हाथ रिक्शे नहीं देखे तो आपने कोलकाता नहीं देखा
जिन्होंने कोलकाता नहीं देखा है, उन्होंने शायद हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शे भी नहीं देखे होंगे.
सवा सौ साल से भी लंबे अरसे से कोलकाता की पहचान का हिस्सा रहे हाथ से खींचे जाने वाले ये रिक्शे अब अपना वजूद बनाए रखने के लिए जूझ रहे हैं.
आज़ादी के पहले और उसके ठीक बाद इसे शान की सवारी और स्टेट्स सिंबल माना जाता था. उस दौर में धनी लोग तो पालकी से चलते थे.
लेकिन मध्य वर्ग और उच्च मध्य वर्ग के लिए ये हाथ रिक्शा ही आवाजाही का प्रमुख साधन थे. इसे अमानवीय करार देते हुए राज्य सरकार कई बार इन पर पाबंदी लगा चुकी है.
लेकिन बाद में सामाजिक संगठनों और हेरिटेज विशेषज्ञों के दबाव में पाबंदी वापस ले ली गई. कोई 12 साल पहले सरकार ने इन रिक्शों के लाइसेंस का नवीनीकरण बंद कर दिया था.
मोटे अनुमान के मुताबिक़, कोलकाता में ऐसे लगभग 20 हज़ार रिक्शे हैं.
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ऐसे रिक्शे और कहीं नहीं चलते
'दो बीघा ज़मीन' और 'सिटी ऑफ़ जॉय' जैसी फ़िल्मों में हाथ रिक्शा चलाने वाले के दुख-दर्द का बेहद सजीव चित्रण किया गया था.
कोलकाता में इन रिक्शों की शुरुआत 19वीं सदी के आखिरी दिनों में चीनी व्यापारियों ने की थी. तब इसका मक़सद सामान की ढुलाई था.
लेकिन बदलते समय के साथ ब्रिटिश शासकों ने इसे परिवहन के सस्ते साधन के तौर पर विकसित किया. धीरे-धीरे ये रिक्शे कोलकाता की पहचान से जुड़ गए.
देश के किसी दूसरे शहर और दुनिया के किसी भी देश में ऐसे रिक्शे नहीं चलते.
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रिक्शेवाले ख़ुद इसे अमानवीय नहीं मानते
सरकार भले इसे बार-बार अमानवीय करार देकर इन पर पाबंदी लगाने का प्रयास करती हो, रिक्शेवाले इसे अमानवीय नहीं मानते.
बेतिया (बिहार) के राम प्रवेश कहते हैं, "मेरे दादा और पिता भी यहां रिक्शा चलाते थे. मैं और कोई काम ही नहीं जानता. रिक्शा बंद हो गया तो मेरा परिवार भूखों मर जाएगा."
वे बीते 24 सालों से यहां रिक्शा चला रहे हैं.
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इन रिक्शेवालों की कमाई बहुत कम
हाल में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक़, एक रिक्शा वाला 12 घंटे की कमरतोड़ मेहनत के बाद लगभग दो से ढाई सौ रुपये तक कमाता है.
इनमें से पचास रुपये तो रिक्शे का मालिक ले लेता है. बाक़ी पैसों में खाने-पीने का खर्च काटकर एक रिक्शावाला महीने में औसतन दो से तीन हज़ार रुपये अपने गांव भेजता है.
ये रिक्शे उन लोगों को ऐसी गलियों में भी ले जा सकते हैं, जहां दूसरी कोई सवारी नहीं जा सकती.
बरसात के सीजन में जब महानगर में सब कुछ ठप हो जाता है तब भी इन रिक्शों के ज़रिए जीवन मंथर गति से चलता रहता है.
यहां आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए विक्टोरिया मेमोरियल और हावड़ा ब्रिज के अलावा ये हाथ रिक्शे ही कोलकाता की पहचान रहे हैं.
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हाथ रिक्शे का इतिहास
ब्रिटिश भारत में ये रिक्शे महिलाओं की सबसे पसंदीदा सवारी थी.
इन रिक्शों के महानगर की सड़कों पर उतरने से पहले कोलकाता के कुलीन परिवारों और ज़मींदार घरों के लोग पालकी से चलते थे.
लेकिन ये रिक्शे धीरे-धीरे पालकियों की जगह लेने लगे.
इसकी एक वजह तो ये भी थी कि पालकी को ढोने के लिए जहां चार लोगों की ज़रूरत होती थी, वहीं ये रिक्शा महज एक आदमी खींच लेता है.
साल 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध के दौरान सीमा पार से आने वाले शरणार्थियों के लिए ये रिक्शा ही रोज़गार का सबसे बड़ा साधन था.
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बंद करने की मांग
इस पेशे को अमानवीय करार देते हुए विभिन्न मानवाधिकार संगठन अक्सर इसकी आलोचना भी करते रहे हैं.
राज्य की पूर्व वाममोर्चा सरकार ने भी कई बार इसे बंद करने की कोशिश की.
लेकिन इस पेशे से जुड़े हज़ारों लोगों की रोज़ी-रोटी का वैकल्पिक इंतज़ाम नहीं होने की वजह से मामला खटाई में पड़ गया.
मोतिहारी (बिहार) के मोहम्मद जमील पिछले चार दशक से कोलकाता में हाथ रिक्शा खींच कर रोज़ी-रोटी चला रहे हैं.
जमील सवाल करते हैं, "अगर सरकार ने इन रिक्शों पर पाबंदी लगा दी तो हम खाएंगे क्या? हम तो कोई और काम ही नहीं जानते."
'कोलकाता की पहचान'
कोलकाता में दो साल पहले इन रिक्शेवालों की ज़िंदगी पर एक फ़ोटो प्रदर्शनी ने सबका ध्यान इस पेशे की ओर खींचा था.
उस मौके पर जाने-माने अभिनेता ओम पुरी ने इस पेशे को जारी रखने की वकालत की थी.
मरहूम अभिनेता ओम पुरी ने तब ये कहा था कि हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शे कोलकाता की पहचान और इसके इतिहास का हिस्सा हैं. उनको मरने नहीं देना चाहिए.
ओम पुरी ने भी 'सिटी ऑफ़ जॉय' में एक रिक्शेवाले का किरदार निभाया था.
कोई छह साल पहले एक गैर-सरकारी संगठन ने इन रिक्शेवालों की एक रेस का आयोजन कर विजेताओं को सम्मानित किया था.
एक आम रिक्शेवाले का दिन सुबह चार बजे शुरू होता है.
एशिया की सबसे बड़ी मंडी बड़ा बाज़ार और न्यू मार्केट इलाके में माल की ढुलाई के बाद ये लोग बच्चों को उनके स्कूलों तक छोड़ते हैं.
लेकिन अब सरकारी उपेक्षा के चलते ये पेशा धीरे-धीरे लुप्त होने की कगार पर खड़ा है.
नए लोग इस पेशे में नहीं आ रहे हैं और पुराने लोगों पर उम्र हावी होती जा रही है.
ऐसे में कोलकाता की ये पहचान भविष्य में शायद तस्वीरों या संग्रहालयों में ही नज़र आएगी.
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