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पहलवानों के देश ने यूं बचाया काबुल एयरपोर्ट को, तब बची हजारों लोगों की जान

काबुल, 23 अगस्त। अगर अजरबैजान के शांति सैनिक काबुल एयरपोर्ट पर तैनात नहीं होते तो हजारों लोगों की एयरलिफ्ट मुमकिन नहीं हो पाती। जब 15 अगस्त को तालिबान ने काबुल शहर पर कब्जा जमाया तब तक वे काबुल के हामिद करजई इंटरनेशनल एयरपोर्ट को अपनी गिरफ्त में नहीं ले सके थे। उस समय अजरबैजान के सैनिक नाटो के 'पार्टनरशिप फॉर पीस' कार्यक्रम के तहत एयरपोर्ट पर तैनात थे। इनकी तैनाती कुछ महीने पहले हुई थी जब अशरफ गनी की सरकार वजूद में थी।

afghanistan crisis airlift of people not possible without Azerbaijani Peacekeepers at Kabul airport

अफगानिस्तान से भागने के लिए हजारों लोग काबुल एयरपोर्ट पर जमा थे। तब तक अमेरिका और पश्चिमी देशों से बैकअप टीम भी नहीं पहुंची थी। अजरबैजान के सैनिकों ने तालिबान की कोई परवाह नहीं की। उन्होंने अपने बूते हवाई सेवा को जारी रखा। एयर ट्राफिक कंट्रोल, ईंधन और संचाऱ की सारी जवाबदेही अजरबैजान ने खुद उठायी। बाद में अमेरिका, ब्रिटेन ,तुर्की ने भी मोर्चा संभाला। उस समय अफगानिस्तान में पावर वैक्यूम था। तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा भले कर लिया था लेकिन सरकार के स्तर पर फैसला लेने वाला कोई नहीं था। नाटो के महासचिव जेंस स्टोल्टेनबर्ग ने अजरबैजान को इस सहयोग के लिए तहेदिल से शुक्रिया कहा है। उन्होंने कहा, कठिन परिस्थितियों में काबुल एयरपोर्ट की सुरक्षा के लिए अजरबैजान की अहम भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता।

धर्मनिरपेक्ष मुस्लिम देश

धर्मनिरपेक्ष मुस्लिम देश

अजरबैजान पहले सोवियत संघ का हिस्सा था। 1991 में यह एक आजाद मुल्क बना। इसकी सीमा अफगानिस्तान से तो नहीं मिलती लेकिन यह उसके नजदीक है। अजरबैजान से कैस्पियन सागर होते हुए तुर्कमेनिस्तान औऱ फिर वहां से अफगानिस्तान पहुंचा जा सकता है। अजरबैजान केन्द्रीय एशिया का एक मुस्लिम बहुल देश है लेकिन इसकी कई खूबियां इसे बाकी देशों से अलग कर देती हैं। यहां 96 फीसदी आबादी मुसलमानों की है लेकिन इसके बावजूद यह एक धरमनिरपेक्ष और गणतांत्रिक देश है। मुस्लिम आबादी की अधिकता के बाद भी अजरबैजान एक आधुनिक और फैशनेबल देश है। राजधानी बाकू में अक्सर फैशन वीक इवेंट का आयोजन होते रहता है। यहां डिजाइनर कपड़े पहनने वाली युवतियों की कोई कमी नहीं है। तेल की वजह से यह एक सम्पन्न देश है। यहां धर्म के नाम पर हिंसा की कोई गुंजाइश नहीं है। ईसाई बहुल आर्मेनिया के साथ जरूर इसकी लड़ाई चल रही है लेकिन इस्लामिक देशों जैसे हालात नहीं हैं।

पहलवानों का देश

पहलवानों का देश

अजरबैजान के केवल 150 सैनिक काबुल एयरपोर्ट पर तैनात थे। फिर भी बर्बर तालिबानियों से क्यों नहीं डरे ? दरअसल अजरबैजान के लोग मानसिक और शारारिक रूप से बहुत मजबूत होते हैं। सेंट्रल एशिया में इसे पहलवानों का देश कहा जाता है। पहलवानी यहां का राष्ट्रीय खेल की तरह है। आजाद मुल्क बनने के बाद अजरबैजान पहली बार 1996 के ओलम्पिक में शामिल हुआ। तब से इसने कुश्ती में कुल 14 पदक जीते हैं जिसमें चार गोल्ड शामिल हैं। इस बात से समझ सकते हैं कि अजरबैजान में कुश्ती को लेकर कितना जुनून है। इसके अलावा यहां शतरंज भी बहुत लोकप्रिय है। विश्व शतरंज प्रतियोगिता के विजेता और महान शतरंज खिलाड़ी गैरी कास्पारोव का तो नाम सुना ही होगा। कास्पारोव का जन्म अजरबैजान की राजधानी बाकू में हुआ था। तब यह सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करता था। यानी अजरबैजान एक प्रगतिशील और मजबूत इरादों वाले नागरिकों का देश है। इस मानसिक मजबूती ने ही अजरबैजानी सैनिकों को हालात से जूझने का हौसला दिया।

काबुल से निकलना आसान नहीं था

काबुल से निकलना आसान नहीं था

अफगानिस्तान में तालिबान के आने के बाद औरतें जिस तरह से खौफजदा हैं उससे पूरी दुनिया चिंता में पड़ गयी है। लेकिन अजरबैजान में ऐसी बात नहीं है। कानून के हिसाब से यहां औरतों को मर्दों के बराबर ही अधिकार दिये गये हैं। अजरबैजान में औरतों के पढ़ने लिखने की पूरी आजादी है। वे राजनीति में भी खुल कर भाग ले सकती हैं। 2020 के संसदीय चुनाव में 22 महिलाएं चुनी गयीं थीं। 125 सदस्यों वाले सदन में 22 महिला सांसद थीं। यहां तक कि स्पीकर का पद पर भी एक महिला (साहिबा गाफारोवा) को ही मिला। अजरबैजान में 78 फीसदी शिक्षक महिलाएं ही हैं। तालिबान संकट के समय अजरबैजान के सैनिकों की तारीफ से विश्व समुदाय में इसकी प्रतिष्ठा बढ़ गयी है। काबुल एयरपोर्ट के सुरक्षित रहने से हजारों लोगों के साथ साथ भारत के भी लोगों की वतन वापसी संभव हो सकी। अब तक सात सौ लोगों को अफगानिस्तान से बचा कर भारत लाया गया है। अजरबैजान ने काबुल एयरपोर्ट को शुरू में तालिबानियों से बचा कर रखा। बाद में अमेरिका के रेंजर्स फोर्स के जवानों ने उसे अपने कब्जे में ले लिया था। तालिबान के घेरे को पार एयरपोर्ट तक पहुंचाना आसान नहीं था।

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