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सेना के चक्रव्यूह में बुरी तरह फंस चुकी हैं सू ची

नाएप्यीडॉ, 08 दिसंबर। म्यांमार में अब तक 300 से अधिक बड़े नेताओं को जेल भेजा गया है और कुछ को तो फांसी की सजा भी सुनाई जा चुकी है. फरवरी के तख्तापलट से बाद से अब तक 1,300 आम नागरिक मारे जा चुके हैं. देश में गृह युद्ध का माहौल है और दर्जनों अलगाववादी जनजातीय गुटों ने तात्मादाव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. कोविड की मार झेल रहे आम म्यांमार नागरिक के लिए यह कठिन दिन हैं क्योंकि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भी कोविड से निपटने के प्रयासों में मदद से रोका जा रहा है.

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इसी सिलसिले में सोमवार को नोबेल पुरस्कार विजेता और देश में लोकतंत्र की मूर्ति मानी जाने वालीं आंग सान सू ची को अदालत ने चार साल की सजा सुनाई. हालांकि बाद में सेनाध्यक्ष मिन आंग लाई ने उनकी सजा को घटाकर 2 साल कर दिया. महीनों से हिरासत में रह रहीं आंग सान सू ची पर म्यांमार की सैन्य सरकार ने एक दर्जन अभियोग दायर किये हैं. यह संभवतः पहला केस था जिस पर अदालती कार्यवाही के बाद उन्हें दोषी पाया गया है.

सधे कदम रख रही है सेना

सू ची को देश में हिंसा भड़काने और कोविड-19 संबंधी प्रोटोकॉल के उल्लंघन का दोषी पाया गया है. सू ची पर लगाए गए आरोपों में शायद यह सबसे कमजोर था. उन पर लगाए अन्य आरोपों में स्टेट सीक्रेट एक्ट का उल्लंघन, भ्रष्टाचार और सत्ता का दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप हैं जिनमें कुल मिलाकर 100 साल तक की सजा हो सकती है. यांगून के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और सू ची के सहयोगी फ्यो मेन थिएन की इसी तरह के मामलों में 20 साल की सजा सुनाई गई है.

सू ची की तर्ज पर म्यांमार के भूतपूर्व राष्ट्रपति विन म्यिंन को भी म्यांमार की अदालत ने चार साल की सजा सुनाई थी लेकिन बाद में उसे घटाकर 2 साल कर दिया गया. राजधानी नेपीदाव में चली इस सुनवाई से मीडिया को दूर रखा गया. सू ची के वकील को भी आम जनता या मीडिया से बातचीत करने की अनुमति नहीं दी गयी.

म्यांमार की सेना को पता है कि सू ची को जेल भेजने से देश की जनता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय में और गहरा असंतोष भड़क सकता है. शायद इसीलिए सेना ने घोषणा की है कि सू ची और विन म्यिंन समेत नेशनल लीग फार डेमोक्रेसी के तमाम बड़े नेताओं को वहीं सजा काटनी होगी जहां उन्हें फिलहाल हिरासत में रखा गया है. गौरतलब है कि सेना यह बताने से कतरा रही है कि इन नेताओं को कहां रखा गया है. संयुक्त राष्ट्र समेत मानवाधिकार संरक्षण संबंधी कई संस्थाओं ने सू ची के साथ हो रहीं ज्यादतियों और म्यांमार में सैन्य तानाशाही पर चिंता जताई है और वहां की सरकार पर दबाव बनाने की वकालत की है.

फंसी चुकी हैं सू ची

वैसे तो सू ची ने इन तमाम आरोपों से इंकार किया है लेकिन उन्हें भी मालूम है कि वह सेना के कानूनी चक्रव्यूह में फंस चुकी हैं. अब कोई चमत्कार ही उन्हें इन तमाम आरोपों से बरी करवा सकता है. यहां सवाल कानून और न्याय व्यवस्था से ज्यादा राजनीतिक दांवपेंच का है. सेना का मानना है कि सत्ता में बने रहने के लिए सू ची का हिरासत में रहना जरूरी है. कानूनी दांवपेंच के पीछे कहीं न कहीं सेना यह भी कोशिश कर रही है कि उसके इन कदमों को चीन जैसे देशों का समर्थन भी मिल जाए. आखिरकार दक्षिणपूर्व के लगभग हर देश में कोई न कोई मानवाधिकार उल्लंघन का मामला उभरता ही रहा है.

जहां तक सू ची का सवाल है, तो उनके लिए इस परिस्थिति से निकलने के दो ही रास्ते हैं - या तो सैन्य सरकार उन्हें खुद माफ कर दे (जो वह कुछ वर्षों बाद ही करेगी) या फिर राजनीतिक परिस्थितियों में किसी बाहरी दखल से आमूलचूल परिवर्तन आये. फिलहाल इन दोनों में से कोई भी संभावना निकट भविष्य में मूर्त रूप लेती नहीं दिखती है. दस दक्षिणपूर्व एशियाई देशों के संगठन आसियान से सम्बद्ध आसियान पार्लियामेंटेरियंस फॉर ह्यूमन राइट्स) ने इस घटना को न्यायव्यवस्था के उपहास की संज्ञा दी है. आसियान ने फरवरी में म्यांमार में तख्तापलट के बाद से ही अपनी चिंताएं जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

आसियान शिखर वार्ता के पहले भी जनरल लाई को भाग लेने से मना करने के पीछे भी म्यांमार पर दबाव बनाने की मंशा थी लेकिन आसियान का यह कदम कारगर नहीं हुआ. अभी तक आसियान के विशिष्ट दूत को म्यांमार के सभी राजनीतिक घटकों खास तौर पर सू ची से मिलने तक की अनुमति नहीं दी गई है. अगले साल कंबोडिया से आसियान की अध्यक्षता संभालने के बाद तो स्थिति और भी खराब होने की संभावना है जिसके आसार अभी से दिख रहे हैं.

(राहुल मिश्र मलाया विश्वविद्यालय के एशिया-यूरोप संस्थान में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के वरिष्ठ प्राध्यापक हैं.)

Source: DW

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