यूपी में होली के मौक़े पर कुछ ज़िलों में मस्जिदें क्यों ढँकी गईं

पश्चिमी UP के ज़िला संभल में होली के मौक़े पर शहर की क़रीब नौ मस्जिदों के सड़क की ओर वाले हिस्से को प्लास्टिक के ख़ाली कट्टों से ढँक दिया गया.

मस्जिद
RASHID MIRZA
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज़िला संभल में होली के मौक़े पर शहर की क़रीब नौ मस्जिदों के सड़क की ओर वाले हिस्से को प्लास्टिक के ख़ाली कट्टों से ढँक दिया गया.

इसको लेकर कुछ लोगों ने तस्वीरें ट्विटर पर भी साझा कीं. ऐसा ही कुछ ज़िला बिजनौर में भी देखने को मिला, जहाँ होली के जुलूस के रास्ते में पड़ने वाली कुछ मस्जिदों के सड़क की तरफ़ वाले हिस्सों को प्लास्टिक की पन्नियों या फिर तिरपाल से ढँक दिया गया.

प्रशासन का तर्क है कि होली के जुलूस या फिर होली खेलने के दौरान मस्जिदों में रंग गिरता है तो उससे तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है.

इस तनाव से बचने के लिए ही एक एहतियाती क़दम उठाया गया था और मस्जिदों के सड़क की ओर वाले बाहरी हिस्सों को ढँक दिया गया था.

संभल शहर के एसडीएम सुनील कुमार त्रिवेदी ने बीबीसी से कहा,"पिछले साल संभल में एक मस्जिद में होली पर रंग गिरने से तनाव की स्थिति पैदा हो गई थी. इस बार ऐसा न हो, इसके लिए जुलूस क्षेत्र में पड़ने वाली शहर की नौ मस्जिदों को ढँका गया है. सुरक्षा के भी पुख़्ता इंतज़ाम किए गए हैं."

ज़िला बिजनौर के धामपुर क़स्बे में पुरानी तहसील के नज़दीक एक मस्जिद को भी इसी तरह खाकी रंग के एक तिरपाल से ढँका गया है. मस्जिद के गुंबदों को काले रंग की पन्नियों से छिपाया गया है.

यहां भी होली खेलने के दौरान रंग पड़ने के डर से ऐसा किया गया.

इस बारे में बिजनौर के एसपी पूर्वी धर्म सिंह मार्छाल ने बीबीसी से कहा, "हमनें शांति समिति की बैठक की थी. उसमें ये बात उठाई गई थी कि मस्जिदों को पालिका की ओर से ढँका जाता है या फिर मस्जिद वाले ख़ुद ढँकते हैं. लोगों ने बताया कि मस्जिद कमिटी के लोग ख़ुद ही सड़क पर पड़ने वाली कुछ मस्जिदों को ढँक लेते हैं. ये शांति के लिए एक बेहतर प्रयास है."

मस्जिदों को ढँकने पर क्या है प्रतिक्रिया?

ज़िला संभल और बिजनौर के अलावा कुछ अन्य ज़िलों में भी इस प्रकार के कुछ एहतियाती क़दम उठाने की बात सामने आ रही हैं.

संभल के रहने वाले मौलाना मोहम्मद मियां क़ासिम ने बीबीसी से कहा, "शहर में शांति की ज़िम्मेदारी प्रशासन की होती है. लिहाज़ा उन्होंने मस्जिदों को ढँकने का यह तरीक़ा निकाला है. यह एहतियाती तौर पर किया जा रहा है. अमन कायम रहना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है."

संभल के एक मुस्लिम व्यापारी संगठन से ताल्लुक़ रखने वाले समाजसेवी निज़ाम अहमद मस्जिदों को पन्नियों से ढँकने को प्रशासन का अच्छा क़दम बताते हैं.

वह कहते हैं, "प्रशासन ने जो मस्जिदों को पन्नियों को ढँकने का फ़ैसला किया है, वह दुरुस्त है. शहर में क़रीब नौ मस्जिदों को ढँका गया है."

उन्होंने कहा, "स्थानीय लोगों और पुलिस प्रशासन ने मिलकर ये फ़ैसला लिया है. ऐसा सिर्फ़ उन मस्जिदों पर किया गया है, जहाँ से होली पर रंग खेलने वालों का जुलूस निकलता है. पिछली बार एक मस्जिद में रंग गिरने से माहौल ख़राब होते-होते रह गया था."

बिजनौर के वरिष्ठ पत्रकार सत्यराज मस्जिदों को ढँकने के मामले में प्रशासन की सतर्कता को वजह बताते हैं.

वह कहते हैं, "बिजनौर के धामपुर में कुछ साल पहले एक मस्जिद में होली पर रंग डाल दिया गया था. इससे यहाँ काफ़ी तनाव हो गया था. प्रशासन की सोच होती है कि ऐसे तनाव ना हों."

सत्यराज कहते हैं, "रंग वाले दिन लोग होश में नहीं रह पाते हैं. ऐसे में ऐहतियाती क़दम उठाना ही प्रशासन की प्राथमिकताओं में होता है.''

एक स्थानीय पत्रकार राशिद मिर्ज़ा इस फ़ैसले के बारे में कहते हैं,"पुलिस-प्रशासन के इस फ़ैसले से शरारतियों को सबक़ मिलेगा. उन्हें समझ आएगा कि धार्मिक स्थलों को जब इतना अधिक सुरक्षित किया जा रहा है तो उन्हें लगेगा कि प्रशासन सख़्त है. फिर भी अगर किसी को शरारत करनी है तो वो शरारत करेगा ही."

भारतीय जनता पार्टी के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय उपाध्यक्ष राजेश सिंघल मस्जिदों को ढँके जाने को प्रशासन का शांति के लिए किया गया प्रयास बताते हैं.

वह कहते हैं, "प्रशासन ने शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए ये सब किया है. अगर किसी शरारती तत्व ने धोखे से मस्जिद में रंग डाल दिया तो उससे माहौल ख़राब होता था. निश्चित रूप से मस्जिदों को तिरपाल से ढँकने से शांति व्यवस्था होने में काफ़ी राहत मिली है. हिंदू-मुस्लिमों ने सभी ने मिलकर त्योहारों को प्यार मोहब्बत के साथ मनाया है."

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