Ali Khamenei Funeral: खामेनेई के अंतिम संस्कार में जाएंगे PM Modi? ईरान ने भेजा न्योता, रूस-चीन भी होंगे शामिल

Ali Khamenei Funeral: 28 फरवरी को इजरायली द्वारा ईरान में किए गए हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत हो गई थी। अब उन्हें लगभग 4 महीने के बाद सुपुर्द-ए-खाक किया जा रहा है। इसी बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई के राजकीय अंतिम संस्कार में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। सुरक्षा कारणों और क्षेत्रीय संघर्ष के चलते अंतिम संस्कार कार्यक्रम को कई महीनों तक टालना पड़ा। अब ईरान ने जुलाई के पहले सप्ताह में इस ऐतिहासिक कार्यक्रम को आयोजित करने का फैसला किया है। ऐसे में जानना जरूरी हो जाता है कि पीएम मोदी की इस कार्यक्रम में जाने की क्या संभावना है।

भारत किसे भेजेगा? दुनिया की नजर नई दिल्ली पर

फिलहाल भारत सरकार ने यह साफ नहीं किया है कि इस समारोह में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कौन करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद जाएंगे या किसी वरिष्ठ मंत्री अथवा विशेष दूत को भेजा जाएगा, इस पर अभी फैसला नहीं हुआ है। भारत और ईरान के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध रहे हैं। ऐसे में इस न्योते को केवल एक शोक समारोह नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक अवसर के रूप में भी देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि विदेश मंत्रालय जल्द ही इस पर आधिकारिक घोषणा कर सकता है।

Ali Khamenei Funeral

4 जुलाई से शुरू होगा पांच दिन का राजकीय कार्यक्रम

ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक अयातुल्ला खामेनेई का अंतिम संस्कार कार्यक्रम 4 जुलाई से शुरू होकर 9 जुलाई तक चलेगा। इसकी शुरुआत राजधानी तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला परिसर में होगी, जहां उनके पार्थिव शरीर को आम लोगों और विदेशी प्रतिनिधियों के अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। ईरान सरकार को उम्मीद है कि इस दौरान देश और दुनिया के विभिन्न हिस्सों से लाखों लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचेंगे। सुरक्षा व्यवस्था भी अभूतपूर्व स्तर पर रखी जाएगी क्योंकि यह ईरान के इतिहास के सबसे बड़े सार्वजनिक आयोजनों में से एक माना जा रहा है।

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तेहरान से कौम और फिर इराक तक निकलेगी अंतिम यात्रा

इस प्रोग्राम के दौरान तेहरान और पवित्र शहर कौम में बड़े सार्वजनिक जुलूस निकाले जाएंगे। इसके बाद खामेनेई के पार्थिव शरीर को पड़ोसी देश इराक के दो सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक शहरों नजफ और कर्बला ले जाया जाएगा।
इन दोनों शहरों में विशेष प्रार्थना सभाएं आयोजित होंगी। इसके बाद 9 जुलाई को उनके गृह नगर मशहद में स्थित प्रसिद्ध इमाम रजा दरगाह में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। यह पूरा कार्यक्रम ईरान के धार्मिक और राजनीतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जा रहा है।

भारत ने पहले भी दिखाई थी संवेदनशीलता

अयातुल्ला खामेनेई के निधन के बाद भारत ने तुरंत संवेदना व्यक्त की थी। भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास जाकर शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए थे। भारत लंबे समय से ईरान को अपना बड़ा सहयोगी मानता है। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक व्यापार, संस्कृति और लोगों के स्तर पर गहरे संबंध रहे हैं।

पहले जा चुके हैं गड़करी और पूर्व उपराष्ट्रपति धनखड़

मई 2024 में जब ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत हुई थी, तब भारत ने एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया था। उस दौरान राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रखा गया था। रईसी के अंतिम संस्कार में भारत की ओर से उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने हिस्सा लिया था। इससे साफ होता है कि भारत ईरान के साथ अपने संबंधों को कितना महत्व देता है। जबकि उनके बाद प्रधानमंत्री मसूद पेजेशकियान के शपथ ग्रहण समारोह में केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी ईरान गए थे।

युद्ध के बावजूद भारत से बातचीत रही जारी

पश्चिम एशिया में 40 दिनों तक चले युद्ध के दौरान भी भारत और ईरान के बीच कूटनीतिक संवाद बंद नहीं हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपने ईरानी समकक्षों के साथ लगातार बातचीत की।
इन चर्चाओं का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना और दोनों देशों के साझा रणनीतिक हितों की रक्षा करना था। इसके अलावा हाल ही में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराक्ची भारत आए थे। उन्होंने नई दिल्ली में ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लिया था। इस दौरान उन्होंने विदेश मंत्री एस. जयशंकर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात की थी।

कौन-कौन से देश होंगे सामिल

ईरानी मीडिया के मुताबिक इस अंतिम संस्कार समारोह में इराक, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया, लेबनान, रूस, चीन और कई मध्य एशियाई देशों के उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल शामिल होंगे। इन देशों की भागीदारी यह दिखाएगी कि मौजूदा क्षेत्रीय तनाव के बावजूद ईरान अपने रणनीतिक साझेदारों और क्षेत्रीय गठबंधनों को बनाए रखने में सफल रहा है।

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भारत के लिए क्यों अहम है यह फैसला?

अयातुल्ला खामेनेई का अंतिम संस्कार केवल एक शोक समारोह नहीं होगा, बल्कि यह क्षेत्रीय कूटनीति का भी बड़ा मंच बन सकता है। भारत के लिए यह फैसला बेहद संवेदनशील है क्योंकि उसे ईरान, खाड़ी देशों और इजरायल के साथ अपने रिश्तों में संतुलन बनाए रखना है। साथ ही भारत के लिए चाबहार बंदरगाह, ऊर्जा सुरक्षा और पश्चिम एशिया में रणनीतिक हित भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में नई दिल्ली इस न्योते पर क्या फैसला लेती है, इस पर केवल ईरान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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