Bangladesh News: मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार क्यों दुनिया की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश है?
Bangladesh Protest News: बांग्लादेश में 400 से ज्यादा मौतों के बाद नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मूद यूनुस की अगुवाई में एक अंतरिम सरकार बनने जा रही है। बांग्लादेश के सेना प्रमुख ने बताया है कि यूनुस की अगुवाई वाली सरकार की ताजपोशी गुरुवार को होगी।
दरअसल, 84 वर्षीय मोहम्मद यूनुस का नाम इसलिए तय हुआ है, क्योंकि छात्र नेताओं ने उन्हीं के नाम पर सहमति जताई है। छात्रों की मांग थी कि यूनुस ने देश में गरीबी उन्मूलन की दिशा में जो योगदान दिया है और खासकर गरीब महिलाओं को जो दिशा दिखाई है, उन्हें ही देश की बागडोर सौंपी जानी चाहिए।

मोहम्मूद यूनुस के पीछे कौन करेंगे काम?
एक तरफ तथ्य यह है कि मोहम्मद यूनुस जिस सरकार को चलाने की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हुए हैं, उसकी डोर पीछे से पूर्व प्रधानमंत्री बेगम जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और उसके माध्यम से पाकिस्तान समर्थक कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के हाथों में रहने की संभावना है।
संविधान के तौर पर भी तंग रहेंगे मोहम्मद यूनुस के हाथ
वहीं, बांग्लादेश का मौजूदा संविधान भी यूनुस को हिंसा की आग में जल रहे बांग्लादेश को फिर से पटरी पर लाने की किस हद तक इजाजत देगा, यह बहुत बड़ा सवाल बना रहेगा। वैसे पेरिस में संवाददाताओं से मोहम्मद यूनुस ने कहा है, 'मैं वापस घर जाने और ये देखने के लिए उत्सुक हूं कि वहां हो क्या रहा है....और यह भी कि हम जिस संकट में हैं, उससे बाहर निकलने के लिए कैसे खुद को व्यवस्थित कर सकते हैं।'
बांग्लादेश के राष्ट्रपति ने यूनुस की नियुक्ति की है
मंगलवार को बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने बुजुर्ग अर्थशास्त्री को बांग्लादेश की अंतरिम सरकार का प्रमुख नियुक्त किया था। इससे पहले सोमवार को सेना ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को 45 मिनट में इस्तीफा देकर मुल्क छोड़ने को कह दिया था और उन्होंने सेना के इस फरमान का पालन भी किया, नहीं तो उनके अपने देश में ही उनकी जान खतरे में पड़ गई थी।
बांग्लादेश के संविधान में अंतिरम सरकार की क्या व्यवस्था है?
लेकिन, तथ्य यह है कि बांग्लादेश के मौजूदा संविधान में अंतरिम सरकार का कोई प्रावधान नहीं है। पहले इस तरह की व्यवस्था थी, लेकिन उसे 'कार्यवाहक सरकार' कहा जाता था।
ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश के संविधान में 1996 में 13वां संशोधन पारित किया गया था, जिसमें आम चुनाव निष्पक्ष रूप से कराने और सत्ता ट्रांसफर के लिए 'कार्यवाहक सरकार' की व्यवस्था बनाई गई थी।
इसके बाद नया संशोधन जोड़ा गया, जिसमें 'गैर-दलीय कार्यवाहक सरकार' जोड़ा गया। इसमें कार्यवाहक सरकार के लिए मुख्य सलाहकार और अन्य सलाहकार की नियुक्तियों और शर्तों का प्रावधान भी शामिल किया गया। तीन चुनावों के संचालन के लिए यही व्यवस्था अपनाई गई।
'कार्यवाहक सरकार' का खत्म हो चुका है प्रावधान
लेकिन, आगे चलकर बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट ने 'कार्यवाहक सरकार' को 'असंवैधानिक' घोषित कर दिया। हालांकि, उसने दो चुनावों तक इसी व्यवस्था के तहत चुनाव करवाने की सलाह भी दी।
लेकिन, कुछ ही समय बाद 30 जून, 2011 को शेख हसीना की अवामी लीग सरकार ने संविधान संशोधन करके 'कार्यवाहक सरकार' की व्यवस्था को पुरी तरह से खत्म ही कर दिया। आगे चलकर अपने अंतिम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भी 13 सितंबर, 2012 को इसपर फाइनल मुहर लगा दी।
बांग्लादेश में अभी जो संविधान है, उसमें मौजूदा सरकार ही अपने कार्यकाल के अंत में राष्ट्रीय चुनाव करवाती है और जो भी पार्टी या गठबंधन जीतता है, उसकी सरकार बनने का रास्ता साफ होता है।
लेकिन, आवामी लीग की यह सरकार इस साल जनवरी में हुए चुनाव के बाद ही लगातार चौथी बार जीतकर सत्ता में आई थी। लेकिन, उसे देश में अराजकता के बीच में ही गद्दी छोड़नी पड़ गई। इसी वजह से सेना और राष्ट्रपति की ओर से 'अंतरिम सरकार' का विकल्प खोजा गया है।
दुनिया की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश है?
ऐसे में जिस मोहम्मद यूनुस की सरकार को संविधान का भी आधार प्राप्त नहीं होगा और उसे आर्मी, राष्ट्रपति के साथ-साथ जमात-ए-इस्लामी और बेगम खालिदा जिया की पार्टी से भी दिशानिर्देश लेने होंगे, वह कितनी स्वतंत्र होगी और किस हद तक काम कर सकेगी? जबकि, बांग्लादेश को अभी एक ऐसे सरकार की जरूरत है, जो उसे फिर से पटरी पर ला सके और अराजकता पर नियंत्रण पाने का साहस दिखा सके।












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