क्या प्रशांत किशोर संन्यास लेंगे ? तो फिर करेंगे क्या ?

नई दिल्ली, मई 1: ममता बनर्जी के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर क्या शर्त हारने वाले हैं ? पश्चिम बंगाल के एग्जिट पोल के दो संकेतों के मुताबिक भाजपा को 100 से अधिक सीटें मिलती दिख रही हैं। चुनाव से पहले प्रशांत किशोर ने शर्त लगायी थी कि अगर भाजपा दो अंकों का आकंड़ा (99) पार कर लेती है तो वे चुनावी रणनीति बनाने के काम छोड़ देंगे। अगर एग्जिट पोल के संकेत नतीजों में बदलते हैं तो क्या प्रशांत किशोर अपनी जुबान पर कायम रह पाएंगे ? अगर उनकी कंपनी आइ-पैक पैक हो जाएगी तो क्या पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के मंसूबे पर पानी फिर जाएगा। ? पश्चिम बंगाल के बाद प्रशांत किशोर पंजाब में ही डेरा डालने वाले थे। यदि वे पश्चिम बंगाल में फेल होते हैं तो इसका असर राज्य की राजनीति पर भी पड़ेगा। ममता बनर्जी ने प्रशांत किशोर को जो राजनीतिक महत्व दिया था उससे तृणमूल कांग्रेस में बड़ा विद्रोह हुआ था। तृणमूल के बागियों ने भाजपा को इतना मजबूत कर दिया कि अब पश्चिम बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य बदलने के कगार पर है। प्रशांत किशोर अपने काम से संन्यास लें या न लें, लेकिन उनकी ब्रांड वैल्यू जरूर कम हो जाएगी।

100 के पार जाएगी भाजपा ?

100 के पार जाएगी भाजपा ?

एबीपी-सी वोटर्स के एग्जिट पोल के मुताबिक भाजपा को पश्चिम बंगाल में 109 से 121 सीटों मिल सकती हैं। रिपब्लिक टीवी-सीएनएक्स के सर्वे में भाजपा को 138 से 148 सीटें मिलती हुई दिखायी गयीं हैं। इन दो सर्वे के आधार पर ही प्रशांत किशोर के राजनीतिक और व्यवसायिक भविष्य पर सवाल उठाया जा रहा है। हालांकि प्रशांत किशोर इस अनुमान से इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि पहले चार चरण की वोटिंग उन इलाकों में हुई थी जिनको भाजपा प्रभावित क्षेत्र कहा जा रहा है। ऐसा लोकसभा चुनाव के आधार पर कहा जा रहा था। लेकिन चार चरण में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में कांटे की टक्कर हुई है। इस लड़ाई में जीत तृणमूल की होगी भले मार्जिन कम हो जाए। अब प्रशांत किशोर का कहना है कि चुनाव से पहले किसको कितनी सीट मिलेगी, यह बताना बहुत कठिन है। लेकिन भाजपा के प्रोपेगेंडा को काटने के लिए मुझे यह बात कहनी पड़ी कि भाजपा डबल डिजिट क्रॉस नहीं करेगी। दरअसल चुनाव से पहले ही गृहमंत्री अमित शाह ने कहना शुरू कर दिया था कि भाजपा विधानसभा चुनाव में 200 से अधिक सीटें जीतने वाली है। अमित शाह के इस प्रचार से तृणमूल समर्थकों का आत्मबल प्रभावित हो रहा था। तब प्रशांत किशोर इसके काउंटर में डबल डिजिट थ्योरी का पत्ता फेंका। चार चरण के चुनाव के बाद उन्होंने फिर दावा किया था कि भाजपा 99 का आंकड़ा पार नहीं करने वाली।

रहूंगा तो नम्बर वन वर्ना नहीं

रहूंगा तो नम्बर वन वर्ना नहीं

प्रशांत किशोर को आखिर यह जुआ खेलने की जरूरत क्यों पड़ी ? प्रशांत किशोर का कहना है, जो भी काम करो, सर्वश्रेष्ठ बन कर करो। अगर मैं स्किल, मेथोडोलॉजी और फैक्ट के इस्तेमाल के बाद भी जीत न दिला सकूं तो मुझे नैतिक रूप से यह काम नहीं करना चाहिए। ऐसा भी नहीं है कि मुझे जीवन भर यही काम करना है, कोई दूसरा काम नहीं करना है। मेरे बाद भी यह काम होता रहेगा। मैंने अपने सहयोगियों से इन सारी संभावनाओं के बारे में पहले से बता दिया है। अगर मुझे यह महसूस हुआ कि मैं इस काम में नम्बर वन नहीं हूं तो मुझे यह काम छोड़ने में कोई दिक्कत नहीं है। मैं दूसरे के लिए जगह खाली कर दूंगा। अगर आप किसी को चुनाव नहीं जीता सकते तो इस काम में बने रहने का कोई मतलब नहीं है। हालांकि प्रशांत किशोर यह भी कहते हैं कि किसी दल की चुनावी जीत केवल रणनीति पर निर्भर नहीं होती। दल के नेता का काम और नाम बहुत मायने रखता है। हमारी भूमिका तो चुनावी परिस्थितियों को किसी दल के अनुरूप बनाना होता है। तो क्या भाजपा की हवा बिगाड़ने के लिए ही प्रशांत किशोर ने रणनीतिकार का काम छोड़ने की शर्त लगायी है ?

प्रशांत किशोर राजनीति में आएंगे

प्रशांत किशोर राजनीति में आएंगे

अगर शर्त हारने के बाद प्रशांत किशोर अपना काम छोड़ देते हैं तो क्या करेंगे ? तो इसका जवाब है, वे राजनीति में आएंगे। कब आएंगे ये तय नहीं है। कैसे आएंगे, यह भी तय नहीं है। लेकिन राजनीति में आएंगे, ये बिल्कुल पक्का है। राजानीति में आने का पहला प्रयास उनका सफल नहीं रहा था। वे बिहार में सत्तारूढ़ दल जदयू के उपाध्यक्ष थे। नीतीश कुमार के बाद उन्हीं का ओहदा था। नीतीश कुमार ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी बना दिया था। यह कोई मामूली मौका नहीं था। किसी विरले को ही ऐसा मौका मिलता है। लेकिन किस्मत की मेहरबानी भी उनकी राजनीतिक पारी को जमा नहीं सकी। कुछ कदम चलने के बाद ही उन्होंने रास्ता बदल लिया। वे इस सच को स्वीकार करते भी हैं। पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान उन्होंने कहा था, राजनीति में आने की पहली कोशिश में वे नाकाम रहे थे। लेकिन अब मैं बेहतर समझ और बेहतर तैयारी के साथ राजनीति में आऊंगा। मैं नाकामियों से डरता नहीं हूं। मैं अपने लक्ष्य को पाने के बार-बार कोशिश करूंगा। मैं चाहे जिस रूप में राजनीति करूं, उसकी केन्द्र में बिहार रहेगा। मैनें ऐसा पहले भी कहा था, आज भी कह रहा हूं। यानी प्रशांत किशोर के मन में अब भी नेता बनने की तमन्ना हिलोरें मार रही हैं।

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