कोविंद की दावेदारी मोदी-शाह की 24x7 सियासत का बेजोड़ नमूना

आखिर क्यों मोदी और शाह की जोड़ी को समझ पाना आसान नहीं है विपक्ष के लिए, रामनाथ कोविंद शानदार राजनीति समझ का उदाहरण है

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से रामनाथ कोविंद के नाम पर देश के अगले राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए आगे बढ़ाया है, उसने ना सिर्फ विपक्षी दलों की बल्कि तमाम दलित राजनीति करने वालों को मुश्किल में खड़ा कर दिया है। रामनाथ कोविंद के नाम का ऐलान होने के बाद तमाम विपक्षी दलों की एकता खुलकर सामने आ गई, हालत यह हो गई है कि अब रामनाथ कोविंद का राष्ट्रपति बनना तय हो गया है, विपक्ष के सामने महज औपचारिक लड़ाई के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।

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जातीय समीकरण राजनीति में अहम

जातीय समीकरण राजनीति में अहम

रामनाथ कोविंद के नाम को राष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर आगे बढ़ाने के पीछे के सियासी मंत्र को समझना काफी जरूरी है। दलितों के सबसे बड़े नेता के तौर पर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को जाना जाता है, उन्होंने कहा था कि हिंदू जाति पर इसलिए विश्वास नहीं करते हैं कि वह अमानवीय हैं या फिर उनके पास दिमाग नहीं है, वह इसलिए इसपर विश्वास करते हैं क्योंकि वह बहुत ही धार्मिक हैं। मुमकिन है कि आप बाबा साहब की बात से राजी नहीं हो लेकिन एक बात साफ है कि जाति की राजनीति शुरु से ही देश के चुनावों में अहम भूमिका निभाता आया है, यह पंचायत के चुनाव से लेकर हर स्तर के चुनाव में अपनी भूमिका निभाता है, कुछ ऐसा ही राष्ट्रपति के चुनाव में भी देखने को मिल रहा है।

गुजरात चुनाव के लिहाज से अहम है कोविंद का चुनाव

गुजरात चुनाव के लिहाज से अहम है कोविंद का चुनाव

रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित किए जाने के पीछे कई वजहों को पहले ही गिनाया जा चुका है, जिसमें उनका दलित होना, सबसे अहम है, इसके अलावा उनका बिहार और यूपी से जुड़ाव आदि भी एक वजह है। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि कोविंद का गुजरात कनेक्शन भी है, जी हां रामनाथ कोविंद दलितों के कोली समाज से आते हैं और गुजरात में कोली समाज की आबादी तकरीबन 24 फीसदी है। यहां हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गुजरात में इसी साल के अंत में चुनाव होना है।

पाटीदार आंदोलन पर बड़ा पलटवार

पाटीदार आंदोलन पर बड़ा पलटवार

गुजरात में हाल ही में पाटीदार आंदोलन हुआ था, लेकिन कोली समाज पाटीदार का विरोधी माना जाता है और इन लोगों ने अपना विरोध भी शुरु कर दिया। भाजपा के लिए यूपी की तरह गुजरात भी अहम राज्य है, ऐसे में रामनाथ कोविंद का राष्ट्रपति पद पर पहुंचना कोली समाज के लिए अहम साबित हो सकता है और आगामी चुनाव में भाजपा को इसका फायदा भी मिल सकता है। दिल्ली में बहुत से नेताओं और दलों को कोली समाज के बारे में खास जानकारी नहीं है, ऐसे में हम आपको कोली समाज के बारे में कुछ अहम तथ्यों से रूबरू कराएंगे।

गुजरात चुनाव में कोली मंत्र

गुजरात चुनाव में कोली मंत्र

गुजरात में कोली जाति के लोग ओबीसी जाति में आते हैं, हालांकि केंद्र इन्हें एसएसी की तरह लाभ और योजनाओं का फायदा देती है, खासकर की मध्य प्रदेश और राजस्थान में उन्हें एसएसी के ही लाभ मिलते हैं। गुजरात ओबीसी कमीशन के अनुसार ओबीसी में कुल 136 जातियां हैं, इसमें कोली समाज की आबादी 40 फीसदी है। इस आंकड़े के राजनीतिक महत्व को भी समझना काफी जरूरी है।

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती

कोली समाज की राजनीति के इतिहास पर नजर डालें तो 1998 तक कोली समाज कांग्रेस के साथ था, वह कांग्रेस को अपना वोट देता था, लेकिन क्षत्रीय हरिजन आदिवासी मुस्लिम (खाम) के सामाजिक गठबंधन ने इन्हें एकजुट किया, ,जिसके बाद यह लोग गुजरात में ओबीसी जाति के तहत क्षत्रिय माने जाते हैं। कांग्रेस के लिए खाम की रणनीति हमेशा से ही सवर्ण जाति के वोटरों से लड़ने का अहम हथियार रही है।

पाटीदार-कोली को एक होने से रोकना लक्ष्य

पाटीदार-कोली को एक होने से रोकना लक्ष्य

लेकिन जिस तरह से गुजरात में हिंदुत्व का उत्थान देखने को मिला, उसके बाद कोली समाज का वोटबैंक बंट गया और यह कांग्रेस व भाजपा दोनों के पास चला गया। जबकि पटवारी वोट भाजपा के साथ रहा। केशूभाई पटेल के साथ टकराव के बाद भी पटवारी वोट नरेंद्र मोदी के साथ बना रहा। लेकिन जिस तरह से हार्दिक पटेल ने पाटीदार आंदोलन खाड़ किया उसने राजनीतिक समीकरण बदल दिए। ऐसे में गुजरात भाजपा एक बार फिर से इस बात की कोशिश कर रही है कि पाटीदार और कोली दोनों ही एकजुट होकर कांग्रेस के साथ नहीं जाए, गुजरात भाजपा के लिए करो या मरो की स्थिति जैसा प्रदेश है, लिहाजा पार्टी किसी भी सूरत में गुजरात को नहीं खोना चाहती है।

महाराष्ट्र के परिदृश्य से भी अहम हैं कोविंद का चुनाव

महाराष्ट्र के परिदृश्य से भी अहम हैं कोविंद का चुनाव

गुजरात के परिदृश्य को अगर अलग रखें तो कोली समाज पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र में भी हैं। शिवसेना और भाजपा के बीच जिस तरह के रिश्ते महाराष्ट्र में चल रहे हैं, अगर उसे देखे तो इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि वहां कभी भी मध्यावधि चुनाव हो सकते हैं। ऐसे में रामनाथ कोविंद का राष्ट्रपति बनना भाजपा के लिए एक साथ कई निशाना साधना जैसा साबित हो सकता है।

मोदी-शाह का कोई सानी नहीं

मोदी-शाह का कोई सानी नहीं

रामनाथ कोविंद को चुनने के पीछे की राजनीति को समझना इतना आसान नहीं है, ऐसे में यह माना जा सकता है कि यह पीएम मोदी और अमित शाह की ही सोच की उपज हो सकती है, जिन्होंने बेहतरीन राजनीतिक सोच का परिचय देते हुए रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद के लिए आगे किया है। इस फैसले से यह भी साबित होता है कि आखिर किस तरह से मोदी-शाह की जोड़ी हर वक्त सक्रिय रहती है और निश्चित समय के भीतर बड़े फैसले लेती है। बहरहाल मोदी-शाह की जोड़ी के इस फैसले से विपक्ष चारो खाने चित्त नजर आ रहा है।

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