Women's Day: नारी शक्ति को नमन, जानिए अहिल्या बाई होल्कर को जिसने काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण किया
Women's Day: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस से पहले हम आपके लिये रोज एक नई प्रेरणादायक कहानी लेकर आ रहे हैं। जिसको पढ़कर आप समझ पाएंगे कि भारतीय महिलाओं ने हर युग में समाज के लिए, अपने राष्ट्र के लिए, धर्म के लिए सबकुछ त्याग कर अपने आप को समर्पित कर दिया। 8 मार्च को पूरी दुनिया विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की उपलब्धियों का जश्न मनाने के साथ-साथ लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों के लिए जारी संघर्ष को उजागर करने के लिए एकजुट होती है। लेकिन भारत की महिलाओं ने हर युग में अपने आप को सिद्ध किया है कि उनका कर्तव्य भी समाज के प्रति है।
भारत देश में प्राचीन काल से ही महिलाओं को वो अधिकार प्राप्त थे जिसकी वो हकदार है अगर किसी कारण किसी समय में समाज ने उन्हें अनदेखा करने की कोशिश की तो नारी शक्ति ने अपने काबिलियत से ये बता दिया कि हम किसी से कम नहीं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में लक्ष्मीबाई के तलवार की खनक हो या हंसा मेहता द्वारा दिया गया ओजस्वी भाषण हर समय महिलाओं ने आगे आकर नेतृत्व किया है।

अहिल्या बाई होल्कर का भारतीय इतिहास में अहम योगदान
ऐसे ही भारत की महान रानी अहिल्या बाई होल्कर की जीवनी है जिसने भारत के इतिहास को अपने व्यक्तित्व के प्रभा से चमका दिया। आज के पीढ़ी को उच्च व्यक्तित्व के धनी महान रानी अहिल्या बाई होल्कर के बारे में जरुर जानना चाहिए। जिनके सम्मान में महाराष्ट्र सरकार ने अहमदनगर का नाम बदलकर 'अहिल्या नगर' रखा है।
अहिल्या बाई होल्कर ने समाज, देश, धर्म और नारी सशक्तिकरण के लिये बहुत कुछ किया है। भारतीय इतिहास में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। महारानी अहिल्याबाई होलकर का जन्म 31 मई, 1725 को हुआ था। उनके पिता मानकोजी शिंदे एक मामूली किसान थे। वो प्रसिद्ध सूबेदार मल्हारराव होलकर के पुत्र खंडेराव की पत्नी थीं। 1766 में अहिल्या के ससुर मल्हार राव का निधन हो गया। उसके अगले ही वर्ष, उन्होंने अपने बेटे माले राव को भी खो दिया। बेटे को खोने का दुःख उन्होंने अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया और एक कुशल प्रशासक के तौर पर अपने राज्य के शासन व्यवस्था को संभाला।
अहिल्या बाई होल्कर ने राज्य में कई किले, सड़कें, कुएँ और विश्राम गृह बनवाई। उन्होंने महेश्वर को अपनी राजधानी बनाई। माहेश्वर का शाब्दिक अर्थ होता है "भगवान शिव का निवास" इस दौरान कई शिल्पकारों, कलाकारों और मूर्तिकारों को रोजगार मिला। उन्होंने अपने राज्य के बाहर के क्षेत्रों में भी धार्मिक स्मारकों का संरक्षण किया।
महेश्वरी साड़ियां पूरे भारत में प्रसिद्ध है
वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर , जिसे मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर ध्वस्त कर दिया गया था उसका पुनर्निर्माण का कार्य, औरंगाबाद के पास ग्रिशनेश्वर मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य अहिल्या बाई ने किया। उन्होंने महेश्वर में एक कपड़ा उद्योग की स्थापना की थी। माहेश्वर की महेश्वरी साड़ियां आज भी बुनी जाती है।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने अपनी किताब डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया में अहिल्या बाई होल्कर को "एक उल्लेखनीय महिला" बताया है। 2002 में अरविंद जावलेकर ने उनके जीवन पर एक किताब लिखी जिसका नाम "अहिल्याबाई, मदर ऑफ़ द पीपल" है। इन किताबों में उनके महान कार्य का उल्लेख मिलता है। वो एक कुशल शासक थी।
1780 में प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर की मरम्मत की
अहिल्या बाई होल्कर आम आदमी की समस्याओं के समाधान निकालने के लिए प्रतिदिन जन-सुनवाई किया करती थीं। उन्होंने समाज के लिए विभिन्न परोपकार के कार्य किए। जिनमे उत्तर भारत में मंदिरों, घाटों, कुओं, तालाबों और विश्राम गृहों के निर्माण तो दक्षिण भारत में तीर्थ स्थलों का निर्माण शामिल था। उनके सबसे प्रसिद्ध कार्यों में से एक था।
1780 में, प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर की मरम्मत और उसका नवीनीकरण कराना। महरानी का निधन 70 वर्ष की आयु में 13 अगस्त 1795 को हुआ था। उनके द्वारा बनवाए गए विभिन्न मंदिर, धर्मशालाएँ और किए गए सार्वजनिक कार्य, रानी की महानता की गवाही देते हैं।












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