आईटी क्षेत्र में जर्मनी की मझौली कंपनियों के साथ सहयोग बढ़ाएगा भारत

जर्मन अर्थव्यवस्था को आगे ले जाने में एसएमई सेक्टर की कंपनियों का बड़ा हाथ रहा है

नई दिल्ली, 09 जून। मिटेलश्टांड यानि छोटे और मझोले आकार वाली कंपनियां जर्मन अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं. उनके प्रतिनिधि संगठन BVMW मिटेलश्टांड ने जर्मनी में डिजिटल तरक्की को बढ़ावा देने के लिए भारतीय आईटी सेक्टर के साथ हाथ मिलाया है. जर्मनी के हनोवर में होने वाले विश्व के सबसे बड़े सालाना औद्योगिक मेले के दौरान मिटेलश्टांड संगठन ने भारत के नैसकॉम के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं.

जर्मनी के विख्यात एसएमई सेक्टर के सामने बीते सालों में जल्द से जल्द डिजिटाइजेशन की ओर बढ़ने की चुनौती पेश आ रही है. घरेलू बाजार और विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए इन कंपनियों को डिजिटल तौर तरीके अपनाने की जरूरत है. उद्योगों और नई तकनीकें विकसित करने के मामले में अग्रणी रहने वाला जर्मनी सॉफ्ट पावर यानि आईटी स्किल के मामले में भारत के साथ सहयोग को और गहरा बनाना चाहता है.

बाएं से दाएं: श्टेफान श्नॉर (जर्मन डिजिटल एवं ट्रांसपोर्ट मंत्रालय), पी. हरीश (भारतीय राजदूत, जर्मनी), मार्कुस येर्गर (जर्मन मिटेलश्टांड) और गगन सभरवाल (नैसकॉम)

जर्मन राजधानी बर्लिन स्थित भारतीय दूतावास में मीडिया से बातचीत में जर्मन मिटेलश्टांड के कार्यकारी अध्यक्ष मार्कुस येर्गर ने इस नए सहयोग समझौते को स्थायी और दूरगामी संबंध स्थापित करने की दिशा में एक अहम कदम बताया और कहा कि "पहले ही कुछ ठोस कदमों की योजना बना ली गई है जिससे सदस्य कंपनियों को अलग अलग मौकों पर इस फ्रेमवर्क के अंतर्गत साथ लाया जाएगा." मार्कुस येर्गर ने बताया, "डिजिटल युग में जर्मन अर्थव्यवस्था की रीढ़ यानि मिटेलश्टांड के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे अपने बिजनेस प्रोसेस इस तरह से डिजिटाइज करें कि वैश्विक बाजार में बने रहें. मुझे पूरा भरोसा है कि आईटी सेक्टर के भारतीय पार्टनर अपनी विशेषज्ञता और संसाधनों से इसमें मदद कर पाएंगे."

जर्मनी में भारत के राजदूत पी हरीश ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विस्तार से कहा कि भारतीय आईटी उद्योग जर्मन कंपनियों के डिजिटाइजेशन में किस तरह की भूमिका निभा सकता है. इस समझौते के अंतर्गत निवेश, संयुक्त उपक्रमों और बिजनेस डेलिगेशनों के आने जाने को बढ़ावा दिया जाएगा. ऐसे कदमों से द्विपक्षीय संबंधों को गहरा और भरोसेमंद बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है. इसके अलावा सेमिनार, कॉन्फ्रेंस और रोड शो जैसे कार्यक्रम आयोजित करने की भी योजना है. हनोवर की ही तरह जर्मनी के दूसरे व्यापार मेलों और प्रदर्शनियों में भी भारतीय आईटी कंपनियां शिरकत करेंगी और जर्मनी में कारोबारी संबंधों को बेहतर बनाएंगी.

नैसकॉम की अध्यक्ष देबयानी घोष ने इस समझौते के बारे में कहा, "एक ओर जर्मनी अत्याधुनिक रिसर्च, विकास और निर्माण के मामले में बेहतरीन है. वहीं भारत का तकनीक से जुड़ा एसएमई सेक्टर नई उभरती तकनीकों, क्लाउड तकनीक और डिजिटल तकनीक में दक्ष पेशेवरों की मदद से बहुत बड़े डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन से गुजरा है. ऐसे में यह दोनों ही देशों के छोटे और मझोले उद्योगों के लिए फायदे की साझेदारी साबित होनी चाहिए."

भारतीय आईटी उद्योग को अपने आप में एक पावरहाउस की संज्ञा दी जाने लगी है. इसके दो मुख्य कारण भारी आर्थिक प्रभाव और लाखों लोगों को इस सेक्टर में मिला रोजगार है. वहीं जर्मन मिटेलश्टांड भी अपने आप में बहुत खास हैं. जर्मनी के इन करीब 30 लाख छोटे और मझौले उद्यमों में मिलने वाले रोजगार के कारण देश में बेरोजगारी की दर भी यूरोप के दूसरे देशों के मुकाबले भी काफी कम रही है. इन कंपनियों में मिलने वाला व्यावसायिक प्रशिक्षण एक तरह से नौकरी पाने की गारंटी है. देश के 10 में 8 ट्रेनी इन्हीं उद्यमों में ट्रेनिंग पाते हैं.

Source: DW

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