फ्रांस, इजरायल, मिस्र, सऊदी... बारी-बारी US को छोड़ रहे सभी, अमेरिका नहीं रहा दुनिया का बॉस?

अमेरिका को यदि देवताओं की दुनिया का इंद्र समझा जाए तो यकीन कीजिए कि उसका सिंहासन अब डोल रहा है। जी हां... एक-एककर अमेरिका के तमाम सहयोगी देश अब उसका साथ छोड़कर चीन और रूस के खेमे में जा रहे हैं।

Allies moving away from America

अमेरिका का कई दशकों से दुनिया पर एकछत्र राज है, लेकिन अब उसका सिंहासन भी डोलने लगा है। एक-एक कर अमेरिका के सहयोगी देश उसका साथ छोड़ रहे हैं। यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद से जियोपॉलिटिक्स में ऐसे बदलाव हो रहे हैं कि अमेरिका के सहयोगी देश उसके खिलाफ आक्रामक रुख अख्तियार करने लगे हैं।

इसे अमेरिका की बादशाहत के अंत का एक संकेत माना जा रहा है। ऐसा माना जा रहा है सोवियत संघ के पतन के बाद जो दुनिया एक ध्रुवीय हो गई थी, वह अब बहुध्रवीय होने वाली है। आइए उन देशों के बारे में जानते हैं जिन्हें अमेरिका का नजदीकी माना जाता था लेकिन फिलहाल वे यूएस विरोधी कदमों की वजह से चर्चा में हैं।

फ्रांस
चीन से लौटने के बाद फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने यूरोप को अमेरिका पर अपनी निर्भरता घटाने की सलाह दी है। इसके साथ ही उन्होंने चीन से अपने रिश्ते को बढ़ाने के संकेत भी दिए हैं। चीन के साथ अपने कारोबार को और बढ़ाने की बात करने वाले मैक्रों ने साफ कहा कि अब यूएस की खुशामद करना बंद कर देना चाहिए।

इमानुएल मैक्रों ने कहा कि यूरोप को 'तीसरी शक्ति' बनकर उभरना चाहिए। मैक्रों ने अपने वक्तव्य में कहा कि यूरोपीय देशों को ताइवान मुद्दे पर चीन और अमेरिका के बीच नहीं आना चाहिए। मैक्रों की ये टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब चीन, ताइवान से सटे इलाके में सैन्य अभ्यास कर रहा है।

मिस्र
मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में अमेरिका के सबसे करीबी सहयोगियों में से एक मिस्र/इजिप्ट, यूक्रेन में चल रहे युद्ध के दौरान रूस को गुप्त रूप से कम से कम 40,000 रॉकेट और गोला-बारूद बनाकर उसे भेजने की योजना बना रहा था। इसका खुलासा एक सीक्रेट डॉक्यूमेंट के लीक होने से हुआ है।

रिपोर्ट के मुताबिक रूस ने मिस्र की पहले कोई गुप्त मदद की थी जिसका कर्ज चुकाने के लिए यह देश अमेरिका के संग गद्दारी करने को तैयार हो गया है। 17 फरवरी को मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी ने अपने शीर्ष सैन्य अधिकारियों के साथ एक बैठक की थी, जिसमें उन्होंने रूस को तोपें और बारूद प्रदान करने पर भी चर्चा की थी।

सऊदी अरब
बाइडेन राज में अमेरिका और सऊदी के संबंध सबसे खराब हुए हैं। रूसी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने के लिए अमेरिका ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं मगर, सऊदी अरब बार-बार तेल में कटौती कर रूस की तरफ से बैटिंग कर रहा है और उसे बड़े नुकसान से बचाने में कामयाब साबित हो रहा है।

सिर्फ रूस ही नहीं सऊदी अरब ने चीन के साथ भी काफी नजदीकी बढ़ा ली है। बीते महीने ही सऊदी अरब ने चीन की मध्‍यस्‍थता से अमेरिका के दुश्‍मन ईरान के साथ रिश्‍ते फिर से सुधार लिए। सऊदी की इस चाल से अमेरिका हैरान रह गया। कहा जाता है कि इस घटना के बाद सीआईए चीफ ने अचानक रियाद पहुंचकर क्राउन प्रिंस को धमकी तक दे दी है।

UAE
संयुक्‍त अरब अमीरात (UAE) भी अमेरिका के सबसे करीबी दोस्‍तों में से एक माना जाता है। लेकिन यूएई और रूस तथा चीन के बीच रिश्‍ते इस समय बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस को इलेक्‍ट्रानिक सामानों की आपूर्ति पिछले एक साल में 7 गुना बढ़ गई है।

अभी हाल ही में UAE के राष्‍ट्रपति ने सीरिया के राष्‍ट्रपति का स्‍वागत किया था जो अमेरिका का धुर विरोधी है। जो बाइडन ने UAE राष्‍ट्रपति मोहम्‍मद बिन जायद को पिछले साल गर्मियों में वॉशिंगटन आने का न्‍योता दिया था लेकिन अभी तक यह संभव नहीं हो पाया है।

इजरायल
बीते महीने के आखिरी सप्ताह न्यायपालिका में सुधार प्रक्रिया को लेकर दो करीबी सहयोगी देश इजरायल और अमेरिका के नेताओं के बीच जमकर वार-पलटवार देखने को मिला। अमेरिका, इजरायल का सबसे करीबी सहयोगियों में से एक माना जाता रहा है ऐसे में बाइडेन-नेतन्याहू के बयानों ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा।

दरअसल बाइडेन ने नेतन्‍याहू को न्‍यायिक सुधार प्रक्रिया से पीछे हटने और इस पर दोबारा विचार करने के लिए कहा था। इस पर नेतन्याहू ने बाइडेन पर पलटवार करते हुए कहा, ''इजरायल एक संप्रभु देश है और अपना फैसला जनता की इच्‍छा से लेता है। हम कोई भी फैसला विदेशी दबाव के आधार पर नहीं लेते, चाहे वह एक करीबी दोस्त ही क्यों न हो।"

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