बाल्कन के रास्ते यूरोप में घुसने की नाकाम कोशिश में भारतीय

किकिंडा के कैंप में क्रिकेट खेलते आप्रवासी

मॉस्को, 26 फरवरी। हंगरी और रोमानिया के नजदीक स्थित सर्बिया के सीमाई शहर किकिन्डा में करीब 100 भारतीय आप्रवासी एक रिसेप्शन सेंटर में रह रहे हैं. उन्हें यूरोपीय संघ में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली है.

यूरोपीय संघ के दो सदस्य देशों की सीमा से लगे होने की वजह से किकिन्डा शहर प्रवासियों का एक लोकप्रिय ठिकाना बन गया है. कैंप के प्रवेश प्रभारी आंद्रेया मारचेंको ने डॉयचे वेले को बताया कि "केंद्र में हमारे पास 540 बिस्तर है लेकिन अभी फिलहाल 550 आप्रवासी यहां रह रहे हैं. इसका मतलब है कि हम अपनी क्षमता से ऊपर हैं. 360 लोग बांग्लादेश से आए थे, और करीब 100 भारत से. यह एक नया ट्रेंड है. पिछले कुछ महीने से यहां भारतीय आ रहे हैं."

इस कैंप में सिर्फ पुरुष रखे गए हैं. इसका संचालन सर्बिया की शरणार्थी एजेंसी करती है. प्रवास अंतरराष्ट्रीय संगठन (आईओएम) और संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (यूएनएचसीआर) से उसे सहायता मिलती है. शिविर में खेल का मैदान भी है जहां आप्रवासी क्रिकेट खेल सकते हैं.

किकिंडा कैंप में बहुत से लोग 2017 से ही रह रहे हैं.

पुलिस पर दुर्व्यवहार का आरोप

भारत के पंजाब राज्य से आए 39 साल के हरजिंदर कुमार ने डीडब्ल्यू को बताया कि वो कई महीने पहले सर्बिया आए थे. उनका कहना है कि अपनी मां के इलाज के लिए उन्होंने लोगों से पैसे उधार लिए थे और उन पर भारी कर्ज हो गया है. वो कहते हैं, "मैं एक ना एक दिन यूरोपीय संघ पहुंचने की उम्मीद के साथ सर्बिया आया हूं. वहां पहुंच जाऊं तो मैं अपना सारा कर्ज चुका दूंगा."

हालांकि यूरोपीय संघ में दाखिल होने की कुमार की कई कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं. वो कहते हैं कि वो सर्बिया में खुद को फंसा हुआ महसूस करने लगे हैं. इस गैरकानूनी यात्रा के लिए मानव तस्करों को भुगतान के रूप में 2000 यूरो गंवा चुके हैं. कुमार शिविर में चिकन बिरयानी पका कर बेचते हैं. वो कहते हैं कि "यहां मेरे और मेरे कुछ दोस्तों के लिए यह जेबखर्च जैसा है."

वैसे तो कई प्रवासी सेंटर की मुख्य इमारत के भीतर ही रहते हैं. लेकिन अधिकांश भारतीय परिसर के एक कोने में एक विशाल सफेद तंबू में रह रहे हैं. अधिकारियों ने ये नहीं बताया कि भारतीय प्रवासियों के लिए अलग जगह क्यों रखी गई है.

किकिंडा कैंप में भारत के जसबीर सिंह

27 साल के जसबीर सिंह ने बताया कि भारत में नौकरी नहीं मिली तो वो कुछ महीने पहले सर्बिया चले आए थे. वो कहते हैं कि ईयू में घुसने की कोशिश के एवज में उन्हें 12 हजार यूरो देने पड़े थे. कुमार की तरह सिंह भी भारत के उत्तरी राज्य पंजाब से हैं. सिंह कहते हैं कि उन्होंने हंगरी, रोमानिया और क्रोएशिया के रास्ते यूरोपीय संघ में गैरकानूनी ढंग से घुसने की कोशिश की थी. ईयू की सीमाओं की चौकसी करने वाली एजेंसी, फ्रंटेक्स और सीमा पुलिस के सख्त पहरे ने उनकी सारी कोशिशें बेकार कर दीं.

जसबीर सिंह ने यह भी कहा कि सीमाओं पर पुलिस ने उनके साथ बुरा बर्ताव भी किया था. सिंह ने डीडब्ल्यू से कहा, "यूरोपीय पुलिस हमारा सम्मान नहीं करती. चेकिंग के दौरान वे हमारी पगड़ी तक निकाल देते हैं और जर्बदस्ती हमारी दाढ़ी पकड़कर खींचते हैं. वे हमारे कपड़े भी उतरवा देते हैं और कड़ी ठंड के बीच जबरन वापस सर्बिया भेज देते हैं." सालों से प्रवासी क्रोएशिया, हंगरी और रोमानिया में सीमा सुरक्षा बलों पर हिंसक ढंग से वापस खदेड़ने का आरोप लगाते रहे हैं.

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बाल्कन का रास्ता क्यों ले रहे हैं भारतीय

2015 और 2016 में मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया) में संघर्ष और हिंसा से जान बचाकर भागने की कोशिश में हजारों की तादाद में शरणार्थी और प्रवासी, यूरोपीय संघ के सदस्य देश ग्रीस के रास्ते बोस्निया और सर्बिया होते हुए जर्मनी जैसे देशों तक पहुंच गए थे. जल्द ही ये रास्ता "बाल्कन रूट" के तौर पर मशहूर हो गया.

2017 से बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से कई प्रवासी गैरकानूनी ढंग से बाल्कन के रास्ते यूरोपीय संघ में दाखिल होने की कोशिश कर चुके हैं. भारतीय नागरिकों के लिए सर्बिया, यूरोप का इकलौता देश है जिसमें वीजा मुक्त प्रवेश दिया जाता है, इसीलिए वो लोकप्रिय ठिकाना भी बन गया है.

मारचेंको कहते हैं, "2017 से यह व्यवस्था है कि सर्बिया में अल्प अवधि की रिहाइश के लिए वीजा नहीं लगता. भारतीय बेलग्रेड की सीधी उड़ान लेकर आते हैं. यहां से वो यूरोपीय संघ के देशों में जाने की कोशिश करते हैं."

सर्बिया के किकिंडा कैंप में करीब 100 भारतीय हैं.

कुछ भारतीय प्रवासियों ने ग्रीस में रुके रहने की कोशिश भी की थी. इस महीने की शुरुआत में 16 प्रवासियों के एक समूह को ग्रीस की सीमा से यूरोपीय संघ में दाखिल होने की कोशिश के दौरान उत्तरी मैसीडोनिया में पुलिस ने हिरासत में ले लिया था.

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दूसरे भारतीय प्रवासी भी बोस्निया-हर्जेगोविना से क्रोएशिया में दाखिल होने की कोशिश करते हैं. उनका कहना है कि सर्बिया और बोस्निया के बीच गैरकानूनी ढंग से सीमा पार करना अपेक्षाकृत रूप से आसान है.

दर्जनों भारतीय बोस्निया के सीमाई शहर बिहाक में लीपा प्रवासी शिविर में रहते हैं. भारतीय प्रवासियों ने डीडब्ल्यू को बताया कि वे आर्थिक वजहों से यूरोपीय संघ जाना चाहते हैं. वे वहां पहुंचने की उम्मीद में बोस्निया आए थे.

लीपा कैंप में एक भारतीय प्रवासी वुपिन्दर ने डीडब्ल्यू से कहा, "मैं यूरोपीय संघ की सीमा पार कर पिछले महीने दो बार क्रोएशिया में दाखिल हो गया था. यूरोपीय संघ पहुंचने की मेरी कोशिश सफल नहीं हुई थी. क्रोएशिया की पुलिस ने मुझे वापस बोस्निया को निर्वासित कर दिया. मैंने ईयू आने के लिए मानव तस्करों को कोई पैसा नहीं दिया है. गूगल मैप्स के जरिए मैं अपने दम पर पहुंचने की कोशिश कर रहा हूं."

वुपिन्दर कहते हैं कि बाल्कन देशों के रास्ते गैरकानूनी ढंग से यूरोपीय संघ में दाखिल होने की कोशिश सुरक्षित नहीं है और ऐसा कोई ना ही करे तो बेहतर. वो कहते हैं, "अगर भारत में मेरे पास नौकरी होती तो मैं इस तरह बोस्निया ना आया होता."

Source: DW

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