क्यों मचा राष्ट्रपति की किताब की बिक्री पर बवाल

नई दिल्ली (विवेक शुक्ला) क्यों मचा राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की किताब 'द ड्रामेटिक डिकेड-द ईयर्स आफ इंदिरा गांधी' की बिक्री के मसले पर तगड़ा विवाद? कोई किताब पाठक बुक स्टोर्स से ले या आनलाइन आर्डर देकर ले।

Pranab Mukherjee

दरअसल राष्ट्रपति की किताब की विमोचन के पहले 21 दिनों तक बिक्री सिर्फ आन लाइन से होने के कारण पुस्तकों के संसार में हंगामे और विवाद का कारण बन गई।

एमोजॉन से तालमेल

विवाद के मूल में वजह यह है कि किताब के प्रकाशक रूपा पब्लिकेशन ने एमोजॉन से तालमेल करके इसे विमोचन के 21 दिन तक सिर्फ आनलाइन खरीदने की व्यवस्था की है। यानी कि किताब को आप किसी बुक स्टोर से नहीं
खरीद सकते थे।

बढ़ा विवाद

राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की किताब पर विवाद रिलीज होने से पहले बढ़ गया था। मामले पर वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमन से भी हस्तक्षेप करने के लिए कहा गया। कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने सीतारामन से आग्रह किया कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करें। इनका कहना है कि अकेले एमेजॉन को किताब बेचने का अधिकार देना गलत है।

दी थी चेतावनी

राष्ट्रपति की किताब 'द ड्रामैटिक डिकेड-द ईयर्स ऑफ इंदिरा गांधी' को विमोचन से पहले स्टारमार्क, क्रॉसवर्ड और सपना जैसे बड़े विक्रेताओं ने रूपा से पहले तीन हफ्ते तक अपनी किताब एमेजॉन पर बेचने की योजना वापस लेने के लिए कहा था।

उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि अगर प्रकाशक एमेजॉन को विशेष अधिकार देने से बाज नहीं आया तो वे रूपा की किताबें अपने स्टोर पर नहीं बेचेंगे।

जानकार कहते हैं कि यह खतरनाक रुझान है। ऑनलाइन विक्रेता समय से पहले कीमतें तय करके बाजार में हिस्सेदारी हासिल कर लेते हैं जो स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का परिचायक नहीं है।

सिर्फ एक ही खरीदार खरीद सकता है किताब

आपको बता दें कि राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की किताब को प्री-बुकिंग के दौरान एक खरीदार सिर्फ एक ही किताब खरीद सकता है। हालांकि भारत में ऐसा पहली बार नहीं है कि किसी किताब के बाजार में आने से पहले ही उसकी बुकिंग हुई हो और उसे ई-कॉमर्स के प्लेटफॉर्म पर बेचा गया हो।

हालांकि बुक स्टोर कुछ भी कहें अपने पक्ष में, पर यह भी सच है कि बहुत से किताबों को खरीदने वालों को इसमें कुछ भी गलत नजर नहीं आ रहा कि उक्त किताब को सिर्फ आनलाइन के माध्यम से ही खरीदा जा सकता है शुरूआती दौर में।

कई किताबों के शैदाई तो कह रहे हैं कि हम जब तमाम चीजें आन लाइन खरीदने लगे हैं तो किताबें खरीदने में क्या बुराई है। हम इस तरह से किताबें खरीद ही रहे हैं काफी समय से। हमें इस बात से कोई मतलब नहीं कि प्रकाशक, बुक स्टोर्स और एमेजॉन जैसे कंपनियों के बीच क्या और क्यों विवाद है।

एक बात और भी है कि भारत में ई-कामर्स का धंधा इसलिए भी तेजी से फल-फूल रहा है क्योंकि इसके माध्यम से खरीददारी करने वालों को मोटा डिस्काउंट मिल जाता है। उधर, प्रकाशकों को खरीददारी के नए रास्ते से लाभ यह हो रहा है कि उन्हें अब वितरण के झमले में नहीं पड़ना पड़ता।

अलग तर्क

हालांकि बुक स्टोर्स से जुड़े कारोबारी अलग तर्क रखते हैं। वे कहते हैं कि राष्ट्रपति की किताब इस साल की सबसे बड़ी और अहम किताब है।इतनी बड़ी किताब से उन्हें दूर रखने का क्या मतलब है।

इनका यह भी कहना है कि जिस किताब को ई-कामर्स के रास्ते से बेचने का फैसला हुआ वह अपने आप में पूरी तरह से गलत है। राष्ट्रपति की किताब को तो ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहुंचाया जाना चाहिए था। इनका कहना है कि बुक स्टोर्स की अपनी सीमाएं हैं। वे एक सीमा से ज्यादा डिस्काउंट नहीं दे सकते।

बहरहाल, एक बात समझ आती है कि पाठकों को तो बेहतर डिस्काउंट मिलना चाहिए पर अब ई-कामर्स के चलन को नहीं रोका जा सकता है। उसने तेजी से अपने देश में जगह बनाई है। जब लोग जूते, चप्पलें,मोबाइल वगैरह-वगैरह आन लाइन खरीद रहे हैं तो वे किताबें क्यों नहीं लेगे। पर, पवन धीर जैसे लोगों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।

हर इंसान तो आनलाइन से आर्डर देने में सक्षम नहीं है। उम्र दराज लोग इस काम में उतने निपुण नहीं हैं। तो क्या उनके साथ भेदभाव किया जाए ? बेहतर होगा कि लेखक,प्रकाशक और बुक स्टोर्स मिलकर इस सारे विवाद का कोई हल निकाल लें जिससे कि किसी को भी नुकसान ना हो। कम से कम पाठकों का तो कतई ना हो।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+