बांग्लादेश के तख्तापलट को जन-आंदोलन का नतीजा कहना क्यों गलत है? 5 फैक्ट से समझिए
Bangladesh News: बांग्लादेश में आरक्षण के खिलाफ शुरू हुए छात्रों के प्रदर्शन का अंतिम अंजाम जिस रूप में सामने आया है, उसको लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। अगर वहां की घटनाओं को बारीकी से देखें तो कोटे के खिलाफ सड़कों पर आए छात्रों के प्रदर्शन और सोमवार को हिंसक भीड़ के डर से पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का देश से भागने की घटना दोनों अलग-अलग चीजें हैं।
भारत समेत दुनिया में कुछ अति-उत्साही वर्ग बांग्लादेश में हुए तख्तापलट को जन-आंदोलन का नतीजा बताने में लगे हुए हैं। लेकिन, वहां पिछले एक पखवाड़े के घटनाक्रमों को गौर से देखें तो तस्वीर पूरी तरह से अलग नजर आती है और सोमवार (5 अगस्त, 2024) को ढाका में जो कुछ हुआ, उसमें आरक्षण-विरोधी आंदोलन को सिर्फ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया है।

कोटे में कटौती के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के 11 दिन बाद क्यों शुरू हुआ बवाल?
बांग्लादेश में जुलाई में जो छात्र आंदोलन शुरू हुआ था, वह 1971 में मुक्ति वाहिनी की ओर से लोकतंत्र के लिए पाकिस्तानी सेना से लड़ने वाले जांबाजों के बच्चों के लिए 30% सीटें आरक्षित करने के खिलाफ था। छात्रों का विरोध इस बात को लेकर था कि शेख हसीना सरकार ने यह कोटा आवामी लीग के समर्थकों के लिए शुरू किया है।
इस आंदोलन में 200 लोगों की मौत के बाद 21 जुलाई को बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट ने यह कोटा घटाकर 5% कर दिया। इसके बाद आंदोलन पूरी तरह से शांत पड़ चुका था। फिर 2 अगस्त को ऐसा क्या हो गया कि प्रदर्शनकारी एक बार फिर से सड़कों पर उतर आए?
शेख हसीना से अचानक इस्तीफे की मांग क्यों शुरू हो गई?
हसीना सरकार के जिस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने एक तरह से पलट दिया था और छात्रों की मांगें पूरी हो गई थीं, फिर आंदोलनकारियों ने प्रधानमंत्री शेख हसीना का इस्तीफा मांगना क्यों शुरू कर दिया? प्रदर्शनकारियों की यह क्या जिद थी कि उनके प्रदर्शन ने हिंसक शक्ल अख्तियार कर लिया और दो-तीन दिनों में कम से कम 166 और लोगों की जानें चली गईं?
अगर देश के बेकाबू होते हालात और सेना के दबाव में शेख हसीना ने इस्तीफा दे दिया तो फिर उसके बाद उपद्रवियों ने अपना जो चेहरा दिखाया, वो किस तरह के आंदोलनकारी थे? क्या प्रधानमंत्री के घर में घुसकर लुट-खसोट में जुटे लोग कहीं से भी छात्र माने जा सकते हैं? उन्होंने बुजुर्ग महिला नेता के घर में जिस तरह से महिलाओं के कपड़ों को लूटने में भी खुशी जताई, उससे तो यही लगा कि वे असल में सड़क छाप भाड़े के टट्टू बनकर पहुंचे थे!
बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान की मूर्ति तोड़ने वाले कहां से आम आंदोलनकारी थे?
सोमवार को बांग्लादेश में एक और अजीब तस्वीर देखने को मिली। देश के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान की मूर्ति हिंसक भीड़ ने तोड़कर गिरा दी। उसके लिए बुल्डोजर तक का इस्तेमाल किया गया।
बांग्लादेश में भारत की उच्चायुक्त रह चुकीं वीना सीकरी ने टीओआई को दिए एक इंटरव्यू में कहा है, 'जब मैं मुजीबुर्रहमान की मूर्ति तोड़े जाने वाला विजुअल देखती हूं....तो ये छात्र नहीं हैं। वे तो उन्हें राष्ट्रपिता मानते हैं।'
उन्होंने कहा, 'शुरू में कोटा सुधार को लेकर जो आंदोलन हुआ, उसे शेख हसीना हटाओ वाले 'पूरी तरह से अलग' मांग में बदल दिया गया। भारत का एकमात्र उद्देश्य अब सीमा पर नजर रखना और अंतरिम सरकार की स्वीकार्यता पर ध्यान रखना हो गया है।'
हिंदुओं और मंदिरों को निशाना क्यों बनाया जा रहा है?
अगर आंदोलन छात्रों ने किया है तो फिर इसके हिंदू-विरोधी आंदोलन का शक्ल अख्तियार करने की खबरें क्यों आ रही हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस्कॉन और काली मंदिर समेत अनेकों हिंदू मंदिरों और उनके घरों को निशाना बनाया गया है।
बांग्लादेशी अखबार डेली स्टार की रिपोर्ट है कि दंगाइयों ने कम से कम 27 जिलों में हिंदुओं के घरों और दुकानों को निशाना बनाया है, उनमें आग लगा दी है। कुछ अपुष्ट रिपोर्ट में तो वहां हिंदुओं पर हमले को लेकर और भी भयानक दावे किए जा रहे हैं।
खालिदा जिया अचानक मुख्यधारा में कैसे लौट आईं?
आंदोलन छात्रों ने किया और देश छोड़कर तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को भागना पड़ा तो इसमें उनकी कट्टर राजनीतिक दुश्मन बेगम खालिदा जिया की रिहाई की स्क्रिप्ट क्यों लिख दी गई?
बांग्लादेश के सेना प्रमुख वकार-उज-जमान ने अंतरिम सरकार के गठन की घोषणा की है। अगर यह जन-आंदोलन शेख हसीना के खिलाफ था तो इसमें भ्रष्टाचार के मामले में जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री को मुख्यधारा में लौटने का रास्ता क्यों साफ किया गया?
ये तमाम तथ्य इसी बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि बांग्लादेश में अभी जो अराजकता और अस्थिरता पैदा हुई है, उसके पीछे पाकिस्तान समर्थक कट्टरपंथी ताकतों को हाथ है। कई रिपोर्ट भी हैं कि वहां की घटनाओं में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ है।
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