रेल किराया बढ़ाने के पीछे मोदी की मजबूरी, फायदे और नुकसान

समय को नष्ट करने के बजाये हम सीधे उन बातों पर आते हैं, कि आखिर रेल का किराया क्यों बढ़ा और इसके क्या फायदे और नुकसान हो सकते हैं।
मजबूरी
रेलवे ईंधन पर सालाना 30 हजार करोड़ रुपए ईंधन पर खर्च करता है, जिसमें आधे से ज्यादा खर्च डीजल पर होता है। चूंकि इराक हिंसा के बाद से कच्चे तेल के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेजी से बढ़ गये हैं, लिहाजा इसका प्रभाव रेलवे पर भी पड़ा है। अगर कमाई की बात करें तो किराये से रेलवे को साल भर में 1,65,770 करोड़ रुपए की कमाई ही होती है।
ईंधन का खर्च निकालने के बाद स्टेशनों, ट्रेनों का रखरखव, कर्मचारियों की सैलरी और तमाम खर्च करने के बाद रेलवे घाटे में चला जाता है। इस किराये में बढ़ोत्तरी से रेलवे का 6500 करोड़ रुपए का घाटा कम होगा। बेहतर सुविधाओं और सेवा के लिये यह बढ़ोत्तरी जरूरी थी।
फायदे
सच पूछिए तो इस बढ़ोत्तरी से रेलवे को नहीं बल्कि पैसेंजर्स को फायदा पहुंचने वाला है। जैसा कि मोदी सरकार के एजेंडे में बेहतर सुविधाएं और अच्छे इंफ्रास्ट्रक्चर का वादा किया गया है, उसके तहत रेलवे में यात्रियों को अच्छी सुविधाएं दिये जाने की योजनाएं हैं। हालांकि ट्रेनों के टॉयलेट कितने साफ होंगे, इस पर टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी।
नुकसान
इससे नुकसान सिर्फ एक ही है, वो है हर छोटी बड़ी वस्तु के दामों में बढ़ोत्तरी। जी हां चूंकि माल भाड़े में भी वृद्धि की गई है, लिहाजा कोयला, इस्पात, सीमेंट और अनाज के दामों में तेजी से वृद्धि होने की संभावना है। यानी किराया बढ़ाये जाने से मकान बनाने की कीमत, वाहनों की, रियल इस्टेट और खाद्य उत्पादों की कीमतों में निश्चित तौर पर वृद्धि होगी और इसका बोझ सीधे तौर पर आम जनता पर पड़ेगा।












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