नज़रिया: पाकिस्तान के चुनाव कितने स्वतंत्र और निष्पक्ष?

पाकिस्तान चुनाव
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पाकिस्तान चुनाव

पाकिस्तान में 25 जुलाई को चुनाव होने वाले हैं. देश के इतिहास में ये दूसरी बार है जब एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया है. लेकिन, चुनावों में इस बात की ख़ुशी मिलने के बजाए विवाद खड़ा हो गया है.

पिछले सप्ताह के अख़बारों की सुर्खियां कुछ ऐसी थीं. 'द गाडिर्यन' ने लिखा था, "गिरफ़्तारियों और धमकियों के कारण पाकिस्तान के चुनाव में गड़बड़ी का डर है."

'द न्यूयॉर्क टाइम्स' ने लिखा, "सैन्य हस्तक्षेप का पाकिस्तान के चुनाव पर प्रभाव."

निष्पक्ष चुनावों के पाकिस्तान के दावे पर अब सवाल उठ रहे हैं. कई विश्लेषक, पत्रकार और साथ ही पाकिस्तान का प्रभावशाली मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी), सरकार के दावे को ग़लत बता रहे हैं.

एचआरसीपी ने चुनावों में हेरफेर की ज़बरदस्त, आक्रामक और खुली कोशिशों का ज़िक्र किया है.

पाकिस्तान के एक प्रमुख थिंक टैंक पाकिस्तान इंस्टिट्यूट ऑफ़ लेजिस्टलेटिव डेवलपमेंट एंड ट्रांस्पेरेंसी (पीआईएलडीएटी) ने भी चुनाव के पहले की प्रक्रिया को 'अनुचित' बताया है.

हालांकि, क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान ख़ान की तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी के समर्थकों समेत कई अन्य ये दावा कर रहे हैं कि इन चुनावों में संदेह करने जैसा ज़्यादा कुछ नहीं है. जानकार मानते हैं तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी को सैन्य दख़ल से सबसे ज़्यादा फ़ायदा होने की संभावना है.

इमरान ख़ान
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इमरान ख़ान

सेना के दख़ल का इतिहास

जो पाकिस्तान के इतिहास की थोड़ी बहुत भी समझ रखते हैं वो समझ सकते हैं कि चुनावों में सेना के दख़ल पर सवाल क्यों उठे रहे हैं.

सेना ने पाकिस्तान पर उसकी आज़ादी के बाद से अब तक के समय के लगभग आधे वक़्त तक सीधे तौर पर शासन किया है. ये भी माना जाता है कि लोकतांत्रिक सरकार में भी सेना का सुरक्षा और विदेशी मामलों में हस्तक्षेप रहता है.

1990 के दौरान, इसने पाकिस्तान मुस्लिम लीग (पीएमएल-एन) और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) को एक-दूसरे ख़िलाफ़ खड़ा किया ताकि कोई भी सरकार अपना कार्यकाल पूरा न कर सके.


क्या होते हैं 'स्वतंत्र और निष्पक्ष' चुनाव

चुनावों के लिए 'स्वतंत्र और निष्पक्ष' होने का क्या अर्थ है, ये जानने के लिए इस पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है. राजनीति विज्ञानी जॉर्गन एलक्लिट और पाले स्वेन्सन स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को दो अलग-अलग बातें मानते हैं.

उनके अनुसार स्वतंत्र चुनाव का मतलब है बिना किसी दबाव के चुनावों में मतदान करने का अधिकार जबकि निष्पक्षता का विचार, क़ानून के भेदभावरहित क्रियान्वयन से जुड़ा है. यानी पुलिस, सेना और अदालत का उम्मीदवार के साथ निष्पक्ष व्यवहार.

साथ ही यह भी सुनिश्चित करना कि किसी विशेष दल या सोशल ग्रुप को विशेष सुविधाएं न मिलें.

मीडिया तक स्वतंत्र और समान पहुंच भी स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों का एक अहम हिस्सा माना जाता है.

पाकिस्तान के चुनाव कितने स्वतंत्र या निष्पक्ष?

मैदान में उतरे विभिन्न राजनीतिक दलों और अभिनेताओं को चुनाव लड़ने के लिए मिले समान अवसरों पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं.

सत्ताधारी पार्टी पीएमएल-एन ने सेना पर उनके ख़िलाफ़ अभियान चलाने का आरोप लगाया है.

जुलाई 2017 सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री और पीएमएल-एन के नेता नवाज़ शरीफ़ को भ्रष्टाचार के मामले में अयोग्य करार दिया था. इसके कुछ महीनों बाद आदेश दिया था कि शरीफ़ किसी राजनीतिक दल के प्रमुख नहीं बन सकते.

नवाज़ शरीफ़ और उनकी बेटी मरियम को पिछले सप्ताह ही गिरफ़्तार किया गया है. उनके अलावा कम से कम तीन पीएमएल-एन के उम्मीदवारों को चुनाव में खड़े होने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया है. इससे जुड़ा हालिया आदेश 22 जुलाई को दिया गया था.

यह मसला शरीफ़ पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप से ज़्यादा जुड़ा नहीं है बल्कि भ्रष्टाचार से संबंधित क़ानूनों और अन्य संवैधानिक प्रावधानों के असमान इस्तेमाल का है जैसे क़ानून की सादिक और अमीन (सच्चाई और ईमानदारी) की धारा.


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इन चुनावों में जहां कुछ दलों को प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है वहीं, चरमपंथी दलों को चुनाव लड़ने का मौक़ा मिला है. ख़ासतौर पर तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) को, जो 2011 में पंजाब प्रांत के गवर्नर की हत्या करने वाले मुमताज़ कादरी के समर्थन में बनाई गई थी.

माना जाता है कि इस पार्टी के एक सदस्य ने इस साल की शुरुआत में एक मंत्री की हत्या का भी प्रयास किया था. इसी तरह, एक और नई पार्टी 'द मिल्ली मुस्लिम लीग' (एमएमएल) चरमपंथी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का राजनीतिक चेहरा है. इसी लश्कर-ए-तैयबा पर भारत में मुंबई हमले का आरोप है.

इसी दौरान, शिया विरोधी अहले सुन्नत वल जमात (एएसडब्ल्यूजे) पर से भी प्रतिबंध हटा दिया गया है.

इसके अलावा ये आरोप भी हैं कि सुरक्षा अधिकारी पीएमएल-एन के पूर्व सदस्यों पर पार्टी बदलने या स्वतंत्र चुनाव लड़ने के लिए दबाव डाल रहे हैं. वहीं, अख़बार 'डॉन' का वितरण ख़ासतौर पर प्रभावित किया गया है और पत्रकारों पर भी दबाव बनाया गया है.

चुनाव आयोग की कोशिशें

निष्पक्षता के अभाव के बावजूद भी कई विशेषज्ञों का भरोसा है कि मतदान के दिन हेर-फेर की संभावना नहीं है. इसकी वजह चुनाव अधिनियम 2017 के तहत चुनाव आयोग द्वारा उठाए गए क़दम हैं.

उदाहरण के लिए अब सभी महत्वपूर्ण फॉर्म पर पोलिंग एजेंट्स के हस्ताक्षर होने ज़रूरी हैं. इसमें राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि एजेंट भी शामिल हैं. हालांकि, हालिया ख़बरों ने इस मामले में भी चिंता पैदा की है.

चुनाव के दिन सुरक्षा के मद्देनजर देश भर में सेना के 3,71,000 जवान अलग-अलग जगहों पर तैनात किए जाएंगे.

इन जवानों के पास चुनाव से जुड़े क़ानून तोड़ने वाले किसी भी व्यक्ति पर मौक़े पर ही मुक़दमा चलाने का अधिकार होगा. सेना की निष्पक्षता से जुड़ी आशंकाओं को देखते हुए यह ख़बर परेशान करने वाली है.

इन सभी बातों से अलग क्या मतदाता अपनी मर्ज़ी से मतदान करने के लिए आज़ाद हैं? ये चुनाव इस बात पर निर्भर करता है कि कौन मतदान देने के लिए बाहर निकलता है और किस आधार पर वो ये फ़ैसला लेता है.

इसके बावजूद तमाम सर्वे का कहना है कि चुनाव में कड़ी टक्कर देखने को मिलने वाली है. इसमें किसकी जीत होगी ये आने वाले दिनों में ही पता चल पाएगा.

(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)

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