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असदुद्दीन ओवैसी क्या तोड़े गए इन हिंदू मंदिरों के हक के लिए भी आवाज उठाएंगे?

बेंगलुरू। भारत का मध्यकालीन इतिहास विदेशी आक्रांताओं के हमलों से भरा हुआ है, इनमें अधिकतर आक्रांता मुस्लिम थे। मुस्लिम आक्रांताओं में प्रमुख नाम अहमदशाह अब्दाली, नादिर शाह, तैमूर लंग, महमूद गजनवी, मोहम्मद गोरी, गुलाम वंश और मुगल कालीन शासक कुख्यात हैं, जिन्होंने भारत में निर्मित हिंदू मंदिरों को विध्वंश किया। पूरा मध्यकालीन भारतीय इतिहास ऐसे प्रसंगों से भरा हुआ है, जब मुस्लिम आक्रांताओं ने हिंदुओं के आस्था के केंद्र हिंदू मंदिरों को तोड़कर उसके स्थान पर मस्जिद निर्माण किया।

hindu temple

इतिहास गवाह कि इस दौरान न केवल हिंदुओं के पूजा स्थलों का बर्बाद किया गया बल्कि जबरन लाखों हिंदुओं का धर्म परिवर्तन किया गया। चूंकि मुस्लिम आक्रांता मूर्तिपूजा में नहीं विश्वास करते थे और जब उन्होंने देखा कि हिन्दू न केवल मूर्तिपूजा करते हैं बल्कि उन्हें यह अटूट विश्वास है कि पत्थर की मूर्तियों में ईश्वर का वास है और हर परिस्थिति में उनकी रक्षा करेंगे तो उन्होंने हिंदू मंदिरों को चुन-चुनकर निशाना बनाना शुरू किया, जिसका मकसद हिंदुओं की आस्था और विश्वास तोड़कर उनका मनोबल तोड़ना था।

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हिंदुस्तान में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा हिंदू मंदिर तोड़ने का मुद्दा अभी तब सुर्खियों में आ गया जब सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या राम जन्मभूमि मंदिर के पक्ष में फैसला दिया। इसके बाद AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने यह कहकर विवाद को तूल दे दे दिया कि उन्हें बाबरी मस्जिद वापस चाहिए। इस पर फिल्म एक्ट्रेस कोइना मित्रा ने ओवैसी पर जवाबी हमला करते हुए कहा कि पहले तोड़े गए 40000 हिंदू मंदिरों को वापस लौटाओ।

Hindu temple

ओवैसी के लिए यह सवाल इसलिए मौजू हो चला है, क्योंकि AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी अक्सर ईमानदार राजनीति की पैरोकारी करते हैं और संविधान और न्याय सम्मत राजनीति की वकालत करते पाए जाते हैं। पेशे से वकील ओवैसी भारत के मध्यकालीन इतिहास से बखूबी वाकिफ हैं इसलिए उन्हें उन हिंदू मंदिरों के पक्ष में भी अपनी आवाज बुलंद कर दी जानी चाहिए, जहां आज भी आक्रांताओं द्वारा तोड़े गए हिंदू मंदिरों के तोड़ने और जबरन मस्जिद बनाए जाने के निशान मौजूद हैं।

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उल्लेखनीय है मध्यकालीन इतिहास में विदेशी आक्रांताओं द्वारा 40000 से अधिक हिंदू मंदिरों को तोड़ने का प्रसंग मिलता है, जिन्हें तोड़कर उस जगह पर मस्जिद बना दिया गया। मथुरा स्थित कृष्ण जन्मभूमि और काशी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर इसके ज्वलंत उदाहरण हैं, जहां आज भी मंदिर के बगल में मस्जिद निर्मित है। तो आइए जानते हैं हिंदुस्तान में तोड़े गए उन 10 प्रसिद्ध मंदिर, जिनका ऐतिहासिक महत्व हैं।

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8वीं शताब्दी में कश्मीर में निर्मित ऐतिहासिक मार्तण्ड सूर्य मंदिर

8वीं शताब्दी में कश्मीर में निर्मित ऐतिहासिक मार्तण्ड सूर्य मंदिर

कश्मीर घाटी में लगभग 8वीं शताब्दी में बने ऐतिहासिक और विशालकाय मार्तण्ड सूर्य मंदिर को मुस्लिम शासक सिकंदर बुतशिकन ने तुड़वाया था। पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार इस मंदिर को कर्कोटा समुदाय के राजा ललितादित्य मुक्तिपाडा ने 725-61 ईस्वी के दौरान बनवाया था। यह कश्मीर के पुराने मंदिरों में शुमार होता है और श्रीनगर से 60 किलोमीटर दूर दक्षिणी कश्मीर के अनंतनाग जिले में है। यह मंदिर अनंतनाग से पहलगाम के बीच मार्तण्ड नाम के स्थान पर स्थित एक पठार पर है जिसे मटन कहा जाता है। मु‍स्लिम इतिहासकार हसन ने अपनी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ कश्मीर' में कश्मीरी जनता का धर्मांतरण किए जाने का जिक्र किया है।

गुजरात के पाटन में स्थित प्रसिद्ध मोढेरा सूर्य मंदिर

गुजरात के पाटन में स्थित प्रसिद्ध मोढेरा सूर्य मंदिर

यह मंदिर गुजरात के अहमदाबाद से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर पुष्पावती नदी के तट पर स्थित है, जबकि पाटन नामक स्थान से 30 किलोमीटर दक्षिण की ओर 'मोढेरा' नामक गांव में नदी के तट पर प्रतिष्ठित है। इसका निर्माण सूर्यवंशी सोलंकी राजा भीमदेव प्रथम ने 1026 ई. में करवाया था। मुस्लिम आक्रांता अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान इस मंदिर को काफी नुकसान पहुंचा था। यहां पर उसने लूटपाट की और मंदिर की अनेक मूर्तियों को खंडित कर दिया।

वाराणसी स्थित प्रसिद्ध काशी विश्‍वनाथ मंदिर

वाराणसी स्थित प्रसिद्ध काशी विश्‍वनाथ मंदिर

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ मंदिर अनादिकाल से काशी में है। इसका उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है। 1100 ईसा पूर्व राजा हरीशचन्द्र ने जिस विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था उसका सम्राट विक्रमादित्य ने पुन: जीर्णोद्धार करवाया था। इस मंदिर को 1194 में मुहम्मद गौरी ने लूटने के बाद तुड़वा दिया था। इसे फिर से बनाया गया, लेकिन एक बार फिर इसे सन् 1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह द्वारा तोड़ दिया गया। दोबारा सन् 1585 ई. में राजा टोडरमल की सहायता से पं. नारायण भट्ट द्वारा इस स्थान पर फिर से एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया। इस भव्य मंदिर को सन् 1632 में शाहजहां ने आदेश पारित कर इसे तोड़ने के लिए सेना भेज दी। सेना हिन्दुओं के प्रबल प्रतिरोध के कारण विश्वनाथ मंदिर के केंद्रीय मंदिर को तो तोड़ नहीं सकी, लेकिन काशी के 63 अन्य मंदिर तोड़ दिए गए।

मथुरा में स्थित कृष्ण जन्मभूमि मंदिर

मथुरा में स्थित कृष्ण जन्मभूमि मंदिर

मथुरा में भगवान कृष्ण की जन्मभूमि है और उसी जन्मभूमि के आधे हिस्से पर बनी है ईदगाह। औरंगजेब ने 1660 में मथुरा में कृष्ण मंदिर को तुड़वाकर ईदगाह बनवाई थी। जहां भगवान कृष्ण का जन्म हुआ, वहां पहले वह कारागार हुआ करता था। यहां पहला मंदिर 80-57 ईसा पूर्व बनाया गया था। इस संबंध में महाक्षत्रप सौदास के समय के एक शिलालेख से ज्ञात होता है कि किसी 'वसु' नामक व्यक्ति ने यह मंदिर बनाया था। इसके बहुत काल के बाद दूसरा मंदिर विक्रमादित्य के काल में बनवाया गया था। इस भव्य मंदिर को सन् 1017-18 ई. में महमूद गजनवी ने तोड़ दिया था। बाद में इसे महाराजा विजयपाल देव के शासन में सन् 1150 ई. में जज्ज नामक किसी व्यक्ति ने बनवाया। यह मंदिर पहले की अपेक्षा और भी विशाल था जिसे 16वीं शताब्दी के आरंभ में सिकंदर लोदी ने नष्ट करवा डाला।

अयोध्या स्थित भगवान राम जन्मभूमि मंदिर

अयोध्या स्थित भगवान राम जन्मभूमि मंदिर

भगवान राम की पवित्र नगरी अयोध्या हिन्दुओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। यहां पर भगवान राम का जन्म हुआ था। यह राम जन्मभूमि है। राम एक ऐतिहासिक महापुरुष थे और इसके पर्याप्त प्रमाण हैं। आधुनिक शोधानुसार भगवान राम का जन्म 5114 ईस्वी पूर्व हुआ था। इतिहासकारों के अनुसार 1528 में बाबर के सेनापति मीर बकी ने अयोध्या में राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनवाई थी। बाबर एक तुर्क था। उसने बर्बर तरीके से हिन्दुओं का कत्लेआम कर अपनी सत्ता कायम की थी। मंदिर तोड़ते वक्त 10,000 से ज्यादा हिन्दू उसकी रक्षा में मारे गए थे।

12 ज्योतिर्लिगों में से एक गुजरात स्थित प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर

12 ज्योतिर्लिगों में से एक गुजरात स्थित प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर

गुजरात प्रांत के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्र के किनारे सोमनाथ नामक विश्वप्रसिद्ध मंदिर में 12 ज्योतिर्लिंगों से एक स्थापित है। पावन प्रभास क्षेत्र में स्थित इस सोमनाथ-ज्योतिर्लिंग की महिमा महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा स्कंद पुराणादि में विस्तार से बताई गई है। सर्वप्रथम इस मंदिर के उल्लेखानुसार ईसा के पूर्व यह अस्तित्व में था। इसी जगह पर द्वितीय बार मंदिर का पुनर्निर्माण 649 ईस्वी में वैल्लभी के मैत्रिक राजाओं ने किया।

पहली बार इस मंदिर को 725 ईस्वी में सिन्ध के मुस्लिम सूबेदार अल जुनैद ने तुड़वा दिया था। फिर प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका पुनर्निर्माण करवाया। इसके बाद महमूद गजनवी ने सन् 1024 में कुछ 5,000 साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी संपत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया। तब मंदिर की रक्षा के लिए निहत्‍थे हजारों लोग मारे गए थे

यूनेस्को की सूची में शामिल कर्नाटक स्थित हम्पी के मंदिर

यूनेस्को की सूची में शामिल कर्नाटक स्थित हम्पी के मंदिर

हम्पी मध्यकालीन हिन्दू राज्य विजयनगरम् साम्राज्य की राजधानी था। भारत के कर्नाटक राज्य में स्थित यह नगर यूनेस्को द्वारा 'विश्व विरासत स्थलों' की सूची में भी शामिल है। यहां दुनिया के सबसे बेहतरीन और विशालकाय मंदिर बने थे, जो अब खंडहर में बदल चुके हैं। यह माना जाता है कि एक समय में हम्पी रोम से भी समृद्ध नगर था। यहां मंदिरों की खूबसूरत श्रृंखला है इसलिए इसे 'मंदिरों का शहर' भी कहा जाता है।

कृष्णदेव राय ने 1509 से 1529 के बीच हम्पी में शासन किया था। विजयनगरम् साम्राज्य के अंतर्गत कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के राज्य आते थे। कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद इस विशाल साम्राज्य को बीदर, बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर और बरार की मुस्लिम सेनाओं ने 1565 में क्रूरतम हमला करके नष्ट कर दिया। भयंकर लूटपाट और कत्लेआम हुआ और संपूर्ण शहर को खंडहर और लाशों के ढेर में बदल दिया गया। यह इतिहास का सबसे क्रूरतम हमला था, जैसा कि दिल्ली में नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली ने क्रूरतम हमला किया था।

गुजरात के पाटन में प्रसिद्ध रुद्र महालय मंदिर

गुजरात के पाटन में प्रसिद्ध रुद्र महालय मंदिर

गुजरात के पाटन जिले के सिद्धपुर में रुद्र महालय स्थित है। सरस्वती नदी के तट पर बसा सिद्धपुर एक प्राचीन नगर है। इस मंदिर को 943 ईस्वी में मूलाराज सोलंकी ने बनवाना प्रारंभ किया था। 1140 ईस्वी में सिद्धराज जयसिंह के काल में निर्माण कार्य पूर्ण हुआ। वर्ष 1094 में सिद्धराज ने रुद्र महालय का विस्तार करके 'श्रीस्थल' का 'सिद्धपुर' नामकरण किया था।

सन् 1410-1444 के दौरान अलाउद्दीन खिलजी ने इसका कई बार विध्वंस करवाया और उसके बाद अहमद शाह ने इसे तुड़वाया था। विभिन्न आततायी आक्रमणकारी लुटेरे बादशाहों ने 3 बार इसे तोड़ा और लूटा। इसके बाद एक भाग में मस्जिद बना दी। इसके एक भाग को आदिलगंज (बाजार) का रूप दिया। इस बारे में वहां फारसी ओर देवनागरी में शिलालेख हैं। वर्तमान में रुद्रमहल के पूर्व विभाग के तोरण द्वार, चार शिव मंदिर और ध्वस्त सूर्य कुंड हैं। यह पुरातत्व विभाग के अधीन है।

वृंदावन स्थित वैष्णय संप्रदाय का प्रसिद्ध मदन मोहन मंदिर

वृंदावन स्थित वैष्णय संप्रदाय का प्रसिद्ध मदन मोहन मंदिर

उत्तरप्रदेश के मथुरा जिले के वृंदावन नगर में वैष्णव संप्रदाय का मदन मोहन नामक मंदिर स्थित है। इसका निर्माण 1590 ई. से 1627 ई. के बीच मुल्तान के रामदास खत्री या कपूरी द्वारा करवाया गया था। भगवान श्रीकृष्ण का एक नाम मदन मोहन भी है। भगवान मदन गोपाल की मूल प्रतिमा आज इस मंदिर में नहीं है। मुगल शासन के दौरान इसे राजस्थान स्थानांतरित कर दिया गया था। आज मंदिर में उस प्रतिमा की प्रतिकृति की पूजा की जाती है, जबकि मूल प्रतिमा आज भी राजस्थान के कारौली में है, क्योंकि औरंगजेब काल में इस मंदिर को तोड़ दिया गया था।
# 1819 ईस्वी में नंदलाल वासु ने इसे पुन: बनवाया था। दूसरे प्राचीन निर्माणों की तुलना में यह मंदिर थोड़ा छोटा है, लेकिन इसमें की गई नक्काशी बेहद खूबसूरत है। इसका रंग लाल है और यह ऊंचा, लेकिन संकरा है। हालांकि इसे देखकर आपको भव्यता और दिव्यता का अहसास जरूर होगा।

तमिलनाडु के मदुरै शहर में स्थित भव्य मीनाक्षी मंदिर

तमिलनाडु के मदुरै शहर में स्थित भव्य मीनाक्षी मंदिर

मीनाक्षी मंदिर तमिलनाडु राज्य के मदुरै शहर में स्थित एक भव्य, दिव्य और प्रसिद्ध मंदिर है। मीनाक्षी मंदिर भगवान शिव और देवी पार्वती, जो मीनाक्षी के नाम से जानी जाती थीं, को समर्पित है। यह मंदिर 2,500 साल पुराने शहर मदुराई या मदुरै का दिल और जीवनरेखा है। यहां स्थित यह मंदिर बहुत ही प्राचीन था। कहते हैं कि सर्वप्रथम इस मंदिर की स्थापना राजा इन्द्र ने की थी। हिन्दू संत थिरुग्ननासम्बंदर ने इस मंदिर का वर्णन 7वीं शताब्दी से पहले ही कर दिया था। प्राचीन पांडियन राजा मंदिर निर्माण के लिए लोगों से कर (टैक्स) की वसूली करते थे।

असल में इस मंदिर का निर्माण 6ठी शताब्दी में कुमारी कंदम के उत्तरजीवी द्वारा किया गया था। कहा जाता है कि 14वीं शताब्दी में मुगल मुस्लिम कमांडर मलिक काफूर ने मंदिर को तोड़ा और लूटा था। वो मंदिर से मूल्यवान आभूषण और रत्न लूटकर ले गया था। इस मंदिर के वर्तमान स्वरूप को 1623 और 1655 ईस्वी के बीच बनाया गया था। बाद में 16वीं शताब्दी में ही नायक शासक विश्वनाथ नायकर द्वारा इसे पुनर्निर्मित करवाया गया था। विश्वनाथ नायक ने ही इसे शिल्प शास्त्र के अनुसार पुन: बनवाया था।

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