दफ़्तर का ख़राब माहौल सेहत के लिए नुक़सानदेह

दफ़्तर का तनाव

अक्सर हम ख़बरें सुनते हैं कि अच्छे-ख़ासे कमाते-खाते शख़्स ने ख़ुदकुशी कर ली. फलां की तनाव से मौत हो गई. जापान से लेकर अमरीका तक, चीन से लेकर हिंदुस्तान तक, ऐसी ख़बरें बहुत आम हो चली हैं.

2016 में अमरीका में यूबर के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने ख़ुदकुशी कर ली. उसकी तनख़्वाह लाखों में थी. उसके परिवार ने आरोप लगाया कि यूबर के दफ़्तर में तनाव की वजह से उस सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने ख़ुदकुशी कर ली थी.

काम करने का माहौल किस देश में बेहतर?

छुट्टियों में दफ़्तर के ई-मेल से भी छुट्टी

दफ़्तर के ख़राब माहौल से तनाव

तनाव नुक़सान का बड़ा कारण

फ़ाइनेंशियल कंपनी मेरिल लिंच के लंदन के दफ़्तर में काम करने वाला 21 बरस का नौजवान अचानक गिरा और चल बसा. ये इंटर्न लगातार 72 घंटे से काम कर रहा था. ब्रिटेन में जब आर्सेलर मित्तल स्टील कंपनी ने अपना एक स्टील कारखाना बंद करने का एलान किया, तो 56 साल का एक कर्मचारी दिल के दौरे से मर गया.

उसके परिवार ने कहा कि ये कारखाना बंद करने का सदमा था, जिसने उसकी जान ले ली थी.

यूरोप की एजेंसी फॉर सेफ्टी ऐंड हेल्थ ऐट वर्क के मुताबिक़, यूरोपीय देशों में काम के क़रीब 55 करोड़ दिनों के नुक़सान में आधा तनाव की वजह से होता है.

दफ़्तर में होने वाले शोर का क्या करें!

दफ़्तर का ख़राब माहौल जानलेवा भी!

2015 में क़रीब तीन सौ रिसर्च के नतीजों के हवाले से कहा गया कि दफ़्तर में काम-काज का ख़राब माहौल हमारी सेहत के लिए बहुत नुक़सानदेह है. ये जानलेवा भी हो सकता है और हमें इसकी वजह से डॉक्टर के पास भी जाना पड़ सकता है.

दफ़्तर का तनाव ठीक उसी तरह है, जैसे हम किसी सिगरेट पीने वाले के पास खड़े होकर नुक़सान झेलते हैं.

दफ़्तरों में मिल रही आज़ादी के पीछे कौन?

दफ़्तर में तनाव

दफ़्तर के ख़राब माहौल की वजहें

दफ़्तर में काम के ख़राब माहौल की कई वजहें हो सकती हैं. जैसे कि काम के लंबे घंटे, घर और दफ़्तर की ज़िम्मेदारियों के बीच संतुलन की कमी, नौकरी जाने का डर, कभी भी काम पर बुला लिए जाना और नौकरी पर ख़ुद का कंट्रोल न होना. अमरीका में तो नौकरी में स्वास्थ्य बीमा न होना भी तनाव की वजह है.

आज ऑफ़िस लोगों को बीमार बना रहे हैं और उनकी जान तक ले रहे हैं. इसलिए ज़रूरी है कि हमें इसे लेकर सचेत हो जाना चाहिए.

दुनिया भर में इलाज का ख़र्च बढ़ रहा है. इसलिए ऑफ़िस का तनाव सेहत की बहुत बड़ी चुनौती बनता जा रहा है.

दफ़्तर में सोएं लेकिन ज़रा तरीक़े से

दफ़्तर के तनाव

क्या कहते हैं आंकड़ें?

लंदन के मशहूर मेयो क्लिनिक के मुताबिक़ आज आपके फैमिली डॉक्टर से ज़्यादा नौकरी में आपका सुपरवाइज़र अहम हो गया है.

विश्व आर्थिक संगठन का अनुमान है कि दुनिया भर में सेहत और इलाज पर होने वाले खर्च का तीन चौथाई हिस्सा भयंकर बीमारियों के इलाज में जाता है. छुआछूत और संक्रमण से न होने वाली बीमारियां आज कुल मौतों का 63 फ़ीसदी हैं.

भयंकर बीमारियां तनाव और गैर सेहतमंद बर्ताव की वजह से हो रही हैं. जैसे कि स्मोकिंग, ड्रग लेना, शराब पीना और तनाव में ज़्यादा खाना. तमाम सर्वे बताते हैं कि आज दफ़्तर हमारी ज़िंदगी में तनाव की बहुत बड़ी वजह बन गया है. इसी वजह से ये आज हेल्थ केयर के संकट की वजह बन रहा है.

अमरीका का इंस्टीट्यूट ऑफ़ स्ट्रेस ये दावा करता है कि ऑफ़िस की टेंशन की वजह से अमरीकी अर्थव्यवस्था को हर साल क़रीब 300 अरब डॉलर का नुक़सान होता है.

एक पत्रिका में छपे लेख के मुताबिक़ मैनेजमेंट की ख़राब नीतियों की वजह से हर साल मौत का आंकड़ा 1 लाख बीस हज़ार तक बढ़ जाता है. इससे इलाज में ख़र्च होने वाली रक़म पर 190 अरब डॉलर तक का बोझ पड़ता है.

दफ़्तर के बाद कपड़े उतारकर सॉना बाथ?

दफ़्तर के तनाव

तनाव अल्जाइमर से भी भयंकर रोग

आज ऑफ़िस के तनाव की वजह कुल मौतों की बीस फ़ीसदी तक पहुंच गई है. यानी यह गुर्दे की बीमारी और अल्जाइमर से भी भयंकर रोग हो गया है.

ब्रिटेन की हेल्थ ऐंड सेफ्टी एक्ज़ीक्यूटिव की रिपोर्ट कहती है कि 2016-17 में ब्रिटेन में ऑफ़िस की टेंशन से सवा करोड़ दिनों के बराबर कामकाज का नुक़सान हुआ.

अक्सर ऑफ़िस में तनाव की जो वजहें होती हैं, वो कंपनी के लिए फ़ायदेमंद नहीं होतीं. फिर भी कंपनियां ऐसी नीतियों पर काम करती हैं, जिससे तनाव बढ़ता है. जैसे कि, काम के ज़्यादा घंटों से कर्मचारियों की प्रोडक्टिविटी घट जाती है.

यानी वो दफ़्तर में वक़्त तो ज़्यादा गुज़ारते हैं. मगर इससे कंपनी को फ़ायदा नहीं होता. इसका देश की अर्थव्यवस्था पर भी बुरा असर ही पड़ता है.

बीमारी में भी दफ़्तर जाना एक नया चलन

किन कर्मचारियों का परफॉर्मेंस होता है बेहतर?

इसी तरह, नौकरी में छंटनी से किसी भी संगठन का काम-काज बेहतर नहीं होता. कई बार इसकी वजह से अच्छे कर्मचारी काम छोड़ कर चले जाते हैं. फिर जिन्हें कंपनी से निकाला जाता है, उन्हें मोटी रक़म देनी पड़ती है. इससे भी कंपनी की आर्थिक सेहत पर बुरा असर पड़ता है.

साथ ही पुराने कर्मचारियों के जाने से उस कंपनी के अच्छे कस्टमर भी छूटते हैं, क्योंकि अक्सर उनका कर्मचारियों से निजी रिश्ता अच्छा बन जाता है, जिसके आधार पर कारोबार होता है.

कई रिसर्च से ये साबित हुआ है कि अगर हम लोगों को नौकरी में ज़्यादा अधिकार दें, उन्हें अपने हिसाब से आने-जाने और काम का मौक़ा दें, तो उनका परफॉर्मेंस बेहतर होता है. उन्हें बार-बार मैनेजमेंट की तरफ़ से कुछ कहने-सुनने की ज़रूरत नहीं होती. वो ख़ुद ही अच्छा काम करने के लिए प्रेरित होते हैं.

ऐसे में अचरज नहीं कि तनाव के शिकार कर्मचारी नौकरी छोड़ने के विकल्प पर ज़्यादा काम करते हैं. कर्मचारियों की ये आवाजाही काफ़ी महंगी पड़ती है. बीमार और तनाव के शिकार कर्मचारियों की उत्पादकता अच्छी नहीं होती. उनके मुक़ाबले सेहतमंद कर्मचारी अच्छा काम करते हैं.

दफ़्तर की थकान आपकी जान भी ले सकती है

दफ़्तर के तनाव

नौकरी को लेकर निश्चिंत नहीं लोग

फिलहाल तो सारे संकेत ये इशारा कर रहे हैं कि नौकरी में तनाव बढ़ रहा है. पहले जहां छंटनी मंदी के ही दौर में होती थी, अब वो आम बात हो गई है. हाल ही में 3जी कैपिटल नाम की अमरीकी कंपनी ने अपने दो ब्रैंड हाइंज और क्राफ्ट के कारोबार को मिलाया, तो बीस फ़ीसदी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया.

आज अर्थव्यवस्था का ऐसा दौर है, जब कोई भी अपनी नौकरी को लेकर निश्चिंत नहीं है. उन्हें नहीं पता होता कि उनकी आमदनी कब कितनी होगी. बढ़ेगी या घटेगी. आज आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की वजह से मशीनों ने इंसानों के हाथ से बहुत से काम छीन लिए हैं.

सबसे बुनियादी परेशानी ये है कि पहले जहां किसी कंपनी के सीईओ शेयरधारकों, मैनेजमेंट और ग्राहकों के साथ-साथ ख़ुद को कर्मचारियों के प्रति भी जवाबदेह मानते थे. लेकिन आज तो पूंजीवादी समाज में केवल शेयरधारक ही सीईओ के ज़हन पर हावी रहते हैं. इससे वो अपने मातहत काम करने वालों के हितों का ख़याल नहीं रख पाते.

ऐसे तनाव के माहौल में कुछ कंपनियां उम्मीद का दिया जला रही हैं. पैटागोनिया, कलेक्टिव हेल्थ, एसएएस इंस्टीट्यूट, गूगल, जॉन ल्यूइस पार्टनरशिप में कर्मचारी ही कंपनी के मालिक हैं.

इन कंपनियों में लोगों को तनख़्वाह के साथ छुट्टी पर जाने की मुहलत मिलती है. ताकि वो परिवार और दोस्तों के साथ या अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ वक़्त बिताकर ख़ुद को तरोताज़ा कर सकें.

दफ़्तरों में यौन उत्पीड़न से कैसे लड़ें महिलाएं?

दफ़्तर के तनाव

लेकिन कुछ कंपनियों में मौज-मस्ती के साथ काम

कई बार तो कंपनी की तरफ़ से ही रिहाइश का भी इंतज़ाम होता है, जिससे कर्मचारी काम भी कर सकें और परिवार के साथ भी वक़्त बिता सकें. लोगों को काम करने की आज़ादी दी जाती है. उन्हें बच्चों की तरह हर बात पर टोका नहीं जाता.

ऐसी कंपनियां कर्मचारियों के प्रति अपनी जवाबदेही और ज़िम्मेदारी समझती हैं. जैसे कि एसएएस इंस्टीट्यूट में एक चीफ हेल्थ ऑफ़िसर है, जिसका काम है कर्मचारियों को अच्छी सेहत बनाए रखना.

इसी तरह पैटागोनिया कंपनी के संस्थापक ने तो बाक़ायदा किताब लिखकर कहा कि वो अपने कर्मचारियों को मौज-मस्ती के साथ काम करते देखना चाहते हैं. इस कंपनी के कर्मचारियों को हर दूसरे हफ़्ते तीन दिन का वीकली ऑफ़ मिलता है. सभी कर्मचारियों को हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी देती है.

अब लोगों को भी ऐसी कंपनियों में नौकरी की कोशिश करनी चाहिए, जहां कर्मचारियों के लिए माहौल दोस्ताना हो. तनाव न हो. उनकी सेहत और दिमाग़ी सेहत का ख़याल रखा जाए.

सरकारों को भी चाहिए कि वो कंपनियों पर अपने यहां का माहौल बेहतर बनाने का दबाव डालें. इससे सरकार की आर्थिक सेहत ही बेहतर होगी. देश की अर्थव्यवस्था पर बीमारी का बोझ कम होगा.

अड़ियल बॉस से मिले तनाव का 'रामबाण इलाज'

जहां शराब पीना है सफलता की गारंटी...

हंसने से कैसे बेहतर होता है आपका काम?

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+