Womens Day: भावनाओं को उनकी मंजिल तक पहुंचाने का काम करती हैं ओडिशा की ये 'पोस्ट वूमेन'
Womens Day: एक साधारण सा व्यक्ति खाकी कपड़े पहने और कंधे पर चिठ्ठियों से भरा झोला..! डाकिया का नाम लेते ही जेहन में जो चित्र उभरता है वो कुछ इस तरह का होता है। लेकिन क्या आपने कभी महिला डाकिया को देखा है?
अब आप सोच रहे होंगे कि इस डिजिटल जमाने में चिट्ठियां ही नजर नहीं आती तो ये महिला पोस्ट वूमेन कहां से दिखेंगी! चलिए आज की इस कहानी में आपको एक ऐसी पोस्ट वुमेन से परिचय कराएंगे जो लोगों की भावनाओं का संदेश पहुंचाती हैं।

Women's Day: रुढ़िवादिता को तोड़ बनी 'डाक वुमेन'
ओडिशा के ढेकानाल जिले में एक गांव है खूंटी...यहां की रहने वाली बिजय लक्ष्मी पेशे से एक पोस्ट वुमेन हैं घर-घर लोगों का लेटर पहुंचाती हैं। 24 साल की बिजय के लिए ये काम इतना आसान भी नहीं था, उनके मन में इस बात का डर था कि लोग क्या सोचेंगे? कैसे रिएक्ट करेंगे?
शिक्षक बनने की चाह रखने वाली बिजय ने डाक विभाग के इस पद के लिए अप्लाई किया और 2019 में पोस्ट वुमेन के पद पर चयन हुआ। डाक विभाग में काम करते हुए इनको पांच साल हो गए हैं और इनको अब अपने काम में मजा आने लगा है। बिजय कहती हैं, पहली बार गांव में पोस्ट बांटने जाते वक्त मन में एक अजीब सी बेचैनी थी, लोग क्या सोचेंगे? उनकी कैसी प्रतिक्रिया रहेगी? सारे सवाल मन में परेशान कर रहे थें लेकिन समय के साथ अब ये सामान्य हो गया है।
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Women's Day: संघर्ष कर बनी पोस्ट वुमेन
बिजय सरकारी नौकरी करना चाहती थीं लेकिन पढ़ाई के दौरान ही पिता की अचानक मौत ने इनके उपर घर की कई जिम्मेदारियां डाल दी। पिता की किराने की दुकान बंद हो गई। वो कहती हैं, पढ़ाई के दौरान मैं सुबह 6 बजे से बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया करती थी उसेक बाद कॉलेज के लिए जाती थी। इसके साथ ही उन्होंने अपने छोटे भाई की पढ़ाई-लिखाई का भी सारा खर्चा इन्होंने ही संभाला।
बिजय सामाजिक रुढ़िवादिताओं को किनारे कार इस पुरुष प्रधान कार्य में अपना बेहतर योगदान दे रही हैं।
वो कहती हैं कि भले ही अब चिट्ठियों का जमाना नहीं रहा और इनकी जगह सरकारी कागजों ने ली हो लेकिन मुझे अपना काम पसंद है और मैं इसे पूरी लग्न के साथ करती हूं। धूप, बारिश, गर्मी और सर्दी हर मौसम, हर परिस्थिती मैं काम जारी रहता है और मैं ऐसे ही पोस्ट बांटने का काम करती रहूंगी।
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