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योगी के गढ़ में अपनों ने ही दिया झटका?

गोरखपुर उपचुनाव
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गोरखपुर उपचुनाव

"जनता और कार्यकर्ता सर्वोपरि होते हैं. जब नेताओं का कार्यकर्ता के साथ सरोकार नहीं होगा तो मान के चलिए, ये सीट जानी ही थी."

गोरखनाथ मंदिर के बाहर लोकसभा उपचुनाव में बीजेपी की हार के बारे में बात करने पर एक बीजेपी कार्यकर्ता का दर्द कुछ इस तरह छलक आया.

ये सिर्फ़ एक कार्यकर्ता की तकलीफ नहीं बल्कि कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के चलते बीजेपी की हार की वजह बताने वाले लोगों की कमी नहीं थी. हालांकि हार के लिए लोग तमाम और कारण भी गिना रहे थे.

गोरखपुर में गोरखनाथ मंदिर न सिर्फ़ धार्मिक आस्था का केंद्र है बल्कि वर्षों से राजनीति का भी प्रमुख केंद्र रहा है. पिछले 29 साल से लोकसभा में गोरखपुर का प्रतिनिधित्व यहीं के महंतों ने किया है.

गोरखपुर में आम लोगों से बात करने पर ऐसा लगता है कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बन जाने से एक तो आम जनता से उनकी कुछ दूरी बढ़ गई दूसरे गोरखपुर में उनके प्रतिनिधियों से शायद जनता को वो सम्मान नहीं मिल पाया जिसकी वो अपेक्षा करते थे.

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उपेंद्र दत्त शुक्ल
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"अधिकारी कार्यकर्ताओं की बेइज़्ज़ती करते हैं"

उपचुनाव में बीजेपी के उम्मीदवार रहे उपेंद्र दत्त शुक्ल कार्यकर्ताओं की नाराज़गी की बात से तो इनकार करते हैं लेकिन मतदाता केंद्रों पर प्रबंधन ठीक से न हो पाने और उसी वजह से अपनी हार होने की बात खुलकर स्वीकार करते हैं. यहां तक कि मतदान के दौरान ख़ुद उन्हें मतदान अधिकारियों से उलझना पड़ा था.

दरअसल, कार्यकर्ताओं की सबसे ज़्यादा नाराज़गी जन प्रतिनिधियों की बजाय प्रशासनिक अधिकारियों से है. एक कार्यकर्ता ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर कहा, "अधिकारी खुले आम बीजेपी कार्यकर्ताओं की बेइज़्ज़ती करते हैं और नेताओं से शिकायत करने पर उल्टे हमें डांट मिलती है."

कार्यकर्ताओं का एक बड़ा आरोप ये भी है कि तमाम सरकारी काम-काज का लाभ भी वही लोग ले रहे हैं जो पिछली सरकार में ले रहे थे और बीजेपी कार्यकर्ता ख़ुद को ठगा महसूस कर रहे हैं. ये आरोप कोई नए नहीं हैं बल्कि राज्य में बीजेपी सरकार बनने के कुछ महीने बाद से ही कार्यकर्ताओं की ऐसी शिकायतें आनी शुरू हो गई थीं.

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गोरखपुर
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"हमारे बड़े नेता खुद क्या कर रहे हैं"

गोरखपुर में कुशीनगर के एक पार्टी पदाधिकारी मिले. बड़े दुखी मन से उन्होंने बताया, "छात्र जीवन से ही यानी पिछले बीस साल से बीजेपी में हूं. चुनाव के दौरान पार्टी के नेताओं के लिए कई बड़ी सभाएं कराई हैं हम लोगों ने. सरकार बनने के बाद कुछ हमारी भी अपेक्षाएं थीं, लेकिन हमारे बड़े नेता हमें तो ईमानदारी, शुचिता और पारदर्शिता की बात बताते हैं और ख़ुद क्या कर रहे हैं आप पता कर सकते हैं."

इनके साथ कुछ अन्य कार्यकर्ता भी थे और लगभग सबकी राय एक जैसी थी. दिनेश कुमार मिश्र नाम के एक व्यक्ति ने बताया कि वो भी भारतीय जनता पार्टी में हैं लेकिन बेहद उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. उनका कहना था, "कई अधिकारी तो ऐसे हैं जो कि विधायक तक को कुछ नहीं समझते. विधायक जन प्रतिनिधि भले ही हैं लेकिन अधिकारियों के ख़िलाफ़ आवाज़ इसलिए नहीं उठा सकते क्योंकि उन्हें कुछ 'बड़े' नेताओं का आशीर्वाद मिला है."

जानकारों का भी कहना है कि पार्टी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और उनकी अनदेखी ने उपचुनाव में बीजेपी को ज़मीनी स्तर पर कमज़ोर किया जिसका परिणाम हार के रूप में सामने आया.

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बूथ तक मतदाता नहीं पहुंचे

गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार सुजीत पांडेय कहते हैं, "बीजेपी को हराने में एक तो उनका अति आत्मविश्वास ज़िम्मेदार है, दूसरे लोगों की अपेक्षाएं भी बहुत ज़्यादा थीं लेकिन साल भर होने के बावजूद सरकार उम्मीदों पर कहीं खरी नहीं उतरी है. इन सबके अलावा मुख्यमंत्री जिस तरह से अधिकारियों को आदेश देते रहते हैं कि आपको किसी की बात नहीं सुननी है, अपना काम करिए, इससे अधिकारियों को जैसे बीजेपी कार्यकर्ताओं को अपमानित करने का लाइसेंस मिल गया. तो जब आप कार्यकर्ता को अपमानित कराओगे, तो कार्यकर्ता भी जो कर सकता है, वो करेगा. और आप देखिए कि न तो वो ख़ुद बूथ तक पहुंचा और न ही मतदाताओं को बूथ तक लाने में उसने दिलचस्पी दिखाई."

गोरखपुर मुख्यमंत्री का क्षेत्र है और बीजेपी के ज़्यादातर नेताओं और कार्यकर्ताओं के उनसे व्यक्तिगत संबंध भी हैं. गोरखपुर में पत्रकार नवनीत त्रिपाठी कहते हैं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने भी इन लोगों से कहीं न कहीं दूरी बना ली थी.

नवनीत त्रिपाठी कहते हैं, "कोई नेता या कार्यकर्ता योगी जी से मिलने लखनऊ जाता है तो उससे सीधे तौर पर पूछते हैं कि यहां क्यो आए, गोरखपुर में ही मिलो. और गोरखपुर में उनसे मिलना लखनऊ में मिलने से भी ज़्यादा मुश्किल है. दूसरे, जिस तरह से एक सांसद के तौर पर आम लोगों के काम यहां से होते थे, अब नहीं हो पा रहे हैं."

हालांकि जानकारों का कहना है कि कार्यकर्ताओं की ये नाराज़गी स्थाई नहीं है और अब पार्टी में उच्च पदों पर बैठे लोग भी शायद इसे समझ गए होंगे और इससे सबक लेंगे. पत्रकार सुजीत पांडेय के मुताबिक़ कार्यकर्ता पार्टी और सरकार को नुक़सान नहीं पहुंचाना चाहते थे बल्कि सिर्फ़ एक झटका देना चाहते थे, और झटका देने में क़ामयाब भी रहे.

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