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26/11 मुंबई हमला के 15 साल: भारत के वो 3 रणनीतिक फैसले, आखिर क्यों नहीं किया गया पाकिस्तान पर हमला? समझिए

15 years of 26/11: पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने 22 नवंबर 2008 को एक वीडियो-लिंक के जरिए नई दिल्ली में एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए बेनजीर भुट्टो का जिक्र करते हुए कहा, कि हर पाकिस्तानी के भीतर 'थोड़ा सा भारत' है, जैसे हर भारतीय के अंदर थोड़ा सा पाकिस्तान है। भारत में यह देखा गया, कि यदि पाकिस्तान में नागरिक सत्ता मजबूत हो गई, तो भारत-पाकिस्तान संबंधों में बाधा डालने वाली बुराइयां तेजी से दूर हो जाएंगी।

लेकिन, जैसा कि पाकिस्तान में पूर्व भारतीय उच्चायुक्त टीसीए राघवन ने अपनी पुस्तक द पीपल नेक्स्ट डोर: द क्यूरियस हिस्ट्री ऑफ़ इंडियाज़ रिलेशंस विद पाकिस्तान (2017) में लिखा है, कि जरदारी के इस भाषण के ठीक चार दिनों के बाद भारत पर पाकिस्तान की तरफ से आतंकवादी हमला किया गया और 26 नवंबर 2008 के बाद यह बहस अपने आप में इतिहास बन गई।

15 years of 26/11

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कई आतंकवादी हमलों को देखा है, लेकिन 2008 में मुंबई में हुआ हमला एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने भारत की रणनीति और दुनिया में रिश्तों को मौलिक रूप से बदल दिया।

आइये, वो तीन स्ट्रैटजिक तरीके जानते हैं, जिनसे पिछले 15 वर्षों में भारत के दृष्टिकोण से रणनीतिक खेल खेला गया है।

1- अब भारत की नजर में अपराधी बना पाकिस्तान

हालांकि, अमेरिका पर हुए 9/11 के हमले को पहली बार दुनिया ने आतंकवाद के चश्मे से देखा था, क्योंकि उससे पहले जब भारत आतंकवाद की बात करता था, तो उसे चुनिंदा समर्थन ही मिलता था, लेकिन मुंबई हमले के बाद दुनिया इस तथ्य को पूरी तरह से स्वीकार कर पाया, कि भारत आतंकवाद का सबसे बड़ा पीड़ित है।

जबकि, भारत 80 के दशक से ही आतंकवाद का शिकार रहा है। पाकिस्तानी आतंकियों के साथ साथ खालिस्तान और लिट्टे आतंकी हमलों को भी भारत ने बर्दाश्त किया, जिसने भारत के दो-दो प्रधानमंत्रियों की जान ले ली थी। लेकिन, मुंबई हमले ने आतंकवाद के उस पर्दे को हटा दिया, जिसके पीछे पाकिस्तान का चेहरा अब साफ साफ दिख रहा था। पूरी दुनिया ने पहली बार स्वीकार किया, कि इस आतंकवादी हमले का प्रायोजक पाकिस्तान था।

जबकि, इससे पहले भारत जब भी आतंकवाद की बात करता था, तो उसकी आवाज पाकिस्तान के प्रोपेगेंडा में दब जाती थी, लेकिन 26/11 के बाद दुनिया के सामने अशांत दक्षिण एशियाई क्षेत्र खड़ा था, जहां आतंकवाद अब पूरी तरह से सिर उठाए खड़ा था। तथ्य यह भी है, कि मुंबई हमले में मारे गए लोग भारत के अलावा 16 देशों से संबंध रखते थे और अन्य सात देशों के नागरिक घायल हुए थे, लिहाजा 26/11 का आतंकवादी हमला, भारतीय धरती पर पहला वास्तविक वैश्विक हमला माना गया।

सबसे हत्वपूर्ण बात यह है, कि इसने आतंकवाद पर पाकिस्तान के रिकॉर्ड को सुर्खियों में ला दिया। भारत अब सबूतों के साथ यह दिखाने में सक्षम था, कि पाकिस्तान की आईएसआई और सेना, भारत पर आतंकवादी हमलों की साजिश रच रही थी और उन्हें अंजाम दे रही थी। लिहाजा, हाल के वर्षों में जब उरी, पठानकोट और पुलवामा में आतंकी हमले हुए, तो नई दिल्ली के सामने पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराने में कोई मुश्किल नहीं आई।

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2- भारत के साथ आए अमेरिका और पश्चिमी देश

26/11 के हमलों में छह अमेरिकियों की मौत के साथ प्रत्येक जी7 देश से कोई ना कोई पीड़ित था। भारत को पश्चिमी दुनिया से जो सहानुभूति मिली, उसके पीछे यह एक प्रमुख फैक्टर था। इसके अलावा, यह हमला तब हुआ था, जब नई दिल्ली और वाशिंगटन एक रणनीतिक बातचीत में शामिल थे। इस हमले से ठीक एक महीने पहले ही, भारत और अमेरिका ने परमाणु समझौते पर (अक्टूबर 2008) हस्ताक्षर किए गए थे।

लिहाजा, मुंबई हमले ने वास्तव में दिल्ली को पश्चिम के साथ रणनीतिक रणनीति बनाने को लेकर बढ़ावा देने का लाभ और तर्क दिया। जबकि 9/11 के हमलों के बाद, अमेरिका को अफगानिस्तान और पाकिस्तान के प्रति अपनी नीति में एक नाटकीय बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ा, 26/11 ने इसे भारत के काफी करीब ला दिया।

इतिहासकार श्रीनाथ राघवन ने अपनी पुस्तक, द मोस्ट डेंजरस प्लेस: ए हिस्ट्री ऑफ यूएस इन साउथ एशिया (2018) में लिखा है, कि कैसे संयोगवश, आईएसआई प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल महमूद अहमद वाशिंगटन डीसी में थे, जब 9/11 हमला हुआ था और मुशर्रफ ने उन्हें इसलिए भेजा था, ताकि वो बुश प्रशासन को तालिबान से जुड़ने के लिए मना सके।

वॉशिंगटन में अपनी सेवाएं दे चुके पाकिस्तानी राजनयिक हुसैन हक्कानी ने अपनी पुस्तक मैग्निफ़िसेंट डिल्यूज़न्स: पाकिस्तान, द यूएस एंड एन एपिक हिस्ट्री ऑफ़ मिसअंडरस्टैंडिंग (2013) में लिखा है, कि "मुंबई हमलों ने पाकिस्तान के लिए बुश प्रशासन की सहानुभूति खो दी।" उन्होंने लिखा, कि "अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस ने तत्कालीन पाकिस्तान एनएसए महमूद दुर्रानी को बताया, कि लश्कर और आईएसआई के बीच लगातार संपर्क थे..."

हक्कानी ने लिखा है, कि मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान अब अमेरिका की नजरों में अपनी विश्वसनीयता खो चुका था और उसकी साख पूरी तरह से खत्म हो गई और रही सही कसर एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद पूरी हो गई।

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3. भारत का रणनीतिक संयम और उसके लाभ

26/11 के हमले के फौरन बाद, भारत में बड़ी बहस शुरू हो चुकी थी, कि इस आतंकी हमले का जबाव किस तरह से दिया जाना चाहिए। ये बहस दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर हमले के बाद भी हुई थी, कि आखिर किस तरह की कार्रवाई की जानी चाहिए?

भारत के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने अपनी पुस्तक, च्वाइसेस: इनसाइड द मेकिंग ऑफ इंडियाज फॉरेन पॉलिसी (2016) में भारत की संयमित प्रतिक्रिया पर लिखा है, कि "भारत ने पाकिस्तान पर तुरंत हमला क्यों नहीं किया, इसका सरल उत्तर यह है, कि विकल्पों की जांच करने के बाद, सरकार के उच्चतम स्तर पर, निर्णय निर्माताओं ने निष्कर्ष निकाला, कि पाकिस्तान पर हमला करने की तुलना में उस पर हमला न करने से ज्यादा लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

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हमला करने से आतंकवादी घटना का शोर जंग की आवाज में दब जाती, लेकिन हमला नहीं करने से भारत पाकिस्तान को अलग-थलग करने में कामयाब हो गया। लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन अब पूरी दुनिया में पहचाने जाने लगे। भारत आतंकवाद का सबसे बड़ा पीड़ित माना जाने लगा। मेनन ने लिखा है, कि "भारत को अब सऊदी अरब और फारस की खाड़ी के देशों से अभूतपूर्व सहयोग मिलना शुरू हो गया और चीन ने भी इन समूहों के बारे में जानकारी के अनुरोधों का जवाब देना शुरू कर दिया।"

मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद यह बदलाव उल्लेखनीय था और तब से इसका लगातार लाभ मिल रहा है। क्योंकि, जब भारत ने 2016 में उरी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 में बालाकोट हवाई हमला किया, तो भारत की कहीं से भी आलोचना नहीं की गई और ऐसा इसलिए, क्योंकि दिल्ली ने 2008 में रणनीतिक संयम दिखाया था।

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