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बाइडन के खिलाफ अमेरिका में गुस्सा, देश की इज्जत मिट्टी में मिला दी?

काबुल, 28 अगस्त। काबुल में 13 सैनिकों के मारे जाने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की प्रतिष्ठा धूल में मिल गयी है। अमेरिका के अधिकांश लोगों का मानना है कि राष्ट्रपति बाइडन की अदूरदर्शिता के कारण काबुल की घटना हुई है।

Afghanistan crisis anger in america against joe biden after blasts at kabul

अमेरिकी लोगों को अफगानिस्तान से निकालने की प्रक्रिया को फूलप्रूफ नहीं बनाया गया। जब कि हालात बहुत खराब थे और हर तरफ से खतरा मंडरा रहा था। हालांकि सैनिकों की मौत का बदला लेने के लिए बाइडन सरकार ने नांगरहार प्रांत में एयरस्ट्राइक कर घटना के मास्टरमाइंड को मार गिराने का दावा किया है। लेकिन अमेरिकी लोगों को ये बदला बहुत मामूली लग रहा है। उनका सवाल है, क्या बाइडन धूमिल हुए राष्ट्र गौरव को फिर से प्राप्त कर सकते हैं ?

“हमारे नेता अफगानिस्तान में फेल हो गये”

“हमारे नेता अफगानिस्तान में फेल हो गये”

अमेरिका के जो 13 सैनिक मारे गये हैं उनमें से कुछ के परिजनों का कहना है, अगर बेटा दुश्मन से लड़ते हुए मारा जाता तो उन्हें गर्व होता। लेकिन ये तो अमेरिकी सैन्य अधिकारियों की लापरवाही से हमला हो गया। काबुल आत्मघाती हमले में अमेरिकी सैनिक करीम निकोउई भी मारे गये हैं। उनके पिता स्टीव निकोउई ने कहा, मैं तो अपने ही सैन्य नेताओं को दोष दूंगा। राष्ट्रपति बाइडन भी इसक लिए जवाबदेह हैं। इस बीच अमेरिका के एक मरीन सैन्य अधिकारी स्टुअर्ट शेलर ने एक फेसबुक पोस्ट में कहा है, हमारे वरिष्ठ नेता अफगानिस्तान में फेल हो गये हैं और उन्हें इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। इसके चलते शेलर को सेना से कार्यमुक्त कर दिया गया है। यानी काबुल की घटना के बाद राष्ट्रपति बाइडेन के खिलाफ आक्रोश बढ़ गया है।

बागरम एयरबेस को क्यों खाली किया ?

बागरम एयरबेस को क्यों खाली किया ?

स्टुअर्ट शेलर ने कहा है, मैं य़े नहीं कहता कि अमेरिकी सैनिकों को हमेशा के लिए अफगानिस्तान में रहना चाहिए। लेकिन अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों और नागरिकों की निकासी एक योजनाबद्ध तरीके से होनी चाहिए थी। इस योजना में इंटेलिजेंस इनपुट और बैकअप प्लान को शामिल किया जाना चाहिए था। हमें अफागानिस्तान स्थित बागरम एयरबेस को पहले नहीं खाली करना चाहिए था। सामरिक दृष्टिकोण से यह हमारा सबसे प्रभावशाली एयरबेस था। आपात स्थिति में हम यहां से अपने सैनिकों और नागरिकों को निकाल सकते थे। बागरम एयरबेस तब तक नहीं खाली करना चाहिए था तब कि अमेरिका के सभी नागरिक अफगानिस्तान से निकाल नहीं लिये जाते। लेकिन अफसोस ये कि अमेरिकी सरकार और सैन्य अधिकारियों ने इस फाइनल एयरलिफ्ट के बहुत पहले ही बगरम को खाली कर दिया था। काबुल हवाई अड्डा पर कम जगह को देखते हुए सुरक्षा के कई स्तर होने चाहिए थे। लेकिन ये कैसी व्यवस्था थी कि अमेरिकी सैनिक आत्मघाती हमलावार की जद में आ गये ? क्या अमेरिकी सरकार इस गलती को मानेगी ?

बाइडन ने सार दोष ट्रंप पर मढ़ा

बाइडन ने सार दोष ट्रंप पर मढ़ा

महाशक्ति माने जाने वाले अमेरिका की साख पर काबुल हमला, एक बड़ा धब्बा है। 2011 के बाद से अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों पर इतना बड़ा हमला कभी नहीं हुआ था। फऱवरी 2020 से अमेरिक का एक भी सैनिक अफगनिस्तान में नहीं मारा गया था। लेकिन चलते चलते आखिर में इतनी बड़ी घटना हो गयी। काबुल एयरपोर्ट पर आत्मघाती हमले में 13 अमेरिकी सैनिकों के साथ 170 से अधिक लोग मारे गये। हालांकि राष्ट्रपति बाइडन ने इस घटना की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली है लेकिन गलती का ठीकरा उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के माथे पर फोड़ दिय है। बाइडन ने प्रेस वार्ता में कहा, ट्रंप ने अपने शासनकाल में तालिबान से समझौता किय था कि अमेरिकी सैनिक 1 मई 2020 तक अफगनिस्तान से लौट आएंगे। लेकिन उन्होंने समय सीमा का पालन नहीं किया। सैनिकों की वापसी में एक साल से अधिक की देर हो गयी। अगर 1 मई को अमेरिकी सैनिकों की वापसी हो गयी रहती तो आज ये दुखदायी घटना नहीं हुई होती।

तालिबान से नरमी का खामियाजा

तालिबान से नरमी का खामियाजा

क्या अमेरिका अफगानिस्तान से निकलने की बहुत हड़बड़ी में था ? क्या इसी हड़बड़ी की वजह से सुरक्षा में चूक हो गयी ? अमेरिकी सैनिक और नागरिक तालिबान के आने से पहले क्यों नहीं अफगानिस्तान से बाहर निकले ? कूटनीतिक मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि काबुल की घटना अमेरिकी विदेशनीति की सबसे बड़ी हार है। बाइडन प्रशासन हालात को संभाल नहीं पाया। उसने अपनी क्षमता की सही इस्तेमाल नहीं किया। अमेरिका ने सख्ती नहीं दिखायी जिसकी वजह से तालिबान ने उसे हर हाल में 31 अगस्त तक निकल जाने का अल्टीमेटम सुना दिया। इस अल्टीमेटम पर बाइडन प्रशासन की प्रतिक्रिया बहुत ठंडी और रक्षात्मक रही। 2001 के बाद अफगानिस्तान में आज तक ऐसा नहीं हुआ कि तालिबान अमेरिका को आंख दिखाए और अल्टीमेटम दे। अगर कबुल एयरपोर्ट के दस किलोमीटर के दायरे में अमेरिका या या नाटो सैनिकों का नियंत्रण बना रहता तो ये हादसा नहीं होता। तालिबान पर भरोसा करना बाइडन को महंगा पड़ गया। अब उनके खिलाफ अमेरिका में बहुत गुस्सा है।

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