है। यह अड्डा हिंद महासागर, पश्चिम एशिया और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों के लिए एक प्रमुख केंद्र माना जाता है। यही वजह है कि ट्रंप इस क्षेत्र को लेकर विशेष रुचि दिखा रहे हैं। साथ ही यह भारत से भी ज्यादा दूर नहीं है।

Chagos Island

ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच समझौता और नया विवाद

इस पूरे विवाद की शुरुआत 2024 में हुए एक महत्वपूर्ण समझौते से जुड़ी है। उस समय ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच एक डील हुई थी, जिसके तहत ब्रिटेन चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपने पर सहमत हुआ था। हालांकि इस समझौते में एक खास व्यवस्था भी रखी गई थी। इसके तहत ब्रिटेन को डिएगो गार्सिया सैन्य अड्डे का इस्तेमाल जारी रखने के लिए 99 साल की सैन्य लीज मिलने वाली थी। ब्रिटेन का कहना था कि इस व्यवस्था से मॉरीशस की संप्रभुता का सम्मान भी होगा और साथ ही क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था भी बनी रहेगी।

ट्रंप ने क्यों वापस ली अपनी मंजूरी?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप ने शुरुआत में इस समझौते को मंजूरी दे दी थी। लेकिन जनवरी में उन्होंने अपना रुख बदल लिया और अपनी सहमति वापस ले ली। ट्रंप ने कथित तौर पर इस पूरे समझौते को "मूर्खतापूर्ण" बताया। उनका मानना है कि इतना महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र किसी अन्य देश को सौंपना अमेरिका और उसके सहयोगियों के हित में नहीं है। उनकी आपत्ति के बाद इस समझौते पर नई बहस शुरू हो गई और इसके भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई।

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अप्रैल में ब्रिटेन ने भी रोक दी डील

ट्रंप की आपत्तियों के बाद अप्रैल में ब्रिटेन ने भी इस समझौते को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया रोक दी। इससे यह साफ हो गया कि मामला अब सिर्फ ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच का नहीं रह गया है, बल्कि इसमें अमेरिका की रणनीतिक चिंताएं भी शामिल हो चुकी हैं। ब्रिटेन सरकार ने कहा है कि वह इस मुद्दे पर कोई भी एकतरफा फैसला नहीं लेना चाहती। इसलिए सभी पक्षों से बातचीत जारी रखी जा रही है।

भारत को कितना खतरा?

रणनीतिक रूप से देखें तो भारत को अमेरिका के चागोस आईलैंड पर दखल से सीधा कोई खतरा नहीं है। लेकिन अमेरिका का किसी भी देश के नजदीक आना ही अपने आप में टेंशन बढ़ाने वाली बात होती है। हालांकि इसका एक दूसरा पक्ष ये भी है कि हिंद महासागर में चीन के बढ़ते दबदबे को काउंटर करने के लिए अमेरिका का आना भारत के लिए एक पॉजिटिव साइन भी है।

व्हाइट हाउस और ब्रिटेन के बीच लगातार बातचीत

रिपोर्ट्स के मुताबिक, व्हाइट हाउस और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कार्यालय के बीच इस विषय पर लगातार चर्चा चल रही है। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप प्रशासन वास्तव में चागोस द्वीप खरीदने का औपचारिक प्रस्ताव देगा या नहीं। इसके अलावा अभी तक किसी संभावित सौदे की कीमत भी तय नहीं की गई है। सूत्रों का कहना है कि फिलहाल यह ट्रंप प्रशासन की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है, लेकिन रणनीतिक दृष्टि से इस पर गंभीर विचार किया जा रहा है।

46.7 अरब डॉलर की लीज भी बनी विवाद का कारण

इस पूरे मामले में एक और बड़ा विवाद आर्थिक पक्ष को लेकर है। पहले ब्रिटेन ने डिएगो गार्सिया सैन्य अड्डे की लीज व्यवस्था के बदले लगभग 46.7 अरब डॉलर की राशि तय की थी। ब्रिटेन के भीतर कई राजनीतिक दलों और विशेषज्ञों ने इस समझौते की आलोचना की है। उनका कहना है कि इतनी बड़ी रकम खर्च करने के बावजूद देश अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों से समझौता कर सकता है। इसी वजह से यह मुद्दा ब्रिटेन की घरेलू राजनीति में भी चर्चा का विषय बना हुआ है।

मॉरीशस ने भी मांगी ज्यादा रकम

मामले को और मुश्किल बनाने वाली बात यह है कि मॉरीशस ने भी इस समझौते के लिए अधिक आर्थिक मुआवजे की मांग की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मॉरीशस का मानना है कि चागोस द्वीप समूह की रणनीतिक और ऐतिहासिक अहमियत को देखते हुए उसे बेहतर आर्थिक पैकेज मिलना चाहिए। इस मांग ने बातचीत को और कठिन बना दिया है और अब तक किसी अंतिम समझौते पर सहमति नहीं बन पाई है।

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क्यों महत्वपूर्ण है यह पूरा मामला?

चागोस द्वीप समूह को लेकर चल रही यह खींचतान सिर्फ जमीन के एक टुकड़े की लड़ाई नहीं है। इसके पीछे हिंद महासागर में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, सैन्य रणनीति और वैश्विक शक्ति संतुलन जैसे बड़े मुद्दे जुड़े हुए हैं।
यदि ट्रंप वास्तव में इस क्षेत्र को खरीदने या डिएगो गार्सिया पर स्थायी कंट्रोल हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ाते हैं, तो इसका असर अमेरिका, ब्रिटेन, मॉरीशस और पूरे हिंद महासागर क्षेत्र की राजनीति पर पड़ सकता है। फिलहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले महीनों में ब्रिटेन, मॉरीशस और अमेरिका इस विवाद का क्या समाधान निकालते हैं और क्या चागोस द्वीप समूह वैश्विक शक्ति संघर्ष का नया केंद्र बनता है या नहीं।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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