यास्मीन ख़ान: ख़ुदा ने मेरे हर ज़ख़्म पर मरहम लगा दिया

Posted By: BBC Hindi
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यास्मीन ख़ान: ख़ुदा ने मेरे हर ज़ख़्म पर मरहम लगा दिया

''जब मै छोटी थी तो बहुत दब्बू लड़की थी. घर पर जब मेहमान आते थे तो मैं कमरे में छुप जाती थी. लेकिन अब मैं इस चेहरे के साथ भी घूमने से नहीं डरती.'' ये कहना है यास्मीन मंसूरी का.

यास्मीन एसिड अटैक सर्वाइवर हैं.

रविवार को उन्हें एक समारोह में सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्रालय की ओर से विकलांग श्रेणी में साल के सबसे बेहतरीन कर्मचारी के सम्मान से नवाज़ा गया.

उन्हें ये सम्मान खुद भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने दिया.

बीबीसी से ख़ास बातचीत में यास्मीन ने बताया, ''जब मैं स्टेज की तरफ़ बढ़ रही थी तो लग रहा था कि माउंट एवरेस्ट जीतने जा रही हूं. सोच रही थी आज ख़ुदा ने मेरे हर ज़ख़्म पर मरहम लगा दिया.''

जब एसिड अटैक पीड़िता के घर आई नन्ही परी

यास्मीन बताती हैं, ''16 साल की उम्र में मिले ये ज़ख्म अब धीरे-धीरे भर चुके हैं लेकिन आज भी जब सूरज की रोशनी पड़ते ही चमड़ी जलने लगती है तो घाव हरा हो जाता है. अचानक से दिखना बंद हो जाता है. कभी-कभी डर लगता है कि कहीं गिर गई तो...?"

आज भी नहीं पता किसने और क्यों किया हमला ?

यास्मीन बताती हैं ''तब मैं और मेरा परिवार उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर शामली में रहते थे. मैंने पांचवी के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी. मेरे अम्मी-अब्बू का कहना था कि चिट्ठी लिखने तो आ गया है, अब पढ़कर क्या करना...मैंने भी कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखाई. मैं घर पर ही रहती थी और 20 रुपये में सलवार सिला करती थी.''

हादसे वाली रात का ज़िक्र करते हुए उनके चेहरे पर न तो गुस्सा था और न ही कोई दूसरा भाव.

वो कहती हैं कि उन्हें नहीं मालूम की एसिड फेंकने वाले लोग कौन थे और उन्होंने ऐसा क्यों किया. इस हमले में यास्मीन की छोटी बहन भी ज़ख्मी हुई थीं.

इस अटैक में यास्मीन का शरीर 65 फ़ीसदी जल गया था. गर्दन की चमड़ी खिंच गई थी और आंखें खुलनी बंद हो गईं थीं. इसके बाद उनके परिवार वाले उन्हें दिल्ली के सफ़दरजंग ले आए जहां उनका इलाज शुरू हुआ.

अब तक उनकी 20 सर्जरी हो चुकी हैं.

टेंशन एग्ज़ाम की नहीं, चेहरा छिपाने की होती थी

यास्मीन बताती हैं कि अस्पताल में लेटे-लेटे न तो दिन का पता चलता था और न रात का.

''आंखें तो नहीं खुलती थीं लेकिन दिमाग़ में कई तरह के ख़्याल आते थे. बिस्तर पर लेटे-लेटे ही एक दिन फ़ैसला किया कि आगे पढ़ाई करनी है. घरवालों को राज़ी भी कर लिया.''

पर चुनौती ये नहीं थी.

यास्मीन ने 10वीं और 12वीं की पढ़ाई ओपन स्कूल से की लेकिन परीक्षा तो देने जाना ही था. वो कहती हैं कि एग्ज़ाम की टेंशन कम होती थी, सबसे बड़ी टेंशन ये होती थी कि कहीं चेहरे से दुपट्टा न सरक जाए.

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उन्होंने बताया कि चेहरा दिख जाने का डर इस कदर था कि परीक्षा वाले दिन वो दिनभर पानी नहीं पीती थीं.

मैं अपनी ज़िदगी यूं ही बर्बाद नहीं कर सकती

यास्मीन बताती हैं कि अस्पताल में बहुत तरह की नर्सें आती थीं. कुछ बहुत अच्छी होती थीं तो कुछ... उनको देखकर ही फ़ैसला किया कि मुझे भी लोगों की सेवा करनी है.

इसके बाद यास्मीन ने जामिया से नर्सिंग की पढ़ाई की. हालांकि पहली कोशिश में वो फ़ेल भी हुईं लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. अगली कोशिश में कामयाबी उनके साथ खड़ी थी.

आज वो राजधानी दिल्ली के एक अस्पताल में बतौर नर्स काम करती हैं. उनके साथ काम करने वाले अश्विनी ने बीबीसी को बताया कि यास्मीन की सबसे अच्छी बात है कि वो बहुत मेहनती हैं. समय पर आती हैं और हर मरीज़ को ऐसे देखती हैं जैसे उनके घर का हो.

मेकअप करने का है शौक़ लेकिन...

एक सवाल के जवाब में यास्मीन ने कहा कि मुझे अब याद भी नहीं है कि मैं एसिड अटैक से पहले कैसी दिखती थी. मुझे अपने इस चेहरे से बेपनाह मोहब्बत है. मेरे चेहरे पर जो ज़ख़्म हैं वो मेरी मज़बूती दिखाते हैं और अब यही मेरी पहचान हैं.

'उसे मेरे तेज़ाब से झुलसे चेहरे से प्यार हो गया...'

यास्मीन बताती हैं ''मुझे मेकअप करना बहुत अच्छा लगता है. मैंने मेकअप करना सीखा भी है लेकिन इसकी एक बहुत बड़ी वजह सोसाइटी भी है.''

वो बताती हैं ''चेहरे पर ज़ख़्म तो हैं ही. तो लोग अब भी मेरे चेहरे को देखकर सवाल करने लगते हैं. उन्हें कहानी जानने का मन करता है. लोगों की नजरें मेरे ज़ख़्मों को देखकर कहानी न गढ़ें इसके लिए मैंने अंबिका पिल्लई से मेकअप सीखा. फेस री-कंस्ट्रक्शन मेकअप ताकि लोगों के सवाल से बच सकूं. ''

मां नहीं होती तो शायद मैं खो जाती...

यास्मीन कहती हैं कि इस पूरे सफ़र में जहां हौसला तोड़ने वाले मिले वहीं कुछ लोग हमेशा साथ रहे. ख़ासतौर पर परिवार.

उन्होंने बताया कि अगर आज मैं दिल्ली के अच्छे अस्पताल में काम कर रही हूं, अपने पैरों पर खड़ी हूं तो इसके पीछे अम्मी का सबसे बड़ा हाथ है.

रविवार के समारोह का ज़िक्र करते हुए वो बताती हैं कि जिस दिन उन्हें सम्मानित किया गया, उनकी अम्मी और पूरी परिवार उनके साथ था. मौक़ा खुशी का था लेकिन सबकी आंखें नम थीं.

अभी बहुत कुछ करना बाक़ी है...

यास्मीन कहती हैं ''अभी बहुत करना है. ख़ासतौर पर अपने जैसे लोगों के लिए. जो किसी न किसी तरह से विकलांग हैं.'' वो एसिड अटैक के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ना चाहती हैं ताकि जो कुछ उन्होंने सहा, उनके परिवार ने सहा कोई और न सहे.

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English summary
Yasmeen Khan God paused all my wounds
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