अमेरिका की 'ठग नीति'? पनडुब्बी के लिए फ्रांस के साथ धोखेबाजी करने वाले ऑस्ट्रेलिया को US ने कैसे दिया धोखा?
AUKUS Pact: ऑस्ट्रेलियाई संसद में पिछले दिनों पेश किए गए संशोधित AUKUS समझौते की, कड़ी आलोचना की गई है और ऑस्ट्रेलिया का मानना है, कि उसके साथ धोखा हुआ है, जबकि इसी ऑस्ट्रेलिया ने दो साल पहले फ्रांस को धोखा दिया था।
ऑकस को लेकर नये समझौते में इस बात का प्रावधान किया गया है, कि इसके बाकी दोनों भागीदार, अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम, एक साल के नोटिस पर समझौते से एकतरफा रूप से हट सकते हैं। जाहिर तौर पर, ये संशोधन ऑकस के तीसरे देश ऑस्ट्रेलिया के लिए बहुत बड़ा झटका है, क्योंकि उसे परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बी का सपना दिखाकर ही अमेरिका ने रातों-रात AUKUS में शामिल किया था।

सितंबर 2021 में AUKUS समझौते के बाद, जिसका मकसद रॉयल ऑस्ट्रेलियाई नौसेना को परमाणु पनडुब्बियों से लैस करना है, उसने कई मौकों पर विवाद पैदा किया है। उदाहरण के लिए, पिछले साल, इस परियोजना की कीमत पर भारी विवाद हो गया था, जिसके मुताबिक अगले तीन दशकों में 368 बिलियन डॉलर खर्च किए जाने थे। लेकिन उसके बाद से इस प्रोजेक्ट में कई बदलाव किए गये हैं।
ऑकस से ऑस्ट्रेलिया को मिला बड़ा झटका
एबीसी न्यूज की रिपोर्ट के मुताबित, संशोधित AUKUS समझौते के तहत, यदि कोई देश यह निर्धारित करता है, कि यह समझौता उनके संबंधित परमाणु पनडुब्बी कार्यक्रमों के मुताबिक नहीं है, या उनके प्रोजेक्ट से किसी तरह का समझौता है, तो वो देश सिर्फ एक साल के नोटिस पर पनडुब्बी सौदे से हट सकता है।
इस संशोधन के अनुच्छेद-1 के मुताबिक, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम को "पारंपरिक रूप से सशस्त्र, परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों से संबंधित सामग्री और उपकरण ऑस्ट्रेलिया को ट्रांसफर करना है" जब तक कि उनकी सुरक्षा और रक्षा के लिए कोई "अनुचित जोखिम" न हो।
मोटामोटी समझें, तो ऑकस का गठन इसलिए किया गया था, ताकि ऑस्ट्रेलिया के लिए परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों का निर्माण किया जाए, लेकिन सितंबर 2021 में समझौता होने के बाद से एक के बाद एक, विवाद हो रहे हैं।
संशोधित समझौते में कहा गया है, "कोई सरकार इस समझौते में अपनी भागीदारी को पहले ही समाप्त कर सकती है और ऐसे मामले में, उसे ऐसा करने के अपने इरादे के बारे में अन्य सरकारों को एक वर्ष का लिखित नोटिस देना होगा।"
आलोचकों ने इसे एक 'एस्केप क्लॉज' के रूप में चिह्नित किया है, जो अमेरिका और यूके को अपनी मर्जी से समझौते को छोड़ने की अनुमति देता है।

ऑस्ट्रेलिया में AUKUS के खिलाफ आक्रोश
ऑकस संशोधन की वजह से हर वर्ग में आक्रोश फैल गया है। संशोधित समझौते को पेश किए जाने के बाद, ग्रीन्स सीनेटर डेविड शूब्रिज ने कहा, "यह अल्बनीज (ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज) सरकार द्वारा टैक्सपेयर्स के पैसे से 368 बिलियन डॉलर का जुआ है।" आलोचकों ने तर्क दिया है, कि इसका मतलब यह है, कि पनडुब्बियों को हासिल करने में करदाताओं के अरबों डॉलर का निवेश करने के बाद भी, अन्य दो देश किसी भी समय समझौते से बाहर निकल सकते हैं, और ऑस्ट्रेलिया के पास कुछ नहीं होगा।
एक प्रसिद्ध नौसेना विश्लेषक, एलेक्स लक ने अपनी निराशा दर्ज करने के लिए सोशल मीडिया साइट एक्स पर लिखा है, कि "चौंकाने वाली बात यह है, कि ऑस्ट्रेलिया उसे प्रदान किए गए उपकरणों के लिए ज़िम्मेदार है, और समझौते के सभी पक्षों के पास अगर वे चाहें तो वापस लेने का प्रावधान है। इस बारे में ऑस्ट्रेलियाई मीडिया में भू-राजनीतिक परिपक्वता के किंडरगार्टन स्तर पर आक्रोश है।"
सीनेटर डेविड शूब्रिज ने एक और महत्वपूर्ण बयान में कहा, कि यह समझौता अमेरिका को इस समझौते से किसी भी वक्त भाग निकलने के लिए रास्ता बनाता है। उन्होंने कहा, कि "नए AUKUS समझौते के अनुच्छेद 1 में कहा गया है, कि अगर किसी भी समय संयुक्त राज्य अमेरिका को लगता है, कि ऑस्ट्रेलिया को AUKUS समझौते के तहत सामग्री की आपूर्ति करना उनके रक्षा के लिए हानिकारक है, तो वे प्रभावी रूप से समझौते को समाप्त कर सकते हैं और इससे बाहर निकल सकते हैं।"
ऑस्ट्रेलिया ने कैसे दिया था फ्रांस को धोखा?
ऑस्ट्रेलिया पहले फ्रांस से डीजल पनडुब्बी खरीदने वाला था, लेकिन सितंबर 2021 में जब ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरीशन ने अचानक अमेरिका के साथ AUKUS डील की घोषणा कर दी, जिसने फ्रांस को बुरी तरह से नाराज कर दिया था।
दरअसल, परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों को चुनने की प्रक्रिया में, ऑस्ट्रेलिया ने 2016 में फ्रांस में नेवल ग्रुप के साथ 12 अटैक-क्लास डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों के लिए करार किया था, लेकिन इस समझौते के 4 सालों के बाद ऑस्ट्रेलिया ने एकतरफा फ्रांस के साथ इस डील को रद्द कर दिया। ऑस्ट्रेलिया, बिना फ्रांस की सरकार या फ्रांस की कंपनी को जानकारी दिए ही करार से बाहर आ गया, जिसने फ्रांस को काफी गुस्से में डाल दिया था।

जिससे गुस्साए फ्रांस ने ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका से अपने राजदूतों को वापस बुला लिया था, और उसने ब्रिटेन के साथ होने वाली अहम बैठक को रद्द कर दिया था। ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच हुए इस सौदे ने फ्रांस को अलग-थलग कर दिया था। हालांकि, बाद में धीरे धीरे चीजें ठीक हुईं और फ्रांस का गुस्सा शांत हुआ।
जो बाइडेन ने फ्रांस की नाराजगी को दूर करने के लिए फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ मुलाकात भी की थी। लेकिन, इस घटना ने एक महत्वपूर्ण जियो-पॉलिटिक्स को उजागर किया है, जिसमें देश अपने हितों के लिए किसी को भी धोखा दे सकते हैं। अमेरिका ने आज जो ऑस्ट्रेलिया के साथ किया है, वही काम ऑस्ट्रेलिया ने फ्रांस के साथ भी किया था।












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