इटली की आजादी के लिए हजारों भारतीयों ने बहाया था खून.. ऐसे ही जॉर्जिया मेलोनी नहीं बन गईं मेलोडी! जानिए कहानी
G7 Summit: इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने जब जी7 शिखर सम्मेलन में पहुंचे वैश्विक नेताओं का नमस्ते कहकर स्वागत किया, तो उस दृश्य को देखकर भारत के लोग मंत्रमुग्ध हो गये, क्योंकि जॉर्जिया मेलोनी ने अभिभादन के लिए प्रधानमंत्री मोदी के तरीके को अपनाया था।
इससे पहले इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर #Melodi भी लिख चुकी हैं, जो मोदी और मेलोनी से मिलकर बना है और ये हैशटैग भारत और इटली के दिल के रिश्ते को दर्शाता है। #Melodi ने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया और एक बार फिर से नरेन्द्र मोदी इटली में हैं, जहां वो जी7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले हैं।

लेकिन, क्या आप जानते हैं, कि भारत और इटली कैसे ऐतिहासिक तौर पर एक दूसरे से जु़ड़े हुए हैं? आइये जानते हैं, भारत और इटली को लेकर इतिहास में कौन सी अनोखी कहानी मौजूद है।
भारत-इटली में ऐतिहासिक संबंध
तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में, भारत के चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने इटली सहित दुनियाभर में शांति और कल्याण का संदेश देने के लिए अपने दूत भेजे थे। 13वीं शताब्दी में, इतालवी यात्री मार्को पोलो ने भारत का दौरा किया था और जब उन्होंने भारतीयों को अपने चूल्हों और भट्टियों में कोयले का उपयोग करते देखा, तो वे हैरान रह गए थे। उन्होंने कहा था, कि भारतीय और चीनी भी वस्तुओं को गर्म करने के लिए काले पत्थर जलाते हैं।
लेकिन, भारत-इटली के बीच का संबंध आधुनिक इतिहास से भी जुड़ा हुआ है, जब सैकड़ों भारतीय सैनिकों ने इटली की स्वतंत्रता के लिए अपने खून बहा दिए थे।
इटली की आजादी के लिए भारत सैनिकों की लड़ाई
सितंबर 1943 में एडोल्फ हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी ने इटली पर कब्जा कर लिया, जिसके बाद मित्र देशों की सेना (यूके, यूएस और USSR) ने जवाबी हमला रक दिया। उस वक्त भारत पर ब्रिटेन का कब्जा था और ब्रिटिश सरकार ने उस वक्त तीन बेहतरीन भारतीय पैदल सेना डिवीजन को लड़ने के लिए इटली भेजा था। ये तीन डिवीजन 4, 8 और 10 वीं पैदल सेना थी। सबसे पहले 8 वीं डिवीजन इटली पहुंची थी, लेकिन सबसे खतरनाक और महत्वपूर्ण लड़ाई 4वीं डिवीजन ने लड़ी थी।
इटली को आजादी दिलाने के अभियान में भारतीय सैनिकों की भागीदारी, असाधारण बहादुरी और बलिदान की कहानी है। इन सैनिकों ने इटली की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ी और यूरोप में मित्र देशों की जीत सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। जुलाई 2022 में, भारतीय सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे ने 1944 में मोंटे कैसिनो की लड़ाई में मारे गए भारतीय सैनिकों की याद में इटली के कैसिनो में भारतीय सेना स्मारक का उद्घाटन किया था।
कैसिनो की लड़ाई: भारत-इटली की दोस्ती की कहानी
मोंटे कैसिनो की लड़ाई में जनवरी से जून 1944 तक चार प्रमुख सैन्य लड़ाइयां लड़ी गई थी। भारत की चौथी इन्फैंट्री डिवीजन ने दूसरी और तीसरी लड़ाई में भाग लिया था, जो फरवरी और मार्च में लड़ी गई थी।
मोंटे कैसिनो, गुस्ताव लाइन के पास बहुत ही ज्यादा रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण स्थान था, जिसे हिटलर के नेतृत्व वाली जर्मनी की सेना और बेनिटो मुसोलिनी की इटली की सेना ने तैयार किया था, जब वो दोनों एक ही धूरी में लड़ रहे थे। और अगर इसपर कब्जा हो जाता, तो फिर हिटलर की सेना का कब्जा रोम पर हो जाता है। भारतीय सैनिकों ने लड़ाई के दौरान इस हाईवे की रक्षा की थी और रोम को हिटलर के कब्जे में जाने से बचा लिया था।
मोंटे कैसिनो, हिमालय जैसे ऊंचे पहाड़ों के समान एक ऊबड़-खाबड़ वाला खतरनाक इलाका है, जो उस वक्त एक कठिन युद्धक्षेत्र था। लेकिन, 4 वें भारतीय डिवीजन के सैनिकों की बहादुरी ने मित्र देशों की सेना को इस पॉजीशन में ला दिया, जहां मित्र देशों की सेना ने रोम पर नियंत्रण हासिल कर लिया और हिटलर की सेना पराजित हो गई।
इटली की आजादी की लड़ाई में मित्र देशों की तरफ से करीब 50 हजार भारतीय सैनिक लड़े थे, जिसमें ब्रिटिश-भारतीय सैनिक भी शामिल थे। कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव्स कमीशन की रिपोर्ट में कहा गया है, कि उस लड़ाई में 5,504 भारतीय सैनिक मारे गये थे।
इटली की आजादी की लड़ाई में मारे गये भारतीय सैनिकों की उम्र 15 साल से 41 साल के बीच थी, जिनका अंतिम संस्कार इटली के अलग अलग श्मशानों में किया गया था। भारतीय सैनिकों की बहादुरी का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं, कि जिन 20 सैनिकों को बहादुरी के लिए विक्टोरिया क्रॉस अवार्ड दिया गया था, उनमें से 6 भारतीय सैनिकों को मिला था। कहा जाता है, कि भारतीय सैनिकों की वीरता की कहानी इटली की लोककथाओं का हिस्सा बन गई हैं और आज भी उन्हें गाया जाता है।
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