अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान कैसे अलग है अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट से?
अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता के समीकरणों में तीन चरमपंथी संगठनों की भूमिका रही है. ये हैं तालिबान, अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट.
अफ़ग़ानिस्तान से पश्चिमी ताक़तों की वापसी के साथ ही विशेषज्ञों को आशंका है कि मध्य पूर्व और मध्य एशिया में जिहादी चरमपंथ का एक नया दौर शुरू हो सकता है.
हाल के सालों में अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट भले ही कमज़ोर पड़े हों लेकिन वे अभी भी सक्रिय हैं और बदली हुई परिस्थितियों में वे फिर से मजबूत हो सकते हैं.
तालिबान की तरह ही इन दोनों संगठनों की विचारधारा कट्टरपंथ वाली है लेकिन तीनों समूहों की महत्वाकांक्षाएं और काम करने के तरीके अलग-अलग हैं.
न्यूयॉर्क स्थित थिंकटैंक सूफ़ान सेंटर के सुरक्षा विश्लेषक और रिसर्चर कॉलिन क्लार्क तीनों संगठनों के फर्क को समझाते हुए बताते हैं, "तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में सबसे महत्वपूर्ण खिलाड़ी है. अल-क़ायदा अलग-अलग देशों के जिहादियों का एक समूह है जो अपने नेटवर्क को फिर से खड़ा करना चाहता है. इस्लामिक स्टेट भी कुछ ऐसा ही है लेकिन वो अल-क़ायदा और तालिबान दोनों का ही दुश्मन है और उसे दोनों से ही जंग लड़नी है."
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तीनों संगठनों की शुरुआती कहानी
अल-क़ायदा और तालिबान दोनों की उत्पत्ति अस्सी के दशक के आख़िर में सोवियत संघ के हमले के विरोध में हुई थी. दोनों संगठनों के उदय का संबंध नब्बे के दशक में अफ़ग़ानिस्तान के अंदरूनी विवादों से भी है.
साल 2003 में जब अमेरिका ने इराक़ पर धावा बोलने के बाद इस्लामिक स्टेट अस्तित्व में आया. इसमें इराक़ी सेना और अल-क़ायदा से जुड़े लोग शामिल हुए थे. अल-क़ायदा की स्थापना सऊदी अरबपति ओसामा बिन लादेन ने अस्सी के दशक के आख़िर में की थी.
अल-क़ायदा का अर्थ होता है नेटवर्क. शुरू में सोवियत संघ के ख़िलाफ़ लड़ रहे मुसलमानों को अल-क़ायदा ने हथियारों और दूसरी चीज़ों से मदद पहुंचाई. इसके लिए अल-क़ायदा ने दुनिया भर से मुसलमानों को अपने संगठन के लिए भर्ती किया.
सोवियत सेना की हार के बाद उत्तरी पाकिस्तान और दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान में पश्तून लड़ाकों और छात्रों का एक समूह जिसे तालिबान के नाम से जाना जाता था, वो बहुत लोकप्रिय हो गया.
उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता में आने पर शांति और सुरक्षा के साथ इस्लाम के सख्त शरिया क़ानून लागू करने का वादा किया था. तालिबान को लोगों का समर्थन मिला और उन्होंने जल्द ही काबुल को जीत लिया.
साल 1996 की शुरुआत होते-होते लगभग पूरा अफ़ग़ानिस्तान ही तालिबान के नियंत्रण में आ गया. तब तक अल-क़ायदा एक ऐसा संगठन बन गया था जिसकी भूमिका एक सपोर्ट नेटवर्क से कहीं ज़्यादा हो गई थी.
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दुनिया भर में चरमपंथी गतिविधियों को अंजाम देने के दावे के साथ अल-क़ायदा एक जिहादी संगठन बन गया था. और तालिबान की हुकूमत ने कुछ तो एहसान में और कुछ तो पैसे की वजह से अल-क़ायदा को अफ़ग़ानिस्तान में पनाह दी, उनका स्वागत किया.
अल-क़ायदा का इराक़ धड़ा इस्लामिक स्टेट की सीधी अगुवाई कर रहा था. साल 2003 में इराक़ पर अमेरिकी हमले के बाद अल-क़ायदा की विदेशी सेना के ख़िलाफ़ प्रतिरोध में प्रमुख भूमिका थी.
साल 2006 में इराक में अल-क़ायदा और दूसरे चरमपंथी गुटों का विलय हो गया और उन्होंने खुद को 'इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक़' का नाम दिया. ये नया संगठन इस्लाम की दुनिया भर में अगुवाई करना चाहता था और अब वो अल-क़ायदा के मूल विचारों के ख़िलाफ़ था.
साल 2011 में जब इस्लामिक स्टेट का प्रभाव सीरिया में बढ़ने लगा तो उसने अपनी खिलाफ़त का एलान किया अल-क़ायदा से दूरी बना ली.
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इस्लाम की व्याख्या
बीबीसी मुंडो ने इस सवाल को लेकर जिन विशेषज्ञों से बात की, उनका कहना था कि तालिबान, अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट, ये तीनों ही संगठन इस्लाम की अपने तरीके कट्टरपंथी व्याख्या करते हैं.
इससे भी ज़्यादा अहम बात ये है कि तीनों ही इस्लाम की सुन्नी शाखा से जुड़े हैं जो शियाओं की तुलना में क़ुरान में वर्णित सिद्धांतों के आधार पर कड़ी व्याख्या करते हैं. मुस्लिम देशों के बीच भी कई मतभेद इस्लाम की अलग-अलग व्याख्याओं को लेकर रहा है.
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लंदन के किंग्स कॉलेज के रिसर्चर माइकल ग्रोप्पी कहते हैं, "वे मानते हैं कि इस्लाम के नाम पर हिंसा करना वाजिब है. ये एक कर्तव्य है और जो इसका पालन नहीं करता है, वो एक बुरा मुसलमान है."
"ये तीनों संगठन इस बात पर यकीन रखते हैं कि सामाजिक और राजनीतिक जीवन को धार्मिक जीवन से अलग नहीं किया जा सकता है. बाइबल की तरह की क़ुरान में कुछ कड़े प्रावधान दिए गए हैं. लेकिन मुसलमानों की बड़ी आबादी इन हिंसक सिद्धांतों को खारिज करती है."
हालांकि तीनों ही संगठन की कट्टरता उनके उद्देश्यों के हिसाब से अलग-अलग है. विशेषज्ञों इसी पहलू को लेकर तीनों संगठनों के फर्क को समझाते हैं.
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तीनों संगठनों का मक़सद
तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में शरिया क़ानून लागू करना चाहता है. आख़िरी बार जब उसने ऐसा किया था तो अफ़ग़ानिस्तान में एक ऐसा निज़ाम लागू कर दिया गया था, जो ख़ास तौर पर औरतों के ख़िलाफ़ था.
साल 1996 से साल 2001 के बीच तालिबान के उस दौर की कड़वी यादों के कारण ही बहुत से अफ़ग़ानों ने हाल के हफ़्तों में अफ़ग़ानिस्तान छोड़ दिया है. उन्हें डर है कि तालिबान की वापसी के साथ ही इतिहास खुद को दोहराएगा.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ जॉर्ज टाउन में चरमपंथ और मध्य पूर्व मामलों के जानकार डेनियल बेमैन कहते हैं, "अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट की तुलना में देखें तो तालिबान उतना कट्टरपंथी नहीं है. वे अफ़ग़ानिस्तान के गौरवशाली दिनों को पहले की तरह लाना चाहते हैं."
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"तीनों के बीच सबसे बड़ा अंतर ये है कि अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट की अंतरराष्ट्रीय स्तर की महत्वाकांक्षाएं हैं जबकि तालिबान का फोकस केवल अफ़ग़ानिस्तान पर है."
ये भी अजीब बात है कि अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट ख़िलाफ़त की स्थापना को लेकर एक दूसरे से सहमत दिखते हैं. इस निज़ाम में जो ख़लीफ़ा होता है, वो दुनिया भर के मुसलमानों का सियासी और मज़हबी रहनुमा होता है.
डेनियल बेमैन कहते हैं, "लेकिन इसमें भी एक फ़र्क है. इस्लामिक स्टेट ख़िलाफत की स्थापना अभी करना चाहता है जबकि अल-क़ायदा का मानना है कि ये जल्दबाज़ी होगी. उसका कहना है कि जिहादी समुदाय और मुस्लिम समाज इसके लिए अभी तैयार नहीं है. ये फ़िलहाल उनकी प्राथमिकता में नहीं है."
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तीनों के दुश्मन
तालिबान, अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट का एक ही दुश्मन है और वो है अमेरिका और पश्चिमी ताक़तें.
माइकल ग्रोप्पी कहते हैं, "उनके क़रीबी दुश्मन भी हैं, जिन्हें वो विधर्मी मानते हैं. ये वो सरकारें हैं जो अमेरिका और पश्चिमी देशों का समर्थन करती हैं. या फिर वो ताक़तें जो इस्लाम के अधिक कट्टर संस्करण को खारिज करती हैं. जिन्होंने धर्म और सरकार को एक दूसरे से अलग रखने का विकल्प चुना है, वे भी इन संगठनों के दुश्मन हैं."
ईरान और सीरिया इन विधर्मी सरकारों का उदाहरण हैं. हालांकि ईरान और सीरिया से उनकी दुश्मनी को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं. अमेरिका एक से ज़्यादा मौकों पर ये कह चुका है कि ईरान की शिया हुकूमत और सुन्नी अल-क़ायदा के बीच तालमेल की संभावना है.
डेनियल बेमैन कहते हैं, "इस्लामिक स्टेट शुरू से ही अल-क़ायदा की तुलना में अधिक हिंसक रहा है. पश्चिमी ताक़तों से जंग के अलावा इस्लामिक स्टेट की लड़ाई उन मुसलमानों से भी है जो उसकी विचारधारा पर यकीन नहीं करते हैं."
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विशेषज्ञ इस ओर ध्यान दिलाते हैं कि अल-क़ायदा का प्रमुख दुश्मन अमेरिका बना हुआ है जबकि इस्लामिक स्टेट मध्य पूर्व में शिया मुसलमानों के अलावा अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमला करता रहा है.
डेनियल बेमैन कहते हैं, "अल-क़ायजा शिया मुसलमानों को भी विधर्मी मानता है लेकिन उसका कहना है कि उनकी जान लेना बहुत कड़ा कदम होगा और संसाधनों की बर्बादी होगी. इससे जिहादी एजेंडे को भी नुक़सान पहुंचेगा."
माइकल ग्रोप्पी बताते हैं कि दूसरी तरफ़ इस्लामिक स्टेट तालिबान को दुश्मन मानता है और उसका कहना है कि तालिबान ने अमेरिका के साथ समझौता करके गद्दारी की है.
हालांकि इस्लामिक स्टेट एक तीसरे संगठन के जरिए तालिबान से जुड़ा हुआ है. विशेषज्ञों का कहना है कि इस्लामिक स्टेट की खुरासान शाखा का तालिबान के हक्कानी नेटवर्क से गहरा रिश्ता रहा है और उसकी वजह से वे तालिबान के भी करीबी हैं.
संक्षेप में कहें तो इस्लामिक स्टेट कई मोर्चों पर लड़ रहा है. अफ़ग़ानिस्तान में उसकी लड़ाई तालिबान के ख़िलाफ़ है जबकि साल 2014 में अल-क़ायदा से अलग होने के बाद उससे भी आईएस की लड़ाई रही है.
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तीनों के काम करने का तरीका
अमेरिका से लड़ने के लिए अल-क़ायदा ने सितंबर 11 जैसा भीषण हमला किया. इसके अलावा उसने मुसलमानों को समझाने के लिए प्रोपेगैंडा कैम्पेन शुरू किया.
डेनियल बेमैन कहते हैं, "इस्लामिक स्टेट भी इसी रास्ते पर चलने का एलान करता है लेकिन उसका तरीका अधिक हिंसक है. वो ज़्यादा बड़े इलाके को नियंत्रित करना चाहता है. वो ऐसा निज़ाम खड़ा करना चाहता है जहां मुसलमान लोग इस्लाम की उसकी व्याख्या के अनुसार रहें. इस्लामिक स्टेट के लिए चरमपंथ एक क्रांतिकारी लड़ाई का हिस्सा है. उसके नियंत्रण वाले इलाकों में सामूहिक नरसंहार, लोगों का सार्वजनिक तौर पर सिर काट देने और बलात्कार की घटनाएं आम बात हैं. वे लोगों को डराकर रखना चाहते हैं जबकि अल क़ायदा इस मामले में थोड़ा नरम है."
जैसे हाल ही इस्लामिक स्टेट की खुरासान शाखा ने काबुल एयरपोर्ट के पास खुदकुश हमला करके 200 लोगों की जान ले ली. जबकि तालिबान काबुल पर दखल करने से पहले तक अफ़ग़ान हुकूमत और सुरक्षा बलों को निशाना बनाता था.
इसके अलावा तीनों संगठनों के भर्ती के तरीके भी अलग हैं. हालांकि तीनों संगठनों ने अपने प्रभाव क्षेत्र वाले इलाकों में स्थानीय स्तर पर भर्तियां की हैं. लेकिन अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट मध्य पूर्व के बाहर से भी लोगों को अपने संगठन से जोड़ने में कामयाब रहे हैं.
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