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भारत का दुश्मन क्यों बन गया तुर्की, जिसकी फर्स्ट लेडी एमीन से मुलाकात कर आमिर ने बढ़ाया विवाद

नई दिल्ली- अभिनेता आमिर खान ने इस्तांबुल में तुर्की की फर्स्ट लेडी एमीन एर्दोगान से अपनी फिल्म की शूटिंग को लेकर मुलाकात कर भारत में भारी विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने यह मुलाकात ऐसे समय में की है, जब तुर्की भारत विरोधी झंडा बुलंद किए हुए है और पाकिस्तान को गोद में लेकर पुचकारने की कोशिशों में जुटा हुआ है। ऐसा नहीं है कि भारत-तुर्की के संबंध हमेशा से खराब रहे हैं। कई दशकों तक दोनों देशों के रिश्ते अच्छे रहे थे। लेकिन, जबसे तुर्की की सत्ता पर मौजूदा राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगान का कंट्रोल बढ़ा है, धीरे-धीरे आज की तारीख में काफी परिवर्तिन आ चुका है। वह खुद को खलीफा मान बैठे हैं और तुर्की को धर्मनिरपेक्षता से धकेल कर सुन्नी राष्ट्र की पहचान देने में जुटे हुए हैं। जिसकी वजह से तुर्की आज भारत से दूर और पाकिस्तान के करीब जा चुका है।

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    पिछले कुछ वर्षों से भारत का दुश्मन बना हुआ है तुर्की

    पिछले कुछ वर्षों से भारत का दुश्मन बना हुआ है तुर्की

    पिछले कुछ वर्षों में तुर्की ने लगातार भारत विरोधी स्टैंड लिया है। पिछले साल तो वहां के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगान ने संयुक्त राष्ट्र में जम्मू और कश्मीर का मुद्दा उठा दिया था, जिसका भारत ने उसी के अंदाज में जवाब भी दिया था। भारत के बार-बार समझाने के बावजूद तुर्की ने भारत के अंदरूनी मसले पर दखलंदाजी करना बंद नहीं किया। ऐसा करते हुए यह देश कब पाकिस्तान के पाले में चला गया, शायद खुद उसे भी अंदाजा नहीं होगा। कश्मीर ही नहीं पिछले साल नागरिकता संशोधन कानून लागू हुआ तो तुर्की ने उसकी भी आलोचना की। इस साल फरवरी में दिल्ली में दंगे हुए, तब भी उसने भारत के आंतरिक मसले को लेकर छाती पीटना शुरू कर दिया। तब रेसेप तैयप एर्दोगान ने कहा था, 'भारत अब एक ऐसा देश बन चुका है, जहां नरसंहार पूरी तरह से फैल चुका है। कैसा नरसंहार? मुसलमानों का नरसंहार? किसके द्वारा? हिंदुओं द्वारा।'

    दोस्ती में भी दगाबाजी का नमूना बनता रहा तुर्की

    दोस्ती में भी दगाबाजी का नमूना बनता रहा तुर्की

    जब भारत आजाद हुआ तो तुर्की मुस्लिम देश होते हुए भी धर्मनिरपेक्षता की ओर झुका हुआ था और इसी वजह से प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू आधुनिक तुर्की के संस्थापक मुस्तफा कमाल पाशा के राजनीतिक दर्शन से काफी प्रभावित थे। इस वजह से दोनों देशों के संबंधों में गर्माहट शुरू हुई। लेकिन, शीत युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां बदलती गईं और तुर्की अमेरिका की गोद में जा बैठा और भारत रूस का सहयोगी रहते हुए गुट-निरपेक्ष आंदोलन से जुड़ा रहा। हालांकि, दोस्ती में दगाबाजी का फितूर तब भी तुर्की की रगों में कहीं न कहीं मौजूद रहा। उसने 1965 और 1971 दोनों युद्ध में पाकिस्तान का साथ दिया। इतना ही नहीं उसने गुट-निरपेक्ष देश साइप्रस पर हमला करके उसके इलाकों पर कब्जा कर लिया था। तब तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी तुर्की के खिलाफ चले अभियान में शामिल हुईं।

    कुछ दशकों के लिए दोनों देशों के बीच संबंध बहुत अच्छे रहे

    कुछ दशकों के लिए दोनों देशों के बीच संबंध बहुत अच्छे रहे

    1980 के बाद एक बार फिर से भारत-तुर्की में रिश्ते सुधरने लगे। यह वह समय था, जब पाकिस्तान कश्मीर घाटी में जिहाद के नाम पर आंतकियों को भेजना शुरू कर दिया था। भारत को उम्मीद थी कि मुस्लिम जगत में तुर्की एक बेहतर साथी साबित हो सकता है। 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तुर्की की यात्रा भी की। 1990 के दशक में भी संबंध अच्छे ही बने रहे। साल 2000 में तुर्की के पीएम बुलेंट एसेविट भारत यात्रा पर आए। 15 वर्षों में तुर्की के किसी नेता की यह पहली भारत यात्रा थी। वे भारत के प्रशंसक थे। उन्होंने 16 साल की उम्र में नोबल पुरस्कार विजेता रबिंद्र नाथ टैगोर की गीतांजलि का अनुवाद किया था। वे पाकिस्तान की मिलिट्री शासन का सख्त मुखालफत करते थे। 2003 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी तुर्की की यात्रा की।

    हाल तक दोनों देशों के व्यापारिक रिश्ते अच्छे रहे

    हाल तक दोनों देशों के व्यापारिक रिश्ते अच्छे रहे

    2002 में एर्दोगान को तुर्की की राजनीति में भारी जीत मिली, क्योंकि उन्होंने इस्लाम के पुनरुद्धार का नाम लिया था। इस मूलभूत बदलाव के बावजूद भारत और तुर्की के संबंध ठीक-ठाक बने रहे। पहले प्रधानमंत्री के रूप में फिर राष्ट्रपति के रूप में एर्दोगान ने भारत के साथ द्विपक्षीय ताल्लुकातों को तीन विषयों पर केंद्रित किया- व्यापार, रणनीतिक स्थिति और परमाणु शक्ति। भारत ने अनुकूल व्यापार संतुलन का आनंद लिया। बेहतर व्यापारिक रिश्तों के चलते तुर्की ने कई वर्षों तक पाकिस्तान के मुकाबले भारत को तरजीह भी दी।

    फिर भारत का दुश्मन क्यों बन गया तुर्की ?

    फिर भारत का दुश्मन क्यों बन गया तुर्की ?

    अमेरिका के बढ़ते प्रभाव और इजरायल के अरब देशों के साथ बदलते रिश्तों के बीच तुर्की को उम्मीद थी कि भारत उसके साथ खड़ा रहेगा। जबकि, भारत ने एक साथ सऊदी अरब और इजरायल दोनों के साथ संबंधों को मजबूत करना शुरू किया और आधिकारिक रूप से किसी भी गुट में शामिल नहीं होने की अपनी नीति बरकरार रखी। हो सकता है कि ऐसे में भारत के द्वारा न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी को साझा करने से इनकार कर देना तुर्की को खटक गया। एर्दोगान पिछले पांच वर्षों से न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी में सहयोग पर पूरा जोर लगाए हुए थे। वह लगातार 2017 और 2018 में भारत दौर पर आए। लेकिन, न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी साझा करने को लेकर भारत ने हमेशा से एहतियात बरतने की कोशिश की है। कहा जाता है कि भारत के इसी रवैए से रेसेप तैयप एर्दोगान का भारत से मोहभंग हो गया। इसी के बाद तुर्की ने पाकिस्तान को अपने गोद में ले लिया और कश्मीर और इस्लाम के नाम पर भारत-विरोधी जहर उगलना शुरू कर दिया। इस बीच तुर्की में कट्टरपंथी मुस्लिम ताकतों की भी पकड़ मजबूत हुई, जाहिर है कि इन्हीं सारी बातों की वजह एर्दोगान ने पाला बदलने में ही भलाई समझी है। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है तो उसकी परमाणु तकनीक चोरी के हथकंडे से हासिल की गई है और वह राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक हित के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, इसमें भी कोई संदेह नहीं है।

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