क्या मोदी का दोबारा पीएम बनना पाकिस्तान के हक़ में होगा

नरेंद्र मोदी
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पिछले हफ़्ते पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने रिपोर्टरों से बातचीत करते हुए कहा था कि अगर बीजेपी फिर से चुनाव जीत जाती है तो 'शांति वार्ता की संभावनाएं' ज़्यादा रहेंगी.

इमरान ख़ान का तर्क है कि हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी की तुलना में विपक्षी पार्टी कांग्रेस कश्मीर मसले पर बात करने में डरी रहती है.

हालांकि, इमरान ख़ान के इस बयान को कई तरह से देखा गया. बीजेपी अक्सर कांग्रेस पर पाकिस्तान की भाषा बोलने का आरोप लगाती है लेकिन इमरान ख़ान के बयान से कांग्रेस को भी मौक़ा मिल गया और उसने कहना शुरू कर दिया कि बीजेपी का पाकिस्तान के साथ गठजोड़ है.

एक तर्क ये भी दिया जा रहा है कि असल में पाकिस्तानी पीएम ने ऐसा कहकर भारत की विपक्षी पार्टियों की मदद की है. लेकिन इमरान ख़ान ने जो कहा है, उसमें कितनी सच्चाई है और उसका क्या मतलब है? सवाल है कि क्या इमरान ख़ान वाक़ई चाहते हैं कि मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बनें?

पाकिस्तान एक इस्लामिक देश है और भारत सेक्युलर देश. दूसरी तरफ़ भारत के भीतर एक तबके को लगता है कि बीजेपी ने देश की धर्मनिरपेक्षता को कमज़ोर किया है. ऐसे में इमरान ख़ान क्या केवल शांतिवार्ता की संभावनाओं के कारण मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं?

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पाकिस्तान के इतिहासकार मुबारक़ अली का मानना है कि उनके मुल्क की सियासी पार्टियों और जिहादी धड़ों को भारत में हिन्दूवादी पार्टी बीजेपी का सत्ता में रहना रास आना कोई चौंकाने वाला नहीं है.

मुबारक़ अली कहते हैं कि हिन्दुस्तान में हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी के मज़बूत होने से यहां की सियासी पार्टियों और जिहादी धड़ों को खाद-पानी मिलता है.

मुबारक अली कहते हैं, ''पाकिस्तान और भारत दोनों में अतिवादी हैं. पाकिस्तान में एक आम धारणा है कि दो अतिवादी मिलकर कोई सही फ़ैसला कर सकते हैं. पाकिस्तान को लगता है कि हिन्दु्स्तान में कोई अतिवादी शासक होगा तो वो लोकतांत्रिक मूल्यों को धक्का दे सकता है, अवाम की राय का उल्लंघन कर सकता है और अपनी सोच को थोप सकता है. पाकिस्तान में ज़्यादातर पार्टियां अतिवादी हैं और एंटी इंडिया भावना के लिए बीजेपी का सत्ता में रहना उन्हें भाता है. भारत में जब भी अतिवादी पार्टी सत्ता में आती है तो इससे पाकिस्तान को सपोर्ट मिलता है.''

ये भी सच है कि बीजेपी ने सत्ता में रहने के दौरान कश्मीर पर बातचीत के लिए मज़बूत पहल की है जो कि कांग्रेस नहीं कर पाई. जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गठबंधन की सरकार थी, तब भी वो बस से पाकिस्तान पहुंच गए थे.

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वाजपेयी के बाद दस सालों तक कांग्रेस की सरकार रही लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कभी पाकिस्तान नहीं गए. दूसरी तरफ़ मोदी के पीएम बने एक साल भी नहीं हुआ था कि वो बिना किसी घोषणा के पाकिस्तान पहुंच गए थे.

भावनाओं का ध्रुवीकरण

कश्मीर को लेकर दोनों देशों में भावनाओं का ध्रुवीकरण काफ़ी मज़बूत है. दोनों देशों की सियासी पार्टियों के लिए यह ध्रुवीकरण फ़ायदे के लिए होता है.

कई लोग इस बात को भी मानते हैं कि भारत में बीजेपी सत्ता में होती है तो पाकिस्तान को मुख्यधारा की राजनीति में जिहादी समूहों की सक्रियता को सही ठहराने में मदद मिलती है.

मुबारक़ अली कहते हैं, ''भारत में बीजेपी के शासन में अगर मुसलमानों के ख़िलाफ़ कुछ होता है तो पाकिस्तान में एक आम सोच ये बनती है कि जिन्ना ने मुसलमानों के लिए अलग देश पाकिस्तान बनाकर बिल्कुल सही किया था. लोग कहना शुरू कर देते हैं कि अगर पाकिस्तान नहीं बनता तो सभी मुसलमानों के साथ यही होता. पाकिस्तान में सियासी पार्टियों को एक मज़बूत तर्क मिल जाता है. जिहादी संगठन भी कहना शुरू कर देते हैं कि धर्म के आधार पर भारत का बँटना कितना ज़रूरी था.''

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मुबारक़ अली कहते हैं कि पाकिस्तान में जब हिन्दुओं पर अत्याचार होता है तो यह बीजेपी को रास आता है क्योंकि इसके आधार पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिन्दुओं को लामबंद करने का हथियार मिल जाता है.

वो कहते हैं, ''पाकिस्तान में हिन्दू बहुत कम संख्या में बचे हैं. जो हैं भी, वो दीन-हीन स्थिति में हैं. पाकिस्तान की सियासी पार्टियों को हिन्दुओं का डर दिखाकर पाकिस्तान में मुसलमानों को लामबंद करने का आधार नहीं मिल पाता है. ऐसे में पाकिस्तान की सियासी पार्टियां भारत में मुसलमानों के ख़िलाफ़ होने वाले वाक़यों का इस्तेमाल करती हैं. जिहादी ग्रुपों को भी एक बहाना मिल जाता है कि भारत के मुसलमान कितने संकट में हैं.''

क्या कहना है बीजेपी का

क्या बीजेपी के सत्ता में होने से पाकिस्तान के जिहादी समूहों को प्रासंगिकता मिलती है? इस सवाल के जवाब में बीजेपी नेता शेषाद्री चारी कहते हैं, ''पाकिस्तान अपने देश के मुसलमानों की चिंता करे. हिन्दुओं की सुरक्षा की उम्मीद तो इनसे नहीं ही कर सकते. मोदी दोबारा प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के चाहने से नहीं बनेंगे. मोदी को प्रधानमंत्री यहां की जनता बनाएगी.''

लेकिन भारत में किसी मुसलमान को गोमांस के नाम पर पीट-पीट कर मार दिया जाता है और समझौता ट्रेन ब्लास्ट में किसी को सज़ा नहीं मिलती है तो क्या इन चीज़ों का इस्तेमाल पाकिस्तानी जिहादी समूह अपनी प्रासंगकिता साबित करने में नहीं करते हैं?

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इस पर शेषाद्री चारी कहते हैं, ''भारत के मुसलमान बहुत ख़ुश हैं. भारत के मुसलमानों को लेकर पाकिस्तान अपने यहां बातें करता है तो यह बिल्कुल ग़लत है. समझौता ब्लास्ट में कोर्ट ने निर्णय दिया है और हमें यह स्वीकार है. पिछली सरकार ने लोगों पर फ़र्ज़ी मुक़दमे कराए थे. पाकिस्तान अपने बारे में सोचे तो ज़्यादा ठीक रहेगा. पाकिस्तान में हिन्दू तो छोड़ ही दीजिए, मुसलमानों में शिया और अहमदिया तक सुरक्षित नहीं हैं.''

मुबारक़ अली कहते हैं कि दोनों मुल्कों में अतिवाद को समर्थन देने वाले लोगों को खाद-पानी अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ होने वाले अन्याय से ही मिलते हैं.

वो कहते हैं, ''पाकिस्तान में भारत विरोधी भावना के लिए भारत में मुसलमान विरोधी सरकार का होना बहुत ज़रूरी है. और पाकिस्तान में भारत विरोधी भावना यहां की सियासी पार्टियों के लिए काफ़ी उपयोगी है. उसी तरह भारत में पाकिस्तान विरोधी भावना को यहां के हिन्दुओं पर अत्याचार से हवा मिलती है. मतलब दोनों देशों के अतिवादी संगठनों के लिए दोनों देशों में अल्पसंख्यकों के साथ अत्याचार होना उनके हक़ में होता है.''

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