यूपी: भाजपा से नाराज ब्राह्मण अब किसमें तलाशेगा अपना नया विकल्प ?
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनावों में अभी एक साल से अधिक का वक्त है लेकिन यूपी की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। 2017 के विधानसभा और फिर 2019 के लोकसभा में प्रचंड जीत के बाद ठंडे पड़े राजनीतिक दलों की सुगबुगाहट फिर से तेज हो गई है।
तीन दशक से मंडल और कमंडल की राजनीति की प्रयोगशाला रहे प्रदेश में इस बार ब्राह्मण ध्रुवीकरण करने की कोशिश हो रही है। जाति बनाम धर्म की राजनीति में इस बार सबकी नजर ब्राह्मण वोटर पर है। ब्राह्मणों की लुभाने की राजनीति का ही नतीजा है कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने परशुराम की प्रतिमा बनाने का ऐलान किया तो बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी परशुराम के सम्मान को बढ़ाने का वादा कर दिया। कांग्रेस पहले ही राज्य में ब्राह्मणों पर अत्याचार का आरोप लगा चुकी है। यानि हर कोई ब्राह्मणों का हितैषी बनने की कोशिश में है। राज्य की राजनीति में ब्राह्मण आखिर इतने महत्वपूर्ण कैसे हो गए इस पर एक नजर डालते हैं।

प्रदेश में ब्राह्मण कार्ड की राजनीति जोर पर
कानपुर के बिकरू कांड में आठ पुलिस कर्मियों की हत्या के आरोपित विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद राज्य में ब्राह्मण कार्ड को गरमाने की राजनीति ने जोर पकड़ लिया। विकास दुबे और उसके साथियों से यूपी पुलिस जिस तरह निपटी उससे उपजी भावना को भुनाने की कोशिश में विपक्ष ने प्रदेश की योगी सरकार पर ब्राह्मणों के उत्पीड़न का आरोप लगाया। इसमें कांग्रेस के जितिन प्रसाद और कल्कि पीठाधीश्वर प्रमोद कृष्णम आगे रहे।
जितिन प्रसाद ने तो ब्राह्मण चेतना परिषद का गठन भी किया है जिसके वे अध्यक्ष हैं। जितिन प्रसाद ने परिषद की ओर से राज्य के ब्राह्मण नेताओं बुद्धिजीवियों, पूर्व व्यवसायियों आदि के नाम पत्र लिखकर ब्राह्मण हितों के लिए संरक्षित होने का आरोप लगाया। बसपा नेता मायावती ने भी ट्वीट कर यूपी सरकार को ब्राह्मण समाज को भयभीत न करने को कह दिया। अखिलेश यादव ने सपा सरकार आने पर परशुराम की भव्य प्रतिमा बनाने का ऐलान कर दिया।

प्रदेश के चुनावी गणित में ब्राह्मण कहां ?
दरअसल प्रदेश की 20 करोड़ की जनसंख्या में ब्राह्मणों की आबादी 12 प्रतिशत है। लेकिन बात केवल संख्या की नहीं है, ब्राह्मण समाज वोट बैंक के साथ समाज में वोटिंग पैटर्न को बदलने की क्षमता है। 2017 के विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण समाज ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया था। जल्द ही ब्राह्मण समाज में ये असंतोष उभरने लगा कि सत्ताधारी पार्टी में ब्राह्मणों का उतना महत्व नहीं है जितना ठाकुरों का है। हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में ब्राह्मणों ने एक बार फिर भाजपा के पक्ष में ही मतदान किया। लेकिन कानपुर में विकास दुबे और उसके साथियों के हत्याकांड ने इस नाराजगी को तेज कर दिया है। यही वजह है कि सभी पार्टियां ब्राह्मणों को अपनी तरफ लुभाने में लगी हैं।
सीएसडीएस के सर्वे के मुताबिक 80 प्रतिशत ब्राह्मण मतदाताओं ने 2017 में भाजपा को वोट दिया था। इसी तरह 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को 72 जबकि 2019 में ब्राह्मण समाज के 82 प्रतिशत वोट मिले थे। जाटव और यादव के साथ ब्राह्मण समुदाय प्रदेश का सबसे बड़ा वोट बैंक है। समुदाय का पूर्व उत्तर प्रदेश के कुशीनगर, गोरखपुर, संत कबीर नगर, देवरिया, भदोही, वाराणसी, सुलतानपुर, अंबेडकर नगर आदि जिलों में काफी प्रभाव है और यहां ये वोटिंग पैटर्न को प्रभावित करते हैं।

आखिर क्यों नाराज हैं ब्राह्मण ?
पिछले चुनाव में भाजपा को एकतरफा वोट करने वाला ब्राह्मण समुदाय भाजपा से नाराज क्यों है। ब्राह्मण बुद्धिजीवियों का आरोप है कि एकतरफा समर्थन के बावजूद सरकार में ब्राह्मणों को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से किनारे कर दिया गया है। कोरोना लॉकडाउन के बाद जब सरकार ने अनलॉक प्रक्रिया शुरू की तो मॉल को तो खोल दिया गया लेकिन अभी भी मंदिर बंद हैं। इससे ब्राह्मण समाज काफी दुखी है क्योंकि ये उनकी आजीविका का प्रमुख साधन है। वरिष्ठ पत्रकार मनोज त्रिपाठी कहते हैं कि ब्राह्मण समुदाय ने जिस तरह से भाजपा को वोट दिया उस तरह से उसे सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिली है।
बीजेपी ने ब्राह्मण नेता की जगह एक ठाकुर नेता योगी आदित्यनाथ को क्यों प्रदेश के सीएम पद के लिए चुना ? इस सवाल पर यूपी की राजनीति के जानकार और पूर्व सीएम हेमवती नंदवती बहुगुणा के सलाहकार रहे पद्म नारायण झा 'विरंची' कहते हैं कि 2017 का चुनाव योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में नहीं लड़ा गया था। ये मोदी लहर की जीत थी। इस जीत में हिंदुत्व फैक्टर सबसे हावी था। ऐसे में सीएम योगी इस छवि में सही फिट बैठते थे। वहीं उनके मठ की छवि भी उन्हें इस पद के लिए उपयुक्त बनाती है।

नाराजगी से विपक्ष को कितना फायदा ?
क्या इस नाराजगी के बीच विपक्षी पार्टियां ब्राह्मण समुदाय में अपनी जगह बना पाएंगी। खास तौर पर जब मायावती और अखिलेश दोनों ने 2022 में सरकार में आने पर भगवान परशुराम की भव्य प्रतिमा बनाने का ऐलान कर दिया है। कांग्रेस पहले ही ब्राह्मण चेतना परिषद बनाकर ब्राह्मणों के हक में अपना समर्थन जता चुकी है। इस सवाल पर विरंची कहते हैं कि सपा और बसपा दोनों के वादे खोखले हैं। क्या ये पार्टियां पहले सत्ता में नहीं थीं। असल में कोई भी ब्राह्मणों को नेतृत्व देने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि ये पिछड़ा की राजनीति के अंत की तरह होगा।
वहीं ब्राह्मणों के दूसरे विकल्प आजमाने को लेकर प्रयागराज के जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में प्रोफेसर बदरीनारायण कहते हैं कि 'ब्राह्मण मतदाता रातोंरात कहीं और चले जाएंगे ऐसा सोचना गलत है। प्रदेश ने बीजेपी को दिग्गज ब्राह्मण नेता दिए हैं। इनमें अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी, केशरीनाथ त्रिपाठी, कलराज मिश्र आदि प्रमुख नाम हैं।' प्रोफेसर नारायण कहते हैं 'वैसे तो ब्राह्मण आसानी से भाजपा का साथ नहीं छोड़ेंगे लेकिन ऐसा होता भी तो है बसपा और कांग्रेस को सपा और भाजपा की तुलना में अधिक फायदा होगा।'

अधिक टिकट भी खींच सकता है वोट
नारायण कहते हैं कि इसके साथ ही ब्राह्मण समुदाय उस गठबंधन को भी महत्व दे सकता है जो सबसे ज्यादा ब्राह्मण प्रत्याशियों को टिकट देगा। वरिष्ठ पत्रकार मनोज त्रिपाठी भी इससे सहमत हैं। वे ये भी कहते हैं कि राज्य के चुनाव में अभी साल भर से अधिक का वक्त है ऐसे में कोई भी अनुमान लगाना अभी से ठीक नहीं होगा।
वहीं बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व और आरएसएस भी इस बात को समझ रहा है। वे समुदाय की नाराजगी को दूर करने की हर कोशिश करेंगे। इसके लिए सत्ता में हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व बढ़ाया जा सकता है।
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