Independence Day: खातीपुरा और सराफा से हुआ आजादी का आगाज, स्वतंत्रता संग्राम में ऐसा है इंदौर का इतिहास
Independence Day 2024: देशभर में स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त को लेकर जोश और उत्साह नजर आ रहा है, जहां इस दिन हर कोई राष्ट्रभक्ती के रंग में रंगा नजर आ रहा है। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ था, जहां आजादी की लड़ाई में कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपना बहुमूल्य योगदान दिया था।
आजादी की लड़ाई में मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर से भी कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शामिल हुए थे, जिन्होंने इंदौर में आजादी लड़ाई में अपना अहम योगदान दिया है। इंदौर में आजादी की लड़ाई के वक्त किस तरह के हालात थे, और क्या कुछ संघर्ष उसे वक्त स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को करना पड़ा, यह जानने के लिए वन इंडिया हिंदी की टीम इतिहासकार मदन परमालिया के पास पहुंची, जहां मदन परमालिया ने उस वक्त के हालातों का जिक्र करते हुए आजादी में इंदौर की लड़ाई को बखूबी बयां किया है।

इतिहासकार मदन परमालिया ने वन इंडिया हिंदी से खास बातचीत में बताया कि, 8 अगस्त 1942 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने पहली बार पूरे भारतवर्ष में यह घोषणा की थी की, अंग्रेजों भारत छोड़ो और करो या मरो की नीति को लेकर आव्हान हुआ, और 9 अगस्त 1942 को मुंबई के महाधिवेशन में हमारे इंदौर शहर मालवा प्रांत से लेकर पूरे भारतवर्ष के स्वतंत्रता आंदोलन के रूप में जो बाल बच्चे के रूप में थे, जिनकी उम्र पढ़ने लिखने की थी, वह सभी गांधी जी के आव्हान पर देश की स्वतंत्रता के लिए उतर गए, और उन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई में भाग लेकर देश को आजाद कराया
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इतिहासकार मदन परमलिया बताते हैं की, इंदौर मालवा क्षेत्र प्रांत का जहां तक मामला आता है। 772 के लगभग स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी थे, जिन्होंने इस इंदौर शहर से आजादी की लड़ाई में भाग लेकर देश को आजाद करने में अपना योगदान दिया। इंदौर शहर में आजादी की लड़ाई की शुरुआत खातीपुरा चौराहा है, जिसे अब जेल रोड चौराहा कहा जाता है। वहां पर उस वक्त 100 फीट के मकान हुआ करते थे, वहां एक तरफ ब्रिटिश शासन था, एक तरफ होलकर शासन था, वहां पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ब्रिटिश शासन में गदर मचाते थे और जब पुलिस उनको पकड़ने आई थी, तो वह होलकर शासन में चले जाया करते थे, और जब होलकर शासन में किसी तरह की प्रताड़ना होती थी, तो वह ब्रिटिश शासन में आ जाया करते थे। इंदौर शहर में दो जगह से क्रांति का बिल्कुल बजा, एक खातीपुरा और एक सराफा।

परमालिया बताते हैं की, सबसे बड़ी सराफा की विशेषता यह थी कि, वहां एक कोठी हुआ करती थी, उसे बीच में से काट दिया गया था। कोठी को काटकर उसमें रेती भारती गई थी, और एक डंडा उसमें लगा दिया गया था, जिससे सिंदूर से पोत दिया गया था, जब भी कोई क्रांतिकारी वहां पर आता था, तो वह उस डंडे को हिला दिया करता था, जब वह हिलाता था तो समझ जाते थे कि, कोई ना कोई क्रांतिकारी आया है, वहां मंत्रणा हो जाया करती थी, और देश की आजादी के लिए वह क्रांतिकारी अपना भाग लेते थे। इंदौर मालवा प्रांत में इसी तरह 2 जगह क्रांति की शुरुआत हुई।
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