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वुसत का ब्लॉग: मोदी हो कि इमरान नाम में भला क्या रखा है?

By वुसअतुल्लाह ख़ान वरिष्ठ पत्रकार, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी के लिए
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    जब ख़बर आई कि नरेंद्र मोदी आम चुनाव जीत गए हैं तो पाकिस्तान में हर कोई हर किसी से यही पूछ रहा था, ''अब क्या होगा?''

    जैसे आज भारत में बहुत से लोग पूछ रहे हैं, ''इमरान ख़ान जीत गए. अब क्या होगा?''

    इस वक़्त मुझे वो मौलवी साहब याद आ रहे हैं जिन्हें पड़ोसी के बच्चे ने बताया कि नत्थू के बेटे की शादी हो रही है. मौलवी साहब ने कहा, ''मुझे क्या?''

    बच्चे ने कहा मगर मौलवी साहब नत्थू कह रहा था कि मौलवी साहब को भी आमंत्रित करूंगा.

    मौलवी साहब ने कहा, ''फिर तुझे क्या?''

    चुनाव किसी के और चिंता मुझे हो, क्यों भई?

    इमरान ख़ान
    Reuters
    इमरान ख़ान

    फंसा हुआ है मैच

    मोदी आए तो मुझे क्या? इमरान आए तो तुझे क्या?

    अच्छा ये बताओ जब कांग्रेस की सरकार थी तो संबंध कितने अच्छे थे जो बीजेपी के आने से बिगड़ गए. या नवाज़ शरीफ़ थे तो कश्मीर की सीमा पर कौन-सी गोलीबारी बंद थी जो इमरान ख़ान के आने पर फिर से शुरू हो गई.

    संबंध अच्छे-बुरे होने का ताल्लुक़ किसी के आने-जाने से थोड़ी होता है. बुनियादी पॉलिसी के बदलने न बदलने से होता है.

    मोदी जी ने हनीमून पीरियड में अच्छी-अच्छी बातें कीं. इमरान ख़ान भी पहले सौ दिन अच्छी-अच्छी बातें करेंगे.

    अगले वर्ष भारत में अगर चुनाव हैं तो यहां भी इमरान ख़ान की सरकार गठबंधन की ईंटों पर खड़ी होगी.

    यानी मैच उधर भी फंसा हुआ है और इधर भी.

    ऐसे में शुभकामनाओं का अदल-बदल ही संभव है.

    परवेज मुशर्रफ
    Getty Images
    परवेज मुशर्रफ

    क्यों करें इंतज़ार?

    और हम क्यों अगले वर्ष के भारतीय चुनाव के नतीजे का इंतज़ार करें. आपसी संबंधों में जो बेहतरी मौजूदा मजबूत सरकार न ला पाई वो अगली मोदी या गैर मोदी सरकार कैसे लाएगी?

    तो क्या पाकिस्तान में मज़बूत सिवीलियन सरकारें नहीं आईं. उनके होते क्यूपिड ने ऐसा क्या तीर चला लिया जो कमज़ोर सरकार नहीं चला सकती.

    संबंध अच्छे होने होते तो नेहरू और अयूब ख़ान या फिर वाजपेयी और परवेज़ मुशर्रफ के ज़माने में हो चुके होते.

    मगर 70 वर्ष में दोनों ओर से अब तक तो यही सुनने को मिलता आ रहा है कि बुनियादी झगड़ा तो सुलट गया था मगर आलेख पर हस्ताक्षर होने से एक मिनट पहले फ़लां जुमले के फ़लां शब्द के फ़लां अक्षर ने अड़चन डाल दी. यूं संबंध सुलटाने का काम एक दशक और आगे बढ़ गया.

    क्यूबा में अमरीकी नेता ओबामा का पोस्टर
    Reuters
    क्यूबा में अमरीकी नेता ओबामा का पोस्टर

    नीयत ठीक होगी तो मिलेंगे सितारे

    जब क्यूबा और अमरीका ने फ़ैसला किया कि संबंध अच्छे होने हैं तो अच्छे हो गए. जब 47 वर्ष पहले चीन और अमरीका ने गालम-गलौच रोक के हाथ मिलाने का फ़ैसला तो फिर हाथ मिला लिया.

    जब चीन और सोवियन यूनियन ने कहा कि आपसी चक-चक में कुछ नहीं रखा तो दोनों की कुंडली मिलनी शुरू हो गई. मतलब क्या हुआ?

    मतलब ये हुआ कि जिस भारत और पाकिस्तान की एक-दूसरे के बारे में नीयत ठीक हो गई, उस दिन से सितारे भी मिलने शुरू हो जाएंगे.

    वरना दोनों मांगलिक कभी इस पेड़ से तो कभी उस पेड़ से शादी करते रहेंगे.

    इरादा बदलेगा तो पंडित भी सीधा हो जाएगा. मोदी हों कि इमरान नाम में क्या रखा है? करनी है तो काम की बात करो.

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    BBC Hindi
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    English summary
    Blog of Vusat What is the name of Imran in the name of Modi

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