क्या एक देश बिक सकता है और श्रीलंका बिकेगा तो भारत के लिए मौका है?

अमेरिका ने रूस से अलास्का खरीद लिया, तो अमेरिका ने ही फ्रांस से लुसियाना खरीद लिया और इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरे परे हैं।

नई दिल्ली, जुलाई 23: साल 2017 के अंतिम महीनों में श्रीलंका सुलगा हुआ था और दक्षिणी श्रीलंका के एक शहर में चीन के खिलाफ भयानक प्रदर्शन किए जा रहे थे। उस शहर का नाम था, हंबनटोटा। 2017 में पहली बार श्रीलंका के लोगों को पता चला, कि उनकी देश की सरकार उनके देश की जमीन को चीन के हाथों गिरवी रखने जा रही है, क्योंकि उनकी सरकार ने एक ऐसे प्रोजेक्ट के लिए चीन से लोन लिया था, जो किसी काम का नहीं है। 2017 में पहली बार श्रीलंका के लोगों को पता चला, कि उनके देश का एक हिस्सा अब चीन के हाथों में गिरवी रखा जा चुका है। श्रीलंका के लोग विरोध सिर्फ इसलिए नहीं कर रहे थे, कि उनके देश का एक हिस्सा गिरवी रखा जा रहा था, बल्कि इसलिए भी विरोध किया जा रहा था, कि श्रीलंका की सरकार चीन के हाथों में देश की गरिमा, अखंडता और संप्रभुता को गिरवी रख रही थी। ऐसे में आईये जानते हैं, कि क्या एक देश बिक सकता है और अगर एक बिकता है, तो फिर उसे कौन खरीदेगा और उसकी कीमत क्या होगी?

विकराल हो चुकी है श्रीलंका की स्थिति

विकराल हो चुकी है श्रीलंका की स्थिति

श्रीलंका के ऊपर 51 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज है सिर्फ और सिर्फ इस साल की श्रीलंका को 7 अरब डॉलर का कर्ज चुकाना है, जिसे चुकाने से उसने हाथ खड़े कर दिए हैं। श्रीलंका के पास जरूरी सामानों को खरीदने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार पूरी तरह से खत्म हो चुका है और दुनिया से श्रीलंका को बिल्कुल भी मदद नहीं मिल रही है, सिवाए भारत के। श्रीलंका में महंगाई दर 15 प्रतिशत को पार कर गया है और तेल से लेकर दूध का पाउडर या फिर रोजमर्रा की वो चीजें, जो दूसरे देशों से खरीदी जाती थी, वो खत्म हो चुकी है। श्रीलंका का ये संकट अचानक नहीं आया है, बल्कि पिछले कई सालों से श्रीलंका लगातार अपने बजट घाटे को पूरा करने के लिए विदेशों से जो सामान आयात करता था, उसके लिए विदेशी लोन पर निर्भर होता आ रहा था और श्रीलंका सबसे ज्यादा कर्ज के लिए जाता था चीन के पास और चीन ने हिंद महासागर में पैर जमाने के लिए श्रीलंका को अंधाधुंध लोन बांटे और श्रीलंका की जमीन पर चीन ने कब्जा करना शुरू कर दिया।

फालतू के काम के लिए लिया चीन से लोन!

फालतू के काम के लिए लिया चीन से लोन!

ऐसा नहीं है, कि श्रीलंका ने चीन से लोन देश की तरक्की के लिए लिए। चीन से लोन लेकर श्रीलंका ने जिन प्रोजेक्ट्स में लगाए, उनको लेकर पहले ही उन्हें भारत और अमेरिका से चेतावनी मिल रही थी, कि उस प्रोजेक्ट का श्रीलंका को कुछ भी फायदा नहीं होगा। जैसे हंबनटोटा बंदरगाह, बनने के बाद से हंबनटोटा पोर्ट पर गिने चुने जहाज जाते हैं, लिहाजा वो व्यापारिक नजरिए से श्रीलंका के गले में बंधा पत्थर है, जिसे उसने समुद्र में डूबो दिया। इसके बाद श्रीलंका ने 15.5 मिलियन डॉलर का कॉन्फ्रेंस सेंटर भी चीन के लोन से बनाया और उसके बाद श्रीलंका ने राजापक्षे इंटरनेशनल एयरपोर्ट का निर्माण करवाया, जिसके लिए श्रीलंका ने चीन से 200 मिलियन डॉलर का लोन लिया, जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। लिहाजा, श्रीलंका जान-बूझकर चीन के लोन के भंवर में फंसता चला गया और अब स्थिति ये है, कि चीन ने श्रीलंका की मदद करने से इनकार कर दिया है और अब श्रीलंका ने आईएमएफ से बेलऑउट पैकेज मांगा है, जिसपर अभी तक सही से बात भी नहीं शुरू हुई है। स्थिति ये है, कि अब श्रीलंका ने अपने देश के राष्ट्रीय स्मारकों और नेशनल प्रॉपर्टी को बेचना शुरू कर दिया है।

नेशनल प्रॉपर्टी बेच रहा है श्रीलंका

नेशनल प्रॉपर्टी बेच रहा है श्रीलंका

हालांकि, राष्ट्रीय प्रॉपर्टी और संप्रभु प्रॉपर्टी को बेचना कोई नई बात नहीं है। अभी पिछले हफ्ते ही पाकिस्तान सरकार ने भी राष्ट्रीय प्रॉपर्टी बेचने के लिए अध्यादेश जारी किए हैं। लेकिन, राष्ट्रीय प्रॉपर्टी या संप्रभु प्रॉपर्टी क्या होते हैं और उसके बेचने का मतलब क्या होता है?

डोनाल्ड ट्रंप ने मचाई थी खलबली

डोनाल्ड ट्रंप ने मचाई थी खलबली

अगस्त 2019 में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने पूरी दुनिया में सनसनी मचा दी थी, जब उन्होंने डेनमार्क से ग्रीनलैंड को खरीदने की संभावना का जिक्र किया था। डोनाल्ड ट्रंप ने इसे एक रीयल एस्टेट डील की तरह देखने की कोशिश की थी। उनका कहना था, कि इस डील से डेनमार्क को काफी फायदा होगा, क्योंकि डेनमार्क को हर साल कई मिलियन डॉलर ग्रीनलैंड के रखरखाव और वहां रहने वाले लोगों को जरूरी सुविधाएं मुहैया कराने और सब्सिडी के तौर पर खर्च करने पड़ते हैं। दरअसल, ग्रीनलैंड में कई दुर्लभ खनिज पदार्थ जैसे, नियोडियम, जिंक, टर्बियम, यूरेनियन मौजूद हैं और ट्रंप प्रशासन का मामना था, कि अगर ग्रीनलैंड को खरीद लिया जाता है, तो अमेरिका सीधे तौर पर दु्र्लभ खनिज पदार्थ के मामले में चीन की निर्भरता को खत्म कर देगा। अमेरिका का खुद का अस्तित्व भी दूसरे देशों के हिस्से को खरीदने से ही बना है। जैसे अमेरिका ने रूस से अलास्का खरीद लिया, तो अमेरिका ने ही फ्रांस से लुसियाना खरीद लिया। ऐसा इसलिए, क्योंकि काफी ज्यादा दूर होने की वजह से ना तो रूस अलास्का की देखरेख कर पा रहा था और ना ही फ्रांस लुसियाना की देखरख कर पा रहा था।

किन-किन देशों के हिस्से बिके हैं?

किन-किन देशों के हिस्से बिके हैं?

इतिहास के पन्नों को पलट कर देंखे, तो पता चलता है कि, अभी तक कई देश अपने अपने हिस्से को दूसरे देशों के हाथ बेच चुके हैं। जैसे अमेरिका ने क्यूबा से ग्वांटनामो बे लीज पर लिया हुआ है, जहां उसने अपना नेवल बेस बनाकर रखा हुआ है। अमेरिका के अलावा मैक्सिको, मॉरीसस, जापान, निकारागुआ, पाकिस्तान, ओमान, जिबूती, इथियोपिया, किर्गीस्तान, सैशेल्स, अफगानिस्तान, चिली और पेरू ने भी अपने हिस्से को बेचा है या फिर लीज पर दिया है या फिर अपने संप्रभु क्षेत्र का सौदा किया है। जैसे पाकिस्तान ने ग्वादर पोर्ट और पीओके का एक हिस्सा चीन को दे दिया है। जैसे जिबूती में चीन ने मिलिट्री बेस बना लिया है।

तो श्रीलंका अपने और हिस्से बेचेगा?

तो श्रीलंका अपने और हिस्से बेचेगा?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि, देशों को अपने संप्रभु के हिस्से की सौदेबाजी नहीं करनी चाहिए। लेकिन, जब स्थिति विकट हो जाए, तो फिर हाथों में कोई और उपाय भी नहीं बचता है। जैसे श्रीलंका। श्रीलंका पहले ही हंबनटोटा बंदरगाह चीन को लीज पर दे चुका है और आने वाले वक्त में संभावना यही है, कि श्रीलंका को अपने देश के कुछ और हिस्से भी गिरवी रखना पड़ा और श्रीलंका की इस स्थिति में सबसे बड़ा हाथ है चीन का। रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2005 से 2010 के बीच चीन ने श्रीलंका में इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए 1.4 अरब डॉलर का लोन दिया था। लेकिन, सबसे दिलचस्प बात ये है, कि चीन ने लोन देने से पहले एक बार भी पड़ताल नहीं किया, कि आर्थिक नजरिए ये प्रोजेक्ट्स जरूरी है भी या नहीं? इसके बाद साल 2011 से 2015 के बीच चीन ने एक बार फिर से श्रीलंका को 3.1 मिलियन डॉलर का लोन दिया। और श्रीलंका को लोन देने के पीछे चीन का बस एक ही उद्येश्य था, हिंद महासागर में घुसना, ताकि भारत को कंटेन किया जा सके।

कोलंबो पोर्ट सिटी प्रोजेक्ट

कोलंबो पोर्ट सिटी प्रोजेक्ट

ये जानते हुए भी कि श्रीलंका में पिछले प्रोजेक्ट्स किसी काम के नहीं रहे हैं, उसके बाद भी चीन ने श्रीलंका के कोलंबो पोर्ट सिटी प्रोजेक्ट को फाइनेंस किया। श्रीलंका ने कोलंबो पोर्ट सिटी के पीछे दुबई या सिंगापुर की तरह एक आर्थिक शहर बनाने का सपना देखा था। लेकिन, कोलंबो पोर्ट प्रोजेक्ट का अनुमानित खर्च 14 अरब डॉलर है। अब चीन ने कोलंबो पोर्ट सिटी में निवेश के बदले श्रीलंका से हिंद महासागर में 269 हेक्टेयर जमीन पर दावा कर दिया है, जिसमें वो 1.4 अरब डॉलर का निवेश कर 'चायना टाउन' बनाएगा। चीन ने 269 हेक्टेयर जमीन मांगी थी, जबकि श्रीलंका ने उसे हिंद महासागर में 116 हेक्टेयर जमीन 99 सालों के लीज पर दे दिया है। ऐसे में अब साफ जाहिर होने लगा है, कि श्रीलंका अब चीन के कर्ज से कभी बाहर नहीं आ पाएगा।

भारत के लिए चिंता बढ़ी

भारत के लिए चिंता बढ़ी

कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि, जिस देश के पास एक दिन का भी तेल नहीं बचा हो, गैस नहीं बचा हो और खाने की किल्लत शुरू हो गई हो, उसके लिए अपने देश की जमीन बेचना कोई बड़ी बात नहीं है। खासकर श्रीलंका के संदर्भ में, जो अपने कई रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण हिस्सा पहले ही चीन के हाथों में गिरवी दे चुका है। लिहाजा ये बातें भारत के लिए चिंता बढ़ाने वाली हैं, क्योंकि चीन इसी फिराक में सालों से बैठा हुआ था और श्रीलंका को लोन पर लोन दिया दिया जा रहा था। भारत हमेशा से हिंद महासागर पर अपना प्रभुत्व मानता रहा है और सरकार का मानना है, कि हिंद महासागर में चीन का घुसना देश के राष्ट्रीय हित के लिए खतरा बन सकता है।

श्रीलंका में भारत के पास क्या हैं विकल्प?

श्रीलंका में भारत के पास क्या हैं विकल्प?

ऐसा भी नहीं है, कि श्रीलंका पर सारा प्रभाव चीन का ही हो। भारत ने भी श्रीलंका पर काफी प्रभाव बनाकर रखा हुआ है। चीन की तरह तो भारत श्रीलंका को लोन नहीं दे सकता है, लेकिन श्रीलंका के लिए भारत अभी भी चीन से गुना विश्वसनीय पार्टनर है, जो इस विषम परिस्थिति में भी 3.8 अरब डॉलर का लोन श्रीलंका को दे चुका है। भारत अभी तक कई मिट्रिक टन अनाज और तेल के जहाज श्रीलंका को भेज चुका है और श्रीलंका के नेता भी चीन की जगह भारत से ही मदद मांग रहे हैं। इसके साथ ही पिछले साल भारत के अडानी ग्रुप ने डीप वाटर कंटेनर टर्मिनल के निर्माण के लिए 700 मिलियन डॉलर की डील की थी और ऑस्ट्रेलिया के LOWY इंस्टीट्यूट के मुताबिक, चीन के खिलाफ भारत हिस्से में आया ये गेमचेंजर प्रोजेक्ट है।

भारत ने बनाए हैं कई प्लान्स

भारत ने बनाए हैं कई प्लान्स

इसके साथ ही भारत ने श्रीलंका में लंबी अवधि के लिए कई प्लान्स बनाए हैं, ताकि श्रीलंका की आर्थिक स्थिति को सुधारने के साथ साथ वहां से चीन का वर्चस्व खत्म करने पूरी तरह से अपना वर्चस्व कायम किया जा सके। इसके साथ ही भारत ने श्रीलंका में सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट के लिए भी समझौता किया है, जो पहले चीन को मिलने वाला था। वहीं, एक्सपर्ट्स का कहना है, कि भारत को कोलंबो बंदरगाह का अधिग्रहण कर लेना चाहिए, क्योंकि यहां पहुंचने वाले 70 प्रतिशत कार्गो शिप भारत आते हैं। इसके साथ ही एक्सपर्ट्स कहते हैं, कि भारत को चाहिए कि श्रीलंका का कर्जभार बढ़ाए बिना उसकी प्रॉपर्टी के लिए सही डील करे।

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